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Bhojpuri Spl: आधि-आधि रतिया के कुहुके कोयलिया... गजबे होखेला भोजपुरिया बिरह गीत!

भोजपुरी में एक से बढ़के एक बिरह के गीत बड़ुए, जेकरा सुन के दिल फाटे लागेला. केहु गांव से बाहर बा त ओकरो खातिर गीत त केहु प्रेमी से दूर बा त ओकरो खातिर. माने कि अइसन कवनो बिछोह नइखे, जेकरा पर भोजपुरी में गीत नइखे.

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 12, 2021, 8:30 PM IST
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जाड़ के बीच से चुपे-चुपे गरमाहट आइल शुरू हो गइल बा..घर में रह त ठंडा पहिलहीं नियर लागता. त बहरी घामा ढेर देरी ले बइठल नइखे जात..सुरूज भगवान के किरिन देरी ले बरदास्त नइखे होत. पछुआ के सरसराहट भी शुरू हो गइल बा... लागता कि बउराहट के मौसम दस्तक दे देले बा. आम के फेंड़ पर मोजरि के सुरसुराहटो बढ़ि गइल बा..अइसन मोका पर गांव ढेरे इयादि आवेला. ईहे मौसम ह, जब मधुमाखी सरसों-तीसी के फूलन पर कुछु ढेरे मंडराए लागेलीस. मधु बनावे के उहनी के प्रक्रिया एही घरी तेज हो जाला..

सरेह सरसों, तीसी, रहरि, बरे, बूंट आदि के फूल के गंध से गंउजाइल बा..त मधुमाखी भाला काहें ना आवस. अइसन माहौल में कोयल के कूक त जइसे करेजा में हूक में बढ़ा देले...एह हूक के महेंदर मिसिर के एह गीत में महसूस करीं...

आधि-आधि रतिया के कुहुके कोयलिया
राम बैरनिया रे भइले ना.
मोरा अंखिया के नीनिया


राम बैरनिया भइले ना..

बसंत के हवा बिरहे बढ़ावे ले. गांव-घर में पिया बाड़े त ठीक...बाकिर भोजपुरी माटी के अइसन भागि कहां. खेती-किसानी से पेट त भरि सकेला, बाकिर जिनगी के बाकिर जरूरत भला कइसे पूरा होई. त पिया जी के परदेस जाहीं के परी. अब परदेस में बइठल पिया एह बासंती बयार में इयादियो ना करिहें, त जियरा के का हालि होई? स्वाधीनता आंदोलन में सक्रिय रहले महेंदर मिसिर के करेजो एह दरद के समझत रहे, तबे त उनुका कलम के नोकि से ई भाव निकलल बा,एही गीत में बसंत के बीच बिरह से झुलसत गिहथिन के दरद देखीं...

पिया परदेसी ना पतिया पेठवलन
राम मलेरिया भइले ना..
मोरा छतिया के कोरिया
राम अनेरिया भइले ना

महेंदर मिसिर इहवें नइखन रूकत, उनुकर कलम के कमाल देखीं...

पुरूब के देसवा गइले,
मतिया मरइले
निरमोहिया भइले ना
कान्हा दागा देके गइले
निरमोहिया भइले ना..

भोजपुरी माटी के संकट रहल बा बिरह, एह बिरह के वजह रहल बा, भोजपुरी माटी में रोजी-रोजगार के कमी. भोजपुरी के बिरह गीतन से गुजरला के बाद एगो विचार बहुते शिद्दत से उठेला. आखिर भोजपुरी इलाका के मेहरारून के सुभाव में बागीपन नइखे, कम से कम घर-परिवार के प्रसंग में त एकदमे नइखे. धेयान दीं, बलिया के शोहरत ओकरा बागीपन, खरा बोली और एक सीमा तक अइँठन के वजह से बा, बाकिर देखबि कि इहां के मेहरारून में ऊ बागीपन नइखे. सोशल मीडिया के जमाना में नारी विमर्श बढ़ि गइल बा. सोशल मीडिया देखीं त ज्यादेतर मेहरारू लोग आपाना हाथ में विद्रोह के मशाल लेले बा. उनुका नजर में बिरह आदि पिछड़ापन बा, बाकिर भोजपुरी में बिरह जइसे सौंदर्य के नया उपमान रचता.
चूंकि बसंत सौंदर्य, प्यार, स्नेह, बउरहट के ऋतु ह, त जाहिर बा कि बिरह के रंग ओही ऋतु में ज्यादे लउकी. एह में देखीं, काताना किसिम के सौंदर्य बा. भोजपुरी के एगो लोकगीत देखीं. भोजपुरी मेहरारू सुभाव से शर्मीला हई लोग. बाकिर उनुको करेजे में एगो चाहत बा, कि जेकरा के ऊ पसन करेली, ऊ कम से कम उनुका ओरि ताकियो त देउ. तनी एह चाहत के देखीं...

