Bhojpuri: काशी में चमत्कारिक महाशिवलिंग, तिल तिल बढ़त हौ आकार

तिलभांडेश्वर महादेव के शिवलिंग के बारे में किवदंती हौ कि जवने स्थान पर इ शिवलिंग हयन, उहां प्राचीन काल में खेत रहल अउर खेत में तिल क फसल रहल. तिल के खेत में एक दिन अचानक शिवलिंग अवतरित भइलन.

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  • Last Updated: March 19, 2021, 2:56 PM IST
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बाबा विश्वनाथ क नगरी काशी अपने आप में एक चमत्कार हौ. वेद, पुराण में दर्ज काशी के देव नगरी भी कहल जाला. मान्यता हौ कि भगवान शिव या त कैलाश पर्वत पर रहयलन या फिर काशी में विश्राम करयलन. इहां मौजूद कई विग्रह अउर शिवलिंग स्वयंभू हयन. तिलभांडेश्वर महादेव अइसनय एक स्वयंभू महाशिवलिंग हयन, जेकर वर्णन शिव पुराण में हौ. इ शिवलिंग शहर क सबसे बड़ा शिवलिंग हयन अउर खासियत इ हौ कि एनकर आकार लगातार बढ़त हौ. कुछ लोगन क कहना हौ कि शिवलिंग क आकार हर रोज तिल बराबर बढ़यला त कुछ मान्यता हौ कि साल में मकर संक्रांति के तिल बराबर आकार बढ़यला.

तिलभांडेश्वर महादेव के शिवलिंग के बारे में किवदंती हौ कि जवने स्थान पर इ शिवलिंग हयन, उहां प्राचीन काल में खेत रहल अउर खेत में तिल क फसल रहल. तिल के खेत में एक दिन अचानक शिवलिंग अवतरित भइलन. स्थानीय लोग शिवलिंग देखि के चकित रहि गइलन. सब लोग शिवलिंग के तिल चढ़ाइ के पूजा-अर्चना कइलन. दक्षिण भारत क ऋषि विभांडक आज के लगभग दुइ हजार साल पहिले काशी दर्शन करय आयल रहलन. केदारेश्वर क दर्शन कइले के बाद जब उ विश्वेश्वर यानी बाबा विश्वनाथ क दर्शन करय बदे आगे बढ़लन तब रस्ते में इ महाशिवलिंग देखि के चकित रहि गइलन. शिवलिंग क अकार हर रोज बढ़त रहल. शिवलिंग से जोति निकलल अउर अकाशवाणी भइल. अकाशवाणी में कहल गयल कि कलयुग में जे भी एह महाशिवलिंग क दर्शन अउर स्पर्श करी ओहके मोक्ष मिलि जाई. विभांडक ऋषि एकरे बाद विश्वनाथ जी नाहीं गइलन अउर एही ठिअन रहि के तपस्या कइलन. एही कारण से शिवलिंग क नाम तिलभांडेश्वर पड़ल.

तिलभांडेश्वर के आकार वृद्धि के बारे में कहल जाला कि सतयुग से द्वापर युग तक इ शिवलिंग हर रोज तिल बराबर बढ़त रहल. कलयुग में भी शिवलिंग में वृद्धि जारी रहल. काशी क लोग शिवलिंग में हर रोज क वृद्धि देखि के चिंतित भइलन. सबकर चिंता इ रहल कि अगर शिवलिंग अइसय बढ़त रही तब एक दिन पूरी दुनिया शिवलिंग में समाइ जाई. काशी क लोग शिवरात्रि के भगवान शिव क अराधाना कइलन. भगवान शिव प्रसन्न होइ के आश्वासन देहलन कि शिवलिंग अब साल में खाली एक बार मकर संक्रांति के तिल बराबर बढ़ी. लेकिन कुछ लोगन क कहना हौ कि शिवलिंग आज भी हर रोज बढ़त हौ. दूनों बाती में से कवन सही हौ, एकर परीक्षण हाल फिलहाल नाहीं भयल हौ.

