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Bhojpuri Special: दिन पर दिन बढ़ले जाता गांधी जी के प्रासंगिकता, पढ़ीं अउर गुनीं...

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गांधी जी (Mahatma Gandhi) बड़ा चतुराई से पहिले मेहनती किसान आ दलाल जमींदारन के बीच के अंतर पटलन आ तब जब सबके एक जुट देखलन त निलहन के खिलाफ आन्दोलन छेड़ दिलहन.

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अबकी गणतंत्र दिवस पर गाँधी जी बहुत मन परलें हं. लाल किला पर तिरंगा के अपमान देख के भोंकार पार के रोअल आ कलपल होइहें गाँधी जी. उनका अहिंसा के सिद्धांत के भीतर हिंसा के दांत किटकिटात होई. का उ अइसने भारत के सपना देखले रहलें ?
उ कबो ना सोचले होइहें कि किसान के रूप ध के भेड़िया एह देश के अस्मिता के खइहन-चबइहन सन.
गाँधी जी के टाइम में अंगरेजन के दलालन के लेके एगो गीत बड़ा लोकप्रिय रहे-
‘मालिक के खेत, अंगरेज के प्रेत
चेत, चेत रे मन चेत….’
काथा का कहे के बा. इशारा रउरा बुझते बानी. अंगरेजन के दलाल कसाई बन के नोंचsसन किसान के. ओह दलालन में भारतीय लोग भी शामिल रहे. लाल किला पर भी इहे भइल. देश के दुश्मन के इशारा पर भारतीय दलाल तांडव कइलन ह सन. किसान अइसन कबो नइखन कर सकत.
ओह घरी मेहनत के कमाई खाये वाला किसान हरदम तनाव आ चिंता-फिकिर में रहस. उनका कपार पर हरदम करजा चढ़ले रहे. जान हरदम सांसत में रहत रहे-
‘फिकिरिया मरलस जान रे फिकिरिया मरलस जान
करजा काढ़ के खेती कइली, मर गइले सब धान,
बैल बेच रजवा के देनी, सहुआ कहेला बेइमान
रे फिकिरि, मरलस जान…’
लोकगीत माने आम आदमी के मन के दुःख-दरद. साधारण मनई के भावना के अभिव्यक्ति. तब नीलहा खेती के लेके जवन गीत फूटल ओह से किसानन के दुरदसा आ टूटल मनोभाव के अंदाजा लगावल जा सकेला.

‘भलइक निलहवा के राज, अब कइसे जिअबू बकरियो?…’

नील के पतई बकरी भा माल-मवेशी ना खालें. एह से नील के खेती से आदमी के खाए खातिर अन्न के अभाव त रहबे कइल, माल-जाल के चारा भी एगो समस्या रहे. अतने ना अंग्रेजवा बाहर के धनगर खेत दह गइला पर गोंयड़ा (घर के पास) के जमीनों में नील बोए पर मजबूर करsसन, जबकि अइसन जमीन में किसान बहुधा साग-सब्जी उपजावेलन. मतलब तरो-तरकारी पर आफत रहे.
गाँधी जी बहुत दुखी भइलन. उनका विश्वास हो गइल कि किसान भाई लोग सच माने में अंगरेजन के जुलुम से ऊब चुकल बा. जमींदार अंग्रेज के साथे मिलके ना खाली उनका पर अत्याचार करत बाड़न बलुक मिल के जोंक नियर खुद भी किसान के खून चूस रहल बाड़न.
तब, गांधी जी बड़ा चतुराई से पहिले मेहनती किसान आ दलाल जमींदारन के बीच के अंतर पटलन आ तब जब सबके एक जुट देखलन त निलहन के खिलाफ आन्दोलन छेड़ दिलहन. ऊ सरकार के कई गो आदेशो ना मनलन. उनका सफलता मिलल.
आजो, तब के घटना देश के जनता खातिर सीख बा कि अलग-अलग आपस में बंट के बाहरी भा भीतरी दुश्मन से ना लड़ल जा सके.
गांधी के आइल जमाना हो,
देवर जेलखाना अब गइले.
जब से तपे सरकार बहादुर,
भारत मरे बिनु दाना,
हाथ हथकडि़या, गोड़वा में बेंडि़या,
देसवा बनि हो गइल दिवाना
मरम राखि लेहु भारत भइया,
चरखा चलावहु मस्ताना
गांधी जवाहर काम कइले मरदाना,
देवर अब जेलखाना हो गइले
अइसन हालत में गाँधी जी के नेतृत्व के जनता-जनार्दन के समर्थन मिलल. लोग विदेशी कपड़ा उतार के फेंके खातिर तइयार भइल. लोकमानस के ई धारणा लोकगीत के एह पंक्तियन में बखूबी चित्रित भइल बा-

मानऽ गांधी के बचनवा,
दुखवा हो जइहें सपनवा
तन से उतारऽ कपड़ा विदेसी,
खद्दर के कइ ल धरनवा

चूंकि गाँधी जी के कर्मस्थली चंपारण रहे, बिहार रहे, भोजपुरी क्षेत्र रहे. एह से भोजपुरी के लोकगीतन में गाँधी जी खूब गूँजल बाड़न. कहल जाला कि उ बिहारे के धरती ह जवन गाँधी जी के मोहनदास से महात्मा बनवलस – महात्मा गाँधी. एतना प्यार आ सम्मान उनका अपना जन्मस्थली से भी ना मिलल. एह से गाँधी के लेके भोजपुरी में किसिम-किसिम के गीत बा.
एगो बिआह के गीत में गांधीजी आ दोसर नेता लोग के इंग्लैंड-यात्रा के ससुरार के यात्रा बतावत राष्ट्रीय भावना के भाव प्रकट भइल बा-