रसिया तू हउअ के कर, हमरो पे तनिका ताक.
बहुते नजर फेरवल हमरो पे तनिका झांक..
कलियन के सेज राख पत्ता से हवा कर द.
हम प्रेम रोगी बानीं, तनिका त दवा कर द..

भोजपुरी-मैथिली लोकगीतन के आपाना सुमधुर कंठ से नया वितान रचे वाली शारदा सिन्हा जी के एगो मसहूर गीते के बोल बा...

कोयल बिन बगिया ना सोभे राजा.
जइसे कोयल बिना बगिया ना सोभे ले
ओइसहीं घर बिना घरनी के ना सोभे ला.

भोजपुरी इलाका में जब भउजी बाति से चिउंटी काटेली, कनिया कनखि से देखेली आ ओलवारे माई-मइया चुटकी लेबे लगली, समझि जाईं कि भोजपुरी माटी में बसंती बयार बहे लागलि बिया. आखिर अइसन होई काहें ना, जब पूरा मौसमे एही महक से पाटा गइल बा. तनी देखीं एह लोकगीत के...

आम मोजराई गइले
महुआ फुलाइल मन अगराई गइले ना.
देह नेहिया के रस में
रसाई गइले ना.

बसंत आवेला त भोजपुरी माटी के चांदनी रात कइसन लागेले, ओकर सोभा कइसन होला. ई त भोजपुरी माटी के लोगे जानी. चांदनी के सुभाव ह शीतलता, बाकिर बसंत के इहे चांदनी आपन शीतलता तब खो देली, जब पिया चाहें प्राण प्यारी लगे ना होखसु. एह गीत में भोजपुरी माटी के विरहिणी के दरद कइसे अभिव्यक्त भइल बा...

चननिया छिटकी मैं का करूँ गुंइया
गंगा मोरी मइया, जमुना मोरी बहिनी
चान सुरूज दूनो भइया
पिया का संदेस भेजूँ गुंइया

बिरहि के दरद से भोजपुरी लोकगीत खूब भरल बा. ओह दरद में मौसम और माहौल के गजब-गजब रूप लउकेला. बिरहिन के दरद रऊंआ तब बूझबि, जब रऊंआ समझबि कि जब पीपर के पेड़ से बसंत के भोर में झुरझुर बहे वाली हवा के तासीर कइसन होला. बिरहिन के दुख तब अउर बढ़ि जाला, जब घरे पिया नइखे. आ दुआरे-पिछवारे के पीपर गांछि के नीचे बिरहिन के ससुर भा बाबूजी सुतल बाड़े. ऊ चाहियो के लाजे-लेहाजे ओकर हवा ना खा सकेले. तनी एह भाव के देखीं...

मोरा पिछुअरिया पीपर बिरिछवा
आधि राति बहेला बयार
ताहि तर मोरे बाबा सेजिया डँसावेले
आइ गइले सुखनीन.

भोजपुरी लोकगीत में बसंत के माहौल के अद्भुत-अद्भुत वर्णन बा. जब महुआ चूए लागेला, ओकर मदहोस करे वाला गंध कइसे बउराहट बढ़ावेला, ओह महुआ के बिने जाए वाली सखी लोगन के का भाव होला, एह लोक रचना में देखीं...

मधुर-मधुर रस टपके, महुआ चुए आधी रात
बनवा भइल मतवारा, महुवा बिनन सखी जात.

भोजपुरी बासंती बयार के बात बिना भउजाई के चरचा के पूरा ना हो सकेला. भोजपुरी इलाका में भउजाई के स्थान हंसी-मजाक के त खूबे बा. कइ बार प्यारी से बात करे खातिर भउजाईए जरिया बनेली. बहरहाल भोजपुरी के एह लोक रचना में देखीं, कइसे रचनाकार भउजाइ के सौंदर्य के प्रकृति आ सरेह के सुंदरता से तोख देता...

पूसवा में फुले सरसइया हो लाल
भउजी के मुँहवा पियरइले हो लाल.

बंकिम चंद्र जी आपाना मसहूर गीत वंदेमातरम् में भारत माता के शस्य श्यामला कहले बाड़े. शस्य यानी फसल आ श्यामला माने कंचनार हरियाली से बनल सांवलापन. सही मायने में देखीं त बसंत के दिन में हमनीं के धरती माता हरियरी से अइसन भरि जाली, कि ऊ सांवरि लागे लागेली. ओह सांवलापन पर बीच में फूलल सरसों के पीयर आ तीसी के बैंगनी फूल अलगे डिजाइन बनावेला. अइसन माहौल में मन के बउराइल संभव बा, ओहि बउरहटि आ सौंदर्य के वर्णन से भरल बा भोजपुरी लोक साहित्य. ई भोजपुरी समाज के अनमोल थाती बा. बाजारवाद के दौर में एह थाती के संजोवल जरूरी बा. उम्मेद बा कि सौंदर्य, मोहब्बत आ बिरह के कोलाइडोस्कोप में एह के संजोवे के संकल्प रऊंआ सभ जरूर लेबि. (लेखक उमेश चतुर्वेदी वरिष्ठ स्तंभकार हैं.)
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