लेकिन लगभग ढाई सौ साल पहिले अंगरेज प्रशासन शिवलिंग क परीक्षण कइले रहलन. तिलभांडेश्वर शिवलिंग के बारे में जब अंगरेजन के पता चलल तब ओन्हय विश्वास नाहीं भयल. उ एकर परीक्षा लेवय क योजना बनउलन. काशी के विद्वानन अउर अंगरेजन क एक कमेटी बनल. कमेटी के देखरेख में महाशिवलिंग क परीक्षण भयल. शिवलिंग पर नारा बांधि के गर्भगृह 24 घंटा बदे सील कइ देहल गयल. गर्भगृह के जब दोबारा खोलल गयल तब नारा टूटल मिलल. एह तरह से महाशिवलिंग के आकार में वृद्धि क बात प्रमाणित होइ गयल. एकरे बाद से अंगरेज तिलभांडेश्वर शिवलिंग के श्रद्धा की दृष्टि से देखय लगलन. शिवलिंग परीक्षण के बाद काशी क विद्वान लोग मंदिर क नवग्रह बंधन कइलन. शिवलिंग क अधार आज तक रहस्य बनल हौ.
तिलभांडेश्वर शिवलिंग के चमत्कारिक होवय क प्रतिष्ठा हलांकि सम्राट अशोक अउर मुगल काल में ही स्थापित होइ गयल रहल. जब शिवलिंग तोड़य क कई कोशिश विफल होइ गइल. सम्राट अशोक जब बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार में व्यस्त रहल तब उ तिलभांडेश्वर के तोड़य क आदेश देहलस. लेकिन अशोक के सैनिकन पर भवरन क झुंड अइसन टूटल कि उ शिवलिंग तोड़ि नाहीं पइलन, अउर उहां से जान बचाइ के भगलन. मुगल काल में भी तिलभांडेश्वर के तोड़य क तीन बार कोशिश भइल, लेकिन सफलता हाथ नाहीं लगल. सैनिक जब भी शिवलिंग तोेड़य गइलन, भवरन क झुंड मंदिर तोड़ू दस्ता पर टूटि पड़ल.

ऋषि विभांडक से जुड़ले के नाते दक्षिण भारत क लोग, खासतौर से मलयाली श्रद्धालु बड़ी संख्या में इहां दर्शन-पूजन बदे आवयलन. पिछले तीन सौ साल से तिलभांडेश्वर मंदिर अउर मठ क सेवा केरल क मलयाली महात्मा लोगन के हाथे में हौ. मान्यता हौ कि प्रयागराज में संगम अउर दशाश्वमेध घाट पर हजार बार नहइले से जेतना पुन्य मिलयला, ओतना पुन्य तिलभांडेश्वर महादेव क एक बार दर्शन अउर स्पर्श कइले से मिलि जाला. मान्यता इ भी हौ कि तिलभांडेश्वर पर एक लोटा जल चढ़इले से नौग्रह क बाधा दूर होइ जाला. शनि क ध्यान कइके शिवलिंग पर तिल चढ़इले से शनि क दोष मिटि जाला.

बनारस के सोनारपुरा महल्ला में घनी बस्ती में मौजूद तिलभांडेश्वर महादेव के मौजूदा मंदिर क निर्माण कई सौ साल पहिले विजयानगरम क राजा करउले रहलन. मंदिर तीन मंजिला हौ. प्रवेश द्वार से अंदर घुसले पर दहिने तरफ गलियारा से नीचे जाइके विभांडेश्वर शिवलिंग हौ. विभांडेश्वर के दर्शन के बाद ही तिलभांडेश्वर के दर्शन क मान्यता हौ. मंदिर में बनारसी अउर मलयाली संस्कृति क सम्मिश्रण देखय के मिली. इहां भगवान अइप्पा क मंदिर भी हौ. एह मंदिर के आगे सीढ़ी चढ़ि के जब ऊपर जइबा तब बाई तरफ तिलभांडेश्वर महाशिवलिंग क गर्भगृह मिली. शिवलिंग देखि के हर कोई चकित होइ उठयला. सुरक्षा के नाते गर्भगृह के लोहा के जाली से घेरल हौ.



गर्भगृह के दहिने तरफ एक ठे छोट क मंदिर हौ, जवने में पार्वती माई क मूर्ति स्थापित हौ. एही मंदिर के बगल में लगभग 18 फुट ऊंचा शिवकोटिस्तूप हौ. इ स्तूप दक्षिण भारत क भक्त लोग बनवउले हउअन. दक्षिण से आवय वाले भक्त लोग कागज पर शिव-शिव दुइ बार लिखि के स्तूप में डालयलन. मंदिर के पुजारी के मुताबिक अबतक 10 करोड़ से अधिक शिव क नाम स्तूप में डालल जाइ चुकल हौ. तिलभांडेश्वर मंदिर आम श्रद्धालुन बदे तड़के पांच बजे खुलयला अउर रात नौ बजे बंद होइ जाला. दिन में दुपहर बाद एक से चार बजे तक गर्भगृह बंद रहयला. (लेखक सरोज कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं.)

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