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Mother's Day Spl: लोक अउर विश्व साहित्य में माई के चर्चा

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स्वारथ से सटल एह संसार में निःस्वार्थ माई लेखां के बा? अच्छा त अच्छा बाऊर, बेहूदा आ निकम्मों बेटा खातिर माई के जीव कुहुकते रहेला, छछनते रहेला, छटपटाते रहेला, चिहुकते रहेला, हुलसते रहेला.का जाने भगवान होलें कि ना! बाकिर माई त साक्षात जीयत भगवान होली.

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लोक आ विश्व साहित्य में माई पर बहुत कुछ कमाल के लिखाइल बा, गद्य-पद्य दुनों में. सूरेदास से शुरू करsतानी-
“जसोदा हरि पालना झुलावै/हलरावै दुलराइ मल्हावै जोई सोई कछु गावै/ मोरे लाल को आइ निंदरिया काहे न आनि सुहावै.”-
राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त भारतीय नारी जीवन के मातृरूप के छवि साफा उभार देले बाड़न-“अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी / आंचल में है दूध और आंखों में पानी.”
चाहे- कह मां कह लेटी ही लेटी /राजा था या रानी? / मां कह एक कहानी.” –

जयशंकरो प्रसाद नारी के मातृरूपे के कहले बाड़े – “नारी! तुम केवल श्रद्धा हो/ विश्वास-रजत-नग पगतल में / पीयूष स्रोत-सी बहा करो / जीवन के सुन्दर समतल में.”

अपना शिशु के दूध पियावे के बेचैनी रामधारी सिंह दिनकर अपना एगो कविता में देखावत बाड़े-
“विवश देखती मां, आंचल से नन्ही जान तड़प उड़ जाती / अपना रक्त पिला देती यदि फटती आज बज्र की छाती.”

समकालीन कविता के महत्वपूर्ण कवि राजेश जोशी के चित्रण देखीं-
“सोने से पहले / मां / टूइयां के तकिये के नीचे / सरौता रख देती है / बिन नागा / मां कहती है / डरावने सपने इससे / डर जाते हैं.”

समकालीन कविता के एगो अउर कवि एकांत श्रीवास्तव के हृदयस्पर्शी कविता के महसूस करीं-
“शताब्दियों से उसके हाथ में सूई और धागा है / और हमारी फटी कमीज / मां फटी कमीज पर पैबंद लगाती है/ और पैबंद पर काढ़ती है / भविष्य का फूल.”

शायर मुनव्वर राणा दुनिया भर में माइये पर लिखल अपना शायरी खातिर जानल जालें-
“किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकां आई / मैं घर में सबसे छोटा था मेरे हिस्से में मां आई.

इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है / मां बहुत गुस्से में होती है तो रो देती है.
भोजपुरियो में माई पर खूब लिखाइल बा.‘पाती’ के संपादक अशोक द्विवेदी के एगो छंदमुक्त कविता बा-
माई दलान में बइठल अनाज फटकत/ गोहूँ से सरसों आखत/ अँगना में बइठि के चाउर बीनत/पहँसुल से हाली हाली/साग चीरत/बाल्टी का पानी से बरतन धोवत/कोठरी, दलान आ अँगना से/ लेले दुआरी ले झारत-बहारत/गाई का गोबर से घर लीपत/गोइंठा से चूल्हि सुनुगावत/ .. आज बहुत इयाद आवऽतिया माई’

लेले जइहs हमरो सामान हो, पूछिहें जवान सुगना .. जइसन लोकप्रिय आ मर्मस्पर्शी गीत लिखे वाला प्रतिष्ठित गीतकार राधा मोहन चौबे ‘अंजन ‘ जी के माई पर गीत बा –

जहिया माई के गोदिया के याद आई रे
तहरी अँखिया में गंगा के पाट आई रे

सुभाष चंद्र यादव के ‘ माई ‘ गीत त लगभग सभे सुनलहीं होई –

जग में माई बिना केहुए सहाई ना होई
केहू कतनो दुलारी बाकिर माई ना होई

हमार एगो शेर बा-मनोज हमरा हिया में हरदम / खुदा के जइसन रहेले माई
माई हमरा रचना-संसार के प्राण तत्व बिया.हमार पहिलकी कविता माइए पर रहे.’ भोजपुरी सम्मेलन पत्रिका’ में 1997 में छपल रहे-

भेजे में जब कबो देर होला चिट्ठी त
पंडीजी से पतरा देखावेले माई.
रोवेले रात भर, सूते ना चैन से
भोरे-भोरे कउआ उचरावेले माई.

सिनेमो में हमार पहिलका गीत माइए पर रहे – फिल्म ‘मेंहदी लगा के रखना-3’ (2020) –

मन के दरदिया अब के बूझी,
अब के पोंछी अँखिया के लोर.
केकरा आगे फूट के रोअब,
के समुझी सिसकी के शोर.
बिन कहले दुखवा जे बूझे,
अइसन के हो पाई?

लंदन-अफ्रीका रहनी तबो दिन-रात दिल में माइए धड़के-

ए बबुआ, नइखे हमरा डालर-फालर के काम.
रहs आँख के सोझा हरदम माई कहे हमार..

माई पर हमार ई गीत खूब गवाइल, खूब लोकप्रिय भइल-

बबुआ भइल अब सेयान कि गोदिए नू छोट हो गइल
माई के अँचरा पुरान, अँचरवे में खोट हो गइल.

