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Bhojpuri शोध-समीक्षा के पहिल ग्रंथ 'रामकाव्य परंपरा में मानस' आ 'विप्र' के विप्रत्व

Bhojpuri शोध-समीक्षा के पहिल ग्रंथ 'रामकाव्य परंपरा में मानस' आ 'विप्र' के विप्रत्व

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ओइसे त 'विप्र' तखल्लुस आम तौर पर ब्राह्मण खातिर इस्तेमाल होला,बाकिर सही माने में ई अद्भुत पांडित्य आ विलक्षण प्रतिभा के बोध करावेला,जवन पुन्नश्लोक कमला प्रसाद मिश्र 'विप्र' प सटीक बइठेला. बहुआयामी शख्सियत के धनी डॉ 'विप्र' जी भोजपुरी के शुरुआतिए दौर में गद्य-पद्य विधन के विकास-बढ़न्ती में ऐतिहासिक योगदान कइनीं,उहंवें भारतीय संस्कृति के संपोषण-संरक्षण का दिसाईं रेघरिआवे जोग अगहर भूमिको निभवनीं.

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आत्मप्रचार से दूर रहिके भोजपुरी खातिर मिश्र जी के ताजिनिगी समरपन कबो भुलाइल ना जा सके.
स्फुट कविता,खंडकाव्य,प्रबंध काव्य, कहानी,उपन्यास,एकांकी नाटक,समालोचना,शोध-डॉ कमला प्रसाद मिश्र ‘विप्र’ के रचनाशीलता के अतना आयाम बाड़न स कि देखिके अचरज होला.गुणात्मक आ परिमाणात्मक दृष्टि से उहांके जतना साहित्य सिरिजनीं,ओमें से बहुत किछु अनछपल रहि गइल.बाकिर जवन छपल,अधिकतर मील के पाथर साबित भइल.इतिहास रचेवाला उहांके रचनाकर्म से त नवकी पीढ़ी वाकिफो ना होई,काहेकि निजी प्रयास से भोजपुरी साहित्य मंडल,बक्सर से प्रकाशित उहांके कई गो किताब अब उपलब्धो नइखी स.’संझवत'(कोलकाता) सकारात्मक पहल करत एगो ‘विप्र’ अंक जरूर निकललस,बाकिर मुकम्मल ‘विप्र रचनावली’ के प्रकाशन के दरकार बा.

कविता-संग्रह ‘मधुवन’ से ‘विप्र’जी के काव्यात्मक प्रतिभा के उठान भइल,जवना में अतीत,वर्तमान आउर आगत के बड़ा जियतार तस्वीर उकेरल गइल रहे.मुलुक आजाद भइल रहे आ गांधीवादी सोच के असर चौतरफा झलकत रहे.कवि के मन में अपना गौरवशाली सांस्कृतिक विरासत का प्रति असीम अनुराग रहे.वर्तमान के बदलाव के उहांके सजग निगाह से देखत रहनीं आ आवेवाला दिनन खातिर आस-हुलास से भरल रहनीं.एह से संग्रह के छंदोबद्ध कवितन में कुदरती छटा के भरमार रहे.कतहीं ‘खेतिहर पुकार’,त कतहीं ‘रोपनी के बहार’.कवि के खेत-बधार में तीरथ के दर्शन होत रहे-‘भइल बाटे तीरथ बधरिया’.’जेठ’ में देह के तलफे आ धरती के करसी-अस सुनुगे वाली उपमा देखते बनत रहे-

करसी अस सुनुगे धरती,
तन तलफि-तलफि रहि जाला.

महापंडित राहुल बाबा ‘मधुवन’ में पइसिके एकरा माधुर्य के भरपूर सराहना कइले रहनीं.

