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Bhojpuri: मोहिनी एकादशी- जब देवतन खातिर मोहिनी अवतार लेहलन विष्णु भगवान

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सनातन धरम में एकादशी तिथि क बहुत मान हौ. एकादशी के आम तौर पर लोग व्रत रखयलन. लेकिन मोहिनी एकादशी क व्रत खास हौ. भगवान विष्णु वैशाख सुदी एकादशी के मोहिनी अवतार लेहले रहलन. इ एकादशी एही के नाते मोहिनी एकादशी कहाला. एह साल गुरुवार के दिन पड़ले के नाते मोहिनी एकादशी मान अउर बढ़ि गयल हौ.

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हिंदू पंचांग के अनुसार, महीना में कुल दुइ ठे एकादशी पड़यलिन. यानी साल में 24 एकादशी. एकादशी तिथि भगवान विष्णु के समर्पित होला. भगवान विष्णु के प्रसन्न करय बदे लोग एकादशी व्रत रखयलन. लेकिन मोहिनी एकादशी क व्रत सबसे उत्तम मानल गयल हौ. मान्यता हौ कि मोहिनी एकादशी क व्रत रखय वालन पर भगवान विष्णु क विशेष कृपा होला, ओनकर कुल पाप कटि जाला, मउत के बाद मोक्ष मिलि जाला, दुबारा मृत्युलोक में जनम नाहीं लेवय के पड़त. काशी निवासी पंचांग मर्मज्ञ पंडित कमलेश नारायण मिश्र के अनुसार, मोहिनी एकादशी बुधवार 11 मई के ही संझा के सात बजि के 31 मिनट पर लगि गयल, अउर गुरुवार 12 मई के संझा के छह बजि के 51 मिनट तक रही. चूंकि व्रत उदयाचल तिथि में कयल जाला, एह के नाते मोहिनी एकादशी व्रत क मान 12 मई के ही हौ. व्रत पारण क समय 13 मई शुक्रवार के सुरुज उअले के बाद पांच बजि के 32 मिनट से आठ बजि के 14 मिनट के बीच हौ.

त्रेतायुग में जब भगवान विष्णु राम क अवतार लेइ के धरती पर अइलन त गुरु वशिष्ट ओन्हय मोहिनी एकादशी के महातम के बारे में बतइलन. एकरे बाद भगवान राम स्वयं मोहिनी एकादशी क व्रत कइले रहलन. द्वापर युग में भगवान कृष्ण के कहले पर राजा युधिष्ठिर भी मोहिनी एकादशी क व्रत रखले रहलन.

भगवान विष्णु के मोहिनी अवतार के पीछे एक ठे पौराणिक कथा हौ. देवासुर संग्राम में असुर लोग स्वर्ग पर कब्जा कइ लेहलन अउर उहां से देवतन के भगाइ देहलन. देवता लोग भागि के भगवान विष्णु के पास गइलन, अउर अपने रक्षा क गुहार लगइलन. भगवान विष्णु देवतन के समुद्र मंथन करय क सलाह देहलन. समुद्र मंथन अकेले देवतन के बस क बात नाहीं रहल. फिर देवतन क राज इंद्र असुरन क राजा बलि के पास गइलन, अउर दूनों मिलि के समुद्र मंथन क योजना बनइलन. क्षीरसागर में समुद्र मंथन शुरू भयल. समुद्र मंथन में एक-एक कइ के 14 अनमोल रतन निकललन. 14वें रतन के रूप में धन्वंतरी बईद अपने हाथे में अमरित क घड़ा लेइ के प्रकट भइलन. अमरित क घड़ा देखतय देवतन असुरन में फिर से संग्राम शुरू होइ गयल. भगवान विष्णु देवतन क रक्षा करय बदे मोहिनी रूप धइके प्रकट भइलन. ओह दिना वैशाख सुदी एकादशी रहल. भगवान विष्णु देवतन अउर दानवन से कहलन कि सब लोग लाइन में बइठि जा, सबके बराबर बराबर अमरित मिलि जाई. असुर लोग मोहिनी के रूप-सौंदर्य पर एतना सम्मोहित होइ गइलन कि सुध-बुध खोइ बइठलन. ओन्हय अमरित क ध्यानय नाहीं रहि गयल. परिस्थिति क फायदा उठाइ के भगवान विष्णु पूरा अमरित देवतन के पियाइ देहलन. देवता लोग अमर होइ गइलन. देवासुर संग्राम क ओही दिना अंत होइ गयल. तबय से वैशाख सुदी एकादशी मोहिनी एकादशी के रूप में खास बनि गयल. विष्णु भगवान के मोहिनी रूप क पूजा होवय लगल.

मान्यता हौ कि मोहिनी एकादशी के व्रत से मानसिक शांति त मिलबय करयला, मोह-माया से मुक्ति भी मिलि जाला. मोहिनी एकादशी क व्रत विधिविधान से कइले से मनोकामना भी पूरा होइ जाला. भगवान विष्णु भक्तन क कुल कष्ट हरि लेलन. ओनकर नाव एही के नाते हरि पड़ल हौ. खास कइके औरत लोग मोहिनी एकादशी क व्रत जादा करयलिन. एकादशी तिथि समाप्त होवय तक भगवान विष्णु के भक्ती में लीन रहयलिन. मोहिनी एकादशी के दिना सबेरय तड़के उठि के पानी में गंगा जल मिलाइ के नहाए के चाही. फिर साफ कपड़ा पहिनि के भगवान विष्णु क गंगा जल से अभिषेक करय के चाही, ओन्हय साफ कपड़ा पहिनावय के चाही, फिर भोग लगावय के चाही. भोग में तुलसी दल जरूर रहय के चाही. बिना तुलसी दल के भगवान विष्णु भोग स्वीकार नाहीं करतन.

(सरोज कुमार भोजपुरी के जानकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

Tags: Article in Bhojpuri, Bhojpuri

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