बान्हि के खद्दर के पगरिया,
गांधी ससुररिया चलले ना
गांधी बाबा दुलहा बनले,
नेहरू बनले सहबलिया,
भारतवासी बनले बराती,
लंदन के नगरिया ना
गांधी ससुररिया चलले ना

9 अगस्त, 1942 … भारत छोड़ो आंदोलन के समय गाँधी जी से जनता के जुड़ाव देखल जाय –

गांधी के आइल जमाना,
बलम अब रउओ चली जेलखाना
अब ना सहब हम जुलमिया
बलम हमहूं जायब भले जेलखाना
फिरंगिया भइल दुश्मनवां
बलम अब रउओ चली जेलखाना
फुटलि किरनिया पुरुब असमनवां अब ना रूकी संग्रमवा
बलम अब रउओ चली जेलखाना
गांधी के आइल जमाना
बलम अब रउओं चली जेलखाना

सन 1942 के आंदोलन के समय हीं जनकवि रामदेव द्विवेदी अलमस्त जी के एगो गीत के बड़ा शोर रहे –

तोरा घरवा में पइसल बाटे चोर
अंजोर क के देख भईया ना.

ओही तरी आपातकाल के समय दिघवारा, सारण, बिहार के कवि राजेश सिंह ‘राजेश’ के लिखल गीत भी काफी लोकप्रिय भइल रहे-

कुछ दिन जीयतऽ त, माहूर घोरी पियतऽ
देशवा के बिगरल हालात हो गांधी जी
देशवा के खातिर, मानऽ गोहारऽ मोरऽ
फेरू से लेई लऽ, अवतार हो गांधी जी

रसूल मियां के गीत केकरा इयाद ना होई –

छोड़ द बलमुआ जमींदारी परथा
सइयां बोवऽ ना कपास, हम चलाइब चरखा

शादी-विवाह के सुअवसर पर मेहरारू लोग जवन गारी गावत रहे ओह में स्वाधीनता-आन्दोलन के पद-चाप साफ सुनाई पड़त रहे. एगो ‘सुराजी गारी’ में वर-पक्ष कन्या-पक्ष से दहेज के रूप में ‘स्वराजे’ के मांग क रहल बा-

”गांधी बाबा दूल्हा बने हैं
दुल्हन बनी सरकार
चरखवा चालू रहे
वीर जवाहर बने सहबाला
इर्विन बने नेवतार
चरखवा चालू रहे
वालंटियर सब बने बराती
जेलर बने बाजदार
चरखवा चालू रहे
दुलहा गांधी जेवन बैठे
दहेजे में मांगे सुराज
चरखवा चालू रहे

लार्ड बिलिंगडन दौरत आए
जीजा गौने में देबौं सुराज
चरखवा चालू रहे

साल 2019 में रवींद्र किशोर सिन्हा, पूर्व राज्यसभा सांसद के नेतृत्व में गाँधी जयंती 2 अक्टूबर के चंपारण से शुरू भइल, गाँधी संकल्प यात्रा में दिल्ली अउर पूरा बिहार में सांस्कृतिक टीम के नेतृत्व आ कार्यक्रम के संचालन के अवसर हमरा ( मनोज भावुक) मिलल. गाँधी जी पर आ उनका सिद्धांत पर कई गो गीत लिखनी. कुछ साल हमरा पूर्वी अफ्रीका में भी रहे के अवसर मिलल बा. उहाँ गाँधी जी के प्रति जवन भाव देखनी, ओह भाव के हिंदुस्तान में बहुत आभाव बा.

इहाँ त पीठ पीछे गाँधी जी के गरियावे वाला भी लोग बा. दोसरा तरफ सच्चाई ई बा कि गाँधी जी पूरा दुनिया में भारत के ब्रांड अम्बेसडर बाड़े. आजो कई जगे हिंदुस्तान के गाँधी के देश कहल जाला. एह महानायक के समझे खातिर इनका के ठीक से पढ़ल आ पढावल जरुरी बा.
इनका के ठीक से पढ़ लीहल जाव आ समझ लीहल जाव त हई गणतंत्र दिवस के लाल किलवा पर जवन भइल ह, उ कबो ना होइत. आदमी एतना कबो ना गिरित.

लोक में गांधीजी के देव तुल्य मानल जात रहे. एही से उनकर हत्या भइला पर नाथूराम के कोसत लोक के अभिव्यक्ति एह रूप में भइल बा —

गांधी रहले देसवा के रतनवा रे हरि
आजादी के सिपाही रहले
अहिंसा के पुजारी रहले
रे रामा नाथू लिहलै अल्हर परनवां रे हरि

गांधी के शहादत पर भी भोजपुरिया इलाका कराह उठल रहे. एह भाव के लोकगीत में देखल जा सकत बा-

बापू के सुरतिया
नाहीं भुले दिनवा-रतिया,
जियरा पागल भइलें ना.
नाचे अंखिया के समनवा
जियरा पागल भइलें ना..

आज गाँधी जी के पुण्यतिथि प हम उनका पावन स्मृति के नमन करत बानी.

(लेखक मनोज भावुक सुप्रसिद्ध भोजपुरी साहित्यकार हैं.)

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