स्फुट कविता से कवि के पयान भइल खंडकाव्य आ प्रबंधकाव्य का ओर.खंडकाव्य ‘वीर बाबू कुंवर सिंह’ के सिरिजना 1857 के आजादी के लड़ाई के सइ बरिस पूरा भइला के मोका प 1957में भइल रहे,जवना में क्रांति-सपूत बाबू कुंवर सिंह के लरिकाईं से लेके शहादत तक के झांकी काव्यात्मक कौशल से पेश कइल गइल रहे.सउंसे कथा कुल्हि पांच गो अध्याय में समेटल गइल रहे-बंस आ बचपन,जवानी आ राजकाज,जंग के उमंग,परजटन आ संगठन, अंतिम जंग आ
बैकुंठ.छंद के छटा आ भाषा के पनिगर
प्रवाह अपना धार में बहवले लेले जात रहे.

ओज से लबालब भरल एह कृति में कई गो रसन के परिपाक भइल रहे.कतहीं अनुप्रास के बारंबार आवृत्ति, त कहीं उपमा-उपमेय के अभिभूत करेवाला प्रयोग.लड़ाई के दृश्य में हथियारन के इस्तेमाल से मूड़ी के कछुआ-अस आ धड़ के घरिआर-अस उछड़े के अद्भुत बिंब बा-

कचमच भाला,बरछा खचखच आ
दननदनन गोली दनकलि.
छपछप कटार फरसा तेगा आ
ठननठनन लाठी ठनकलि..

जंग बीच जुझला गोरन से
लागल लहू बहे पवनार.
कछुआ अस उछड़े मुड़िया आ
धड़ जइसे सरके घरियार..

किताब के भूमिका में कविवर वाल्मीकि प्रसाद ‘विकट’ के कहनाम रहे-‘बाबू कुंवर सिंह पर कविवर विप्र जी के किताब पढ़िके हृदय गदगद हो गइल.भोजपुरी भाषा में अइसन पोढ़ साहित्य के निरमान अभी तक नइखे,कम देखाई देता.लोकभाषा में अइसन सजगर प्रवाह कवनो बड़हन कविए कर सकेला–हमार ख्याल बा कि अइसन कविता, जवन हृदय से निकलल बा,सबके जबान पर देखाई दीही.’

सचहूं, क्रांतिकारी वीर कुंवर सिंह के ई शौर्यगाथा राष्ट्र आ राष्ट्रीयता खातिर तन-मन-धन से समर्पित उन्हुका आखिरी सांस ले वीरतापूर्वक जूझेवाली जिनिगी के अमर दास्तान बा,जवना के भोजपुरी के कुंवर सिंह पर पहिल खंडकाव्य होखे के गौरव प्राप्त बा.

भोजपुरिया समाज में आध्यात्मिक चेतना जगावे आ आत्मबल के अउर ताकतवर बनावे का गरज से ‘विप्र’जी ‘दुर्गासप्तशती’ के भोजपुरी छंदानुवाद कइले रहनीं.तेरह अध्याय में बंटाइल ‘सप्तशती’ के सात सइ श्लोकन के भोजपुरी में छंदोबद्धता प्रभावी बनि परल बा.दैन्यभाव से माई दुर्गा के गोहरावत कवि के अरज बा-

धइ कइ रूप आ भेस भवानी,बधली बीज रकत असुरन के,
शुंभ-निशुंभ दइंत संहारत,कइके दया दुख हरलीं सुरन के.
जुग जुग से भक्तन गोहरवलन,दुखवा दरिद्र आ ताप हरन के,
होइ सहाय सबे उपरवलीं, ‘विप्र’ भरोस बा मातु चरन के.