उज्ज्वल पांडेय निर्देशित लघु फिल्म कुक्कुर में निरहुआ पर फिल्मावल शैलेन्द्र मिश्रा के आवाज में माई पर हमार ई गजल खूब पसंद कइल गइल-

हजारों गम में रहेले माई
तबो ना कुछुओ कहेले माई

हमार बबुआ फरे-फुलाये
इहे त मंतर पढेले माई

बाकिर अपना एह रचना-संसार से बहरी निकल के जब विश्व साहित्य पर विहंगम दृष्टिपात करेनी त लागेला कि हम त अभी बहुत बच्चा बानी. दुनिया में माई पर बहुत कुछ कमाल के लिखाइल बा, गद्य-पद्य दुनों में.

आईं अब विश्व साहित्य में माई पर बात कइल जाय.डी. एच. लॉरेंस अंग्रेजी के प्रतिष्ठित उपन्यासकार मानल जालें.उनके एगो बेस्टसेलर उपन्यास “सन्ज एण्ड लवर्स” में माई के भूमिका बढ़िया से गढ़ाइल बा.माई जरट्रूड मोरेल के उनका पति से कम बनत बा.उनके पति के कमाई कम बा अउरी बार में जाए के आदत बा.ऊ अपना पत्नी पर हिंसो करत बाड़ें.जरट्रूड के बड़ बेटा विलियम अपना माई के करीब बा अउरी उ बाप से भी माई खातिर लड़ जात बा.विलियम के अकस्मात मृत्यु हो जात बा.माई टूट जात बाड़ी, फेर उ अपना छोट बेटा औरी उपन्यास के दूसरा हिस्सा के मुख्य नायक पॉल मोरेल में आपन दुनिया खोजे लागत बाड़ी.ऊ बेटा के लेके एतना मोह में आ जात बाड़ी कि पॉल के जीवन के दू को प्रेम मिरियम आ क्लारा से रिश्ता जल्दी बनही नइखी देत.

माई कई बार एह बात से भी डेराले कि पतोह अइला के बाद बेटा बदल जाई.अइसन होखबो करेला.अपना इहाँ एगो रसम बा, बियहे जात बेटा के परछावन के बेरा माई ओकरा के सांकेतिक रूप से दूध पियावेले; ई आखिरी बार माई के दूध कवनो बेटा पीयेला.माई ओही दिन अपना बेटा से मोह छोड़वा लेले. हालांकि ई एगो रसम ह, माई कहवाँ बेटा के मोह जिनगी में छोड़ पावेले, कबो ना.

रूस के महान लेखक मैक्सिम गोर्की के रचना संसार के अधिकांश लोग कायल बा.उनके एगो प्रसिद्ध उपन्यास बा ‘मदर’.ई उपन्यास उ 1906 के अमेरिका के यात्रा के दौरान लिखले रहलें.पेलगुया एगो कठिन परिश्रम करे वाली मजदूरनी बाड़ी.उनके पति शराबी बा अउरी अपना खर्चा खातिर भी उनही पर आश्रित बा. उनकर एगो बेटा बा जवन हकलात बा औरी कम बुद्धि वाला रहत बा.ओकरा पढ़हूँ-लिखे नइखे आवत.बाकिर अचानक रूस में हो रहल क्रांतिकारी पुनर्जागरण से ऊ प्रभावित होत बा अउरी क्रांति से जुड़ल किताब लेआवल चालू कर देत बा आ पढल सीखे लागत बा.जब ऊ अपना बेटा में ई बदलाव देखत बाड़ी कि उनकर बेटा क्रांतिकारी लोग के साथे मिल के काम करsता त ऊ बहुत आश्वस्त हो जातारी.उहो अपना बेटा के साथे एह क्रांति में शामिल हो जात बाड़ी.

लेखिका सुधा मूर्ति के किताब ‘मदर आई नेवर न्यु’ दू गो लघु उपन्यास के मिला के लिखल गइल बा.पहिला कहानी वेंकटेश के बा जवन अचानक अपना हमशक्ल के देख के चौंक जात बा. जब ऊ ओह आदमी के कहानी खोजत बा त पता चलत बा कि ऊ ओकरा बाप के पीछे कइल गइल गलती ह.फेर वेंकटेश प्रयास करत बा कि हमशक्ल के परिवार के साथे जवन भइल बा ओकरा के कइसे भी क्षतिपूर्ति करे.दूसर कहानी में मुकेश तब चौंक जात बा जब जानत बा कि उ त गोद लिहल गइल बा.फेर उ आपन असली माई खोजे खातिर बहुत हाथ पाँव मारत बा. एह दुनू कथा में माई के अहमियत, ओकर अस्तित्व पर मीमांसा भइल बा.

आज हमहूँ माई पर लिखत बानी, माई के सोचत बानी त बहुत कुछ दिमाग में नाचत बा, बहुत सारा सवाल कौंधत बा.अइसन जमाना आ गइल बा कि माई-बाप खातिर ओल्ड एज होम- वृद्धाश्रम बने लागल.घर के आँगन त टुकी-टुकी होते बा, मनवो के आँगन में देवाल उठ गइल बा.-
बचपन के हमरा याद के दरपन कहाँ गइल
माई रे अपना घर के ऊ आँगन कहाँ गइल

(लेखक मनोज भावुक भोजपुरी सिनेमा व साहित्य के जानकार हैं.)

Tags: Article in Bhojpuri, Bhojpuri, Mothers Day Special

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