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Bhojpuri में पढ़ें- बिना घर-दुआर आजीवन काहें भटकत रहि गइलन नारद मुनि? जयंती पर जानीं

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नारद एक मात्र ऋषि रहलन, जेकर कवनो ठेकाना नाहीं रहल. उ कभी आश्रम नाहीं बनइलन, आजीवन इहां-उहां भटकत रहलन. दुइ घड़ी से जादा कत्तौ न टिकयं. अपने दैवीय शक्ति बल पर हवा मार्ग से तीनों लोक में विचरण करत रहयं. देवर्षि नारद तीनों लोक के जोड़य वाला एकमात्र सूत्रधार रहलन. एक विलक्षण किरदार, सूचनाकार, अउर ब्रह्मांड क पहिला पत्रकार.

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देवर्षि नारद महान ज्ञानी, महान संगीतज्ञ, अउर महान विष्णु भक्त रहलन. ओन्हय ब्रह्मा जी क मानस पुत्र कहल जाला. ब्रह्मवैवर्तपुराण के अनुसार, नारद ब्रह्मा जी के कंठ से उत्पन्न भयल रहलन. हलांकि विष्णु पुराण में कहल गयल हौ कि उ ऋषि कश्यप क पुत्र रहलन. ब्रह्मा जी से उ संगीत क शिक्षा लेहले रहलन. ’नारद पुराण’, ’नारद संहिता’ अउर ’पांचरात्र’ नारद क रचल उत्कृष्ट गं्रथ हयन. नारद पुराण में उ विष्णु भक्ति के महिमा के साथे मोक्ष, धरम, संगीत, ब्रह्मज्ञान, प्रायश्चित जइसन तमाम विषयन क मीमांसा कइले हयन. नारद संहिता संगीत क एक उत्कृष्ट ग्रंथ हौ. ऋग्वेद में भी नारद मुनि क कई ठे भजन मौजूद हयन. शास्त्र में नार शब्द क अर्थ जल बतावल गयल हौ. चूंकि नारद जलदान, ज्ञानदान अउर तर्पण करय में निपुण रहलन, एह के नाते ओनकर नाव नारद पड़ल. वाल्मीकि के रामायण अउर व्यास के भगवत गीता लिखय क प्रेरणा देवर्षि नारद ही देहले रहलन. उ व्यास, वाल्मीकि अउर शुकदेव क गुरु रहलन.

नारद क आपन कवनो हित नाहीं रहल, एह से उ जवन कुछ भी कइलन सब परहित बदे. परिहत से बड़ा कवनो धरम नाहीं होत. तुलसी दास भी रामचरित मानस में लिखले हयन -’परहित सरिस धर्म नहि भाई. पर पीड़ा सम नहिं अधमाई..’ परहित वाली सोच ही नारद के आजीवन भटकय क कारण बनल. भागवत में कथा हौ कि राजा दक्ष विंध्य पर्वत के पास भगवान विष्णु के तपस्या में लीन रहलन. तपस्या से खुश होइ के भगवान विष्णु ओन्हय दर्शन अउर ज्ञान देहलन. श्रीहरि विष्णु राजा दक्ष के प्रजापति बनय क आशीर्वाद देहलन. उ कहलन कि ’’हम तोहय प्रजापति पंचजन क सुंदर कन्या आसक्ति के सौंपत हई, अउर तू ओही से संतान पैदा करा. सृष्टि क विस्तार करा.’’ विष्णु के आदेश पर दक्ष आसक्ति के साथे रमण कइलन, परिणामस्वरूप 10 हजार लड़िका पैदा भइलन. दक्ष क कुल लड़िका जनम से ही तेजस्वी अउर ज्ञानी रहलन. दक्ष अपने लड़िकन से कहलन कि ’’भगवान विष्णु हमय सृष्टि क विस्तार करय क जिम्मेदारी सौंपले हउअन. एह से तू सब पूरी धरती पर फइलि जा अउर उत्तम संतान पैदा कइके सृष्टि बढ़ावय में मदद करा.’’

पिता क बात सुनले के बाद कुल लड़िका दक्षिण के तरफ निकलि पड़लन, अउर नर-नारायण धाम पहुंचलन. नर-नारायण तीर्थ क महातम इ हौ कि इहां के जल से प्राणी पवित्र होइ जालन. दक्ष क कुल लड़िका इहां नहइले के बाद परमहंस जइसन बनि गइलन. एकरे बाद उ सब सृष्टि विस्तार के तइयारी में जुटि गइलन. देवर्षि नारद के इ दृश्य देखि के बहुत दुख भयल कि परमहंस