Bhojpuri में पढ़ें- सेहत आ सवाद के खजाना मिथिला के मखाना

मिथिला में पैदा होखे वाला एगो अइसन फल बा,जवना के शोहरत के डंका देश-दुनिया में बाजेला आ ऊ अनमोल खाद्य पदार्थ हऽ-मिथिला के मखाना. जइसे दोसरा इलाका में पानी के सिंघाड़ा होला, ओइसहीं मिथिला के पोखरा में जलीय उत्पाद होला मखाना. उहां के जलवायु एकरा खेती खातिर हर तरह से माकूल होला.

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ओइसे त अपना देश के तमाम लोकभाषा आ बोलियन के एक-दोसरा का संगें सुभाविक जुड़ाव रहेला, बाकिर भोजपुरी आ मैथिली में जवन नेह-नाता के गहिराई आउर प्रगाढ़ता रहल बा, ऊ दीगर लोकभाषा से किछु अलग किसिम के बा.
तबे नू दिल्ली में एके संस्थान मैथिली-भोजपुरी अकादमी में दूनों भाषा के विकास आ बढ़ंती के रचनात्मक काम एके संगें होत आ रहल बा. अकादमी के पत्रिका 'परिछन' के प्रकाशन एने स्थगित बा, बाकिर ओमें मैथिली आ भोजपुरी के दमदार रचना एके साथे छपत रहली स.

नामी-गिरामी लोकगायिका पद्मश्री डॉ. शारदा सिन्हा के जनमभूइं रहल मिथिला में आ मातृभाषा रहे मैथिली, बाकिर उहांके प्रसिद्धि मिलल भोजपुरी के लोकगायिका का रूप में. शारदा जी के कहनामो होला-मैथिली हमार माई हऽ आ भोजपुरी मउसी. ई कहाउत मशहूर ह कि मुओ माई, जिओ मउसी. बाकिर हमनीं के त ई सोच होखे के चाहीं कि माई,मउसी, चाची, ताई-सभ जिओ.सभ भारतीय भाषा फुला स,फरऽ स आ लोकसंस्कृति के खूबसूरती-बढ़ंती बरकरार रहे. बहरहाल, बात मिथिला के होत रहे आ मैथिली ले पहुंचि गइल. दरअसल भषे नू ओह अंचल के सांस्कृतिक पहिचान होला. जनकवि विद्यापति के मिथिला आपन कई गो खूबियन के कारन जानल जाला. मिथिला के परान दरभंगा कबो द्वारबंग का नांव से जानल जात रहे, काहेंकि बंगाल के द्वार ह ई आ बांग्ला संस्कृति के असर इहां अक्सर देखे के मिलेला. मेहमान के स्वागत-सत्कार सउंसे मिथिला में देखते बनेला. बंगाल के रसगुल्ला मिथिलो में खूब खाइल-खिआवल जाला. शादी-बिआह आ दोसर परोजन में आखिरी आइटम होला ठूसि-ठूसिके बरिआरी रसगुल्ला खिआवल.

मेहमान नवाजी के आलम ई होला कि अतिथि के जब ले पेट खराब ना हो जाउ,तब ले ई ना मानल जाला कि ठीक से अतिथि-सत्कार भइल. सांच पूछीं त खाए-खिआवे में मिथिला के जवाब नइखे. मिथिला के मैथिल (मिथिलावासी) के रहन-सहन आ खानपान के खास अंदाज होला.चार गो चीजु मिथिला के पुरान पहिचान मानल गइल बा- पोखर, पान, माछ, मखान.
कहलो जाला-

मिथिला के पहिचान पुराना
पोखर-पान आ माछ-मखाना!

मिथिला के पहिल निशानी होला उहां के पोखरा. ई पोखरा बहुतायत में मिली. ई कहल कि मिथिला के आन-बान-शान ह पोखरा, कवनो अतिशयोक्ति ना होई. दोसर खूबी ई हऽ कि हरेक मिथिलावासी पान-परेमी होला. मरद-मेहरारू-सभे पान के सौखीन होलन आ घरे-घरे पान आ पनबट्टा जरूर लउकी.उहवां बड़ा नेह-छोह से खुदे पान लगाके मेहमान के सेवा में हाजिर कइल जाला.

मिथिला के लोग मछरी के सौखीन होलन. जइसे बंगाली लोग मछरी के बेगर खानपान के व्यंजन अधूरा मानल जाला, ओइसहीं मिथिला के हर जाति-बिरादरी में समान रूप से मछरी के सेवन कइल जाला. इहां तक कि पूजा-पाठ आ धार्मिक अनुष्ठानो में मछरी खाए-खिआवे के महातम होला. अपना पोखरा में पोसल मछरी के पसंदीदा व्यंजन मानल जाला.