चूंकि ‘विप्र’जी के पूज्य पिताजी स्वर्गीय शिवनंदन मिश्र ‘नंद’ अपना जमाना के नामी कवि-नाटककार आ चउदह भाषा के पंडित रहनीं,एह से विप्र जी के साहित्यिक संस्कार विरासत में मिलल रहे.नंद जी तुलसी के रामचरित मानस के सुन्दर काण्ड के मैथिली अनुवाद कइले रहनीं.विप्र जी में लरिकाइएं से रामकथा का प्रति रुझान बढ़त चलि गइल आ स्वाध्याय का संगहीं मानसमर्मज्ञन के कथा-प्रवचन के उहां पर गहिर असर परल,जवना के सुखद परिणति ‘रामकाव्य परंपरा में मानस’ के सिरिजना से भइल.एकरा के भोजपुरी के शोध-समीक्षा के पहिलका ग्रंथ मानल जाला.छत्तीस अध्याय में विभक्त ई ग्रंथ इतिहास रचि चुकल बा.वाल्मीकि-तुलसी कृत रामायण का अलावा ऋषि-मुनियन के श्रुति में, लोक में,महाभारत में,बौद्ध साहित्य में, जैन साहित्य में, धार्मिक साहित्य में, पुराण में, भागवत पुराण में, देश-विदेश के चरचा में जहां -जहां राम से संदर्भित प्रसंग आइल बा,समीक्षक ‘विप्र’जी ओकरा के सोदाहरण तर्कसंगत ढंग से वर्णित-विश्लेषित कइले बानीं आ इतिहास सम्मत महत्ता के खास तौर से रेघरिअवले बानीं.मानस के सातों काण्ड का अलावा तुलसी बाबा के अउर कृतियन-कवितावली,गीतावली,दोहावली,रामाज्ञा,रामलला नहछू,जानकी मंगल, वैराग्य संदीपनी,विनय-पत्रिका, श्रीकृष्ण गीतावली- में रामकथा के अलग-अलग आयामन के विवेचित-विश्लेषित कइल गइल बा.प्रामाणिक तथ एह ग्रंथ के खासियत बा, जवन समीक्षक के लमहर शोध-साधना के प्रतिफल बा.
ग्रंथ के रचना-प्रक्रिया का बारे में ‘विप्र’जी’ कवित विवेक एक नहिं मोरे’ के तहत लिखले बानीं-‘रामकाव्य अतना व्यापक बा.

जे एह में कवि बनल आसान बा.गोस्वामी जी त ई कहिके निमुकि गइलीं जे ‘कवित विवेक एक नहिं मोरे’.हम का कहिके निमुकबि?ई नइखे बुझात आ एही से गोस्वामीजी के उहे कथन दोहरावेके साहस जुटाइके मनचरचा रूप में एह ग्रंथ में विद्वान पाठक लोगन का सोझा राखल उचित समझलीं.मानसचतु:शती का अवसर पर ‘मानस के मोती’ नाम से राम बरनन ग्रंथ लिखेके पहिलहीं से प्रारंभ कइले रहीं आ एह ग्रंथ बदे अनघा ग्रंथ, पुस्तक,पत्र-पत्रिका के सामग्री नि:संकोच लिहलीं.रामायन आ मानस मर्मज्ञ लोगन का प्रवचन आ अयोध्या, प्रयाग, चित्रकूट आ काशी-भ्रमण का अलावे देश-विदेश के विद्ववानन का पत्राचार से एह ग्रंथ का तेयारी में भरपूर बल मिलल.’

ग्रंथ के महातम प रोशनी डालत प्रख्यात कथाकार स्व विवेकी राय जी के कथन रहे-
‘रामकाव्य परंपरा में मानस’ ऐसी पहली मानक भोजपुरी कृति होगी जिसकी मौलिकता और विवेचन की सार्थकता देखते खड़ी बोली और अन्यान्य भाषाओं में अनुवाद की आवश्यकता का अनुभव होगा.’
ग्रंथ के खूबी के बखान करत भोजपुरीरतन

डॉ रामविचार पाण्डेय जी लिखले रहनीं-‘हमरा अनुसार, एह ग्रंथ में विप्र जी के विप्रत्व बा.समीक्षा के तीन मुख्य रूप होखेला-निर्णयात्मक,तुलनात्मक,विश्लेषणात्मक आ तीनू के मरम विप्र जी सज से पहचनले बाड़न.समीक्षा के सरूप ऐतिहासिक का साथ-साथ साहित्य का नौ रसन का अलावे भक्तिरस से सराबोर हो गइल बा.’
खाली अतने ले ना,डॉ बुद्धिनाथ मिश्र, जे ओह घरी दैनिक ‘आज'(वाराणसी)में सहायक संपादक रहलन,एह ग्रंथ के फादर कामिल बुल्के के कृतियो से ज्यादा उपयोगी आ सूचनापरक बतावत कहले रहलन-‘रामकाव्य परंपरा में मानस’ भोजपुरी का प्रथम समीक्षा ग्रंथ है.रामकथा पर इस तरह का एक संदर्भ ग्रंथ खड़ीबोली में है जिसके लेखक हैं फादर कामिल बुल्के, लेकिन दोनों का तुलनात्मक अध्ययन करने के बाद मुझे विप्र जी का यह ग्रंथ ज्यादा उपयोगी और अद्यतन सूचनाओं से युक्त लगा.कारण यह है कि बुल्के साहब जहां रामकथा को यथावत पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर अंतिम निर्णय का भार पाठकों पर छोड़ देते हैं, वहां विप्र जी तथ्यों के मूल तक वैज्ञानिक दृष्टि से पहुंचने की कोशिश करते हैं और अपनी स्थापना को तर्कसंगत बनाने के लिए एक नहीं,अनेक पुष्ट प्रमाण देते हैं.ये प्रमाण उन्हें सहज नहीं मिल गये हैं.इनकी खोज में उन्हें वर्षों साधना करनी पड़ी होगी.इसलिए मैं कह सकता हूं कि रामकथा पर इतना सूचनात्मक ( Informative)ग्रंथ दूसरा कोई नहीं है.’

आजु के मौजूदा दौर में शिव-चरचा खूब बढ़ि-चढ़िके हो रहल बा.बाकिर ‘विप्र’ जी ओही घरी एगो आउर शोध-समीक्षा के ग्रंथ रचि देले रहनीं-‘भारतीय संस्कृति में भगवान शिव’.ओह शोध ग्रंथ में अलगा अलगा रूप में उपनिषद-महाभारत में, पुराण में, मानस में, भोजपुरी लोकसाहित्य में,मिथिला संस्कृति में भगवान शिव के मौजूदगी आ महातम के विस्तार से प्रामाणिक विवेचन कइल गइल रहे.भारतीय दर्शन का संगें, योग का संगें शिव के जुड़ाव के व्यापक रूप से चरचा रहे.ओह में शिवलिंग के निरमान,पूजन,उपासना पद्धति से शिवत्व हासिल करेके तौर-तरीका आ जरूरत पर जोर दिहल गइल रहे.’विप्र’ जी के त ‘भगवान शंकर’ शीर्षक से प्रबंधकाव्य प्रकाशनो के योजना रहे.खैर,ऊ महाकाव्य मुकम्मल त छपि ना पावल,बाकिर ओह में से किछु यादगार प्रसंग एही ग्रंथ के पद्य भाग में प्रकाशित भइल रहे.सतीमोह से सतीदाह ले,पार्वती जनम, उमा परीक्षा से लेके शिव विवाह ले,गंगावतरण,त्रिपुर विनाश,हलाहल पान,जगत रचना आ नारद मोह के कथा-प्रसंग बड़ा सरस ढंग से छंदोबद्ध कके रचल गइल बा.’मनचरचा’ में ‘विप्र’ जी विस्तार से रोशनी डलले रहनीं कि अपना देश के कवना-कवना कोना में आ विदेश में कहां-कहां शिव आराधना के परिपाटी रहल बा.गरलपान कऽके शिवत्व हासिल करेवाला शिव के चित्र उरेहत कवि के पांती रहे-

कालकूट मुंह ढरले महाप्रभु
शोभति कंठ में नील निशानी.
रूप अनूप महामहिमा शिव
ना दुनिया बिच में अस दानी.
बहतर छाल बासन तुमड़ी बा
माथ जटा गंगा महरानी .
सब कुछ देत सदा शिव जग के
के समरथ परताप बखानी?

‘विप्र’ जी के रचनाशील व्यक्तित्व के एगो रूप उपन्यासकारो के बा.’मुंडदान’ उहांके रचल एगो ऐतिहासिक उपन्यास रहे,जवन देश के आजादी के हवनकुंड में मुंडदान देबेवाला अनाम शहीदन के शहादत पर केन्द्रित रहे.’विप्र’जी खुद स्वाधीनता संग्राम सेनानी रहनीं.महात्मा गांधी के आवाहन पर पढ़ाई छोड़िके उहांके एह संग्राम में कूदि परल रहनीं.सन् 1930से1966ले उहांके कांग्रेस के एगो कर्मठ,ईमानदार आ समरपित कार्यकर्ता रहनीं.ओही दौर के लोमहर्षक कथा एह उपन्यास में वर्णित बा.

नाटक के दृश्य-श्रव्य काव्य मानल जाला.संस्कृत में कहल गइल बा-‘काव्येषु नाटकं रम्यम्,नाटकान्त कवित्वम्!’ ‘विप्र’ जी के एकांकी नाटक एह कसौटी पर खरा उतरत रहलन स.उहांके आजादी के पहिल लड़ाई 1857के अमर सेनानी पर अविस्मरणीय नाटक लिखनीं-‘वीर मंगल पांडे’.डॉ उदयनारायण तिवारी जी ओह नाटक के बेजोड़ मनले रहनीं आ मूल्यांकन का क्रम में कहले रहनीं कि नाटककार ऐतिहासिक चरित्र का संगें पुरहर नियाय कइले बाड़न.ऊ नाटक देखनिहार आ पढ़निहारन पर अमिट छाप छोड़ले रहे.’विप्र’ जी के दूगो अउर एकांकी नाटक आकाशवाणी से प्रसारित भइला का बाद ‘मोती के घवद’

शीर्षक संग्रह में प्रकाशित भइलन स.पहिलका एकांकी रहे ‘प्रन’ आ दोसरका ‘किसान के बेटा’.दूनों नाटकन में आदर्शोन्मुख यथार्थ के चित्र उकेरल गइल रहे.’प्रन’ में ओह ग्राम पंचायत के चरचा बा,जवना में स्त्री के परदा-प्रथा से बहरी ले आके विकास-बढ़न्ती करेके जरूरत बा.’किसान के बेटा’ में जीयत-जागत बापू के सरूप किसान के बेटा का रूप में गढ़ल गइल बा ,जवना से कि ऊ ग्राम सुराज के सपना सच कऽ सके.इन्हनीं प गाधीजी के प्रभाव साफ झलकत बा.

पत्रकारिता से लेखकीय जिनिगी के शुरुआत करेवाला ‘विप्र’जी ओइसे त कई विधन में अपना सिरिजना के जादू से अभिभूत कइनीं, बाकिर एगो भावप्रवण जियतार कवि आ भारतीय संस्कृति के संपोषण-उन्नयन के दिसाईं शोध-समीक्षक का रूप में उहां के इतिहास रचेवाला अवदान के कबो भुलावल-बिसरावल ना जा सके.स्व कुलदीप नारायण राय ‘झड़प’ के शब्द में उहां के सारस्वत साधक शख्सियत के पावन इयाद में हमार प्रणामांजलि!

कलम कमाल जेकर कमला प्रसाद मिश्र
कलम का नोक पर कमल खिलाईंले,
भारतीय भावना के जाग्रत प्रतीक हईं
भारतीयता के जोति सगरी जगाईंले.
हंसिके,हंसाइके,रिझाइ समुझाइ के
भा डांटि-फटकारि साफे सबके सुनाईंले,
साधक साहित्य के आराधक राष्ट्रीयता के
कहबे करींले नाहीं कइके देखाईंले ..

(भगवती प्रसाद द्विवेदी वरिष्ठ पत्रकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

Tags: Bhojpuri Articles, Bhojpuri News

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