बाकिर एह सभसे अलग मिथिला में पैदा होखे वाला एगो अइसन फल बा,जवना के शोहरत के डंका देश-दुनिया में बाजेला आ ऊ अनमोल खाद्य पदार्थ हऽ-मिथिला के मखाना. जइसे दोसरा इलाका में पानी के सिंघाड़ा होला, ओइसहीं मिथिला के पोखरा में जलीय उत्पाद होला मखाना. उहां के जलवायु एकरा खेती खातिर हर तरह से माकूल होला. एही से उहां के ताल-तलैया, पोखरा,झील भा दलदली पानी के ठहराव में मखाना के उपज होला आ ई पोषक तत्वन से अइसन भरल-पुरल होला कि देश-विदेश में एकर भरपूर खपत होला.

आजु जब किसिम-किसिम के रोग-बियाधि के बोलबाला बा आ शरीर के प्रतिरोधक ताकत बढ़ावे के बात बढ़ि-चढ़िके होत बा, सभ गुन आगर मखाना के सहजे इयाद हो आवत बा. एकरा सवादो के विविध रूप बा. जदी मिठास पावे के होखे, त मखाना के दूध में खीर बनाईं. चूंकि एके अनाज ना,फल मानल जाला, एह से बरत-तेवहार भा अनुष्ठान में भुखलो पर ई खीर खाइल जा सकेला. अगर लैनू(मक्खन) में मखाना के भूंजिके सूप(पेय) का संगें एकर इस्तेमाल करीं, त ई ना खाली जायका बढ़ाई, बलुक पौष्टिकता के भरपाइओ करी.

चिनिया बादाम, सरिसो आ मसाला-नून का संगें पीसिके मखाना के चटनी बनावल जाला. सिरिफ सवादे खातिर ना,मखाना के इस्तेमाल रामबान औषधियो का रूप में कइल जाला. मखाना में कैल्शियम के मात्रा खूब पावल जाला, एसे वातरोग-गठिया, जोड़ के दरद में ई लाभकारी होला. एंटीऑक्सीडेंट के खूबी के वजह से ई भोजन पचावे में अगहर भूमिका निबाहेला. एस्ट्रीजन के गुन के चलते दस्त(लूज मोशन) से निजात मिलेला. ओहू से खास बात ई बा कि मखाना स्प्लीन के डिटाक्सीफाई कऽ देला आ किडनी के मजबूती दिअवावे में एकर भूमिका भुलाइल ना जा सके.

मौजूदा दौर में दिमागी तनाव का चलते जनमानस नींन ना आवे,चिनिया रोग (डाइबिटीज)आ दिल के बेमारियो से पीड़ित बा. मखाना के सेवन से एह किसिम के रोग ना होखे पावे. अगर मखाना के महज चार गो दाना सबेरे उठिके खाली पेट खा लिहल जाउ, त चिनिया रोग (सुगर) से सहजे मुकुती मिलि जाई. मखाना के नियमित सेवन से दिल के दौरा परे के खतरा कम हो जाला. ई भोजन पचावे में पाचको के काम करेला. जदी मानसिक तनाव से परेशान होईं आ नींन ना आवत होखे, त रात में सूते के पहिले गरम दूध में मखाना डालि के पी जाईं. रोज ई सिलसिला जारी रखला से भरपूर नींन लागी आ दिमागी तनाव-दबाव से छुटकारा मिलि जाई. खउलत दूध में मखाना का संगें किशमिश आ बादाम के सेवन से शरीर के प्रतिरोधक क्षमता बनल रही.

मिथिला के पोखरा में जलीय उत्पाद मखाना के आमद मनई के जिनिगी के मीठ, नमकीन, खटतुरुस रंग भरे का गरज से भइल रहे आ आजुओ ई कुदरत के एगो अनमोल तोहफा से कम नइखे. जरूरत एह बात के बा कि पच्छिम के अंधानुकरण करेवाला आधुनिक समाज मखाना के 'घर के मुर्गी दाल बरोबर' मत बूझे आ प्रकृति के एह सवदगर सेहतमंद वरदान के अपनाके जिनिगी में खुशहाली ले आवे आउर रोग-बियाधि से दूर रहिके निरोगी काया पावे में कामयाबी हासिल करे. (भगवती प्रसाद द्विवेदी वरिष्ठ साहित्यकार हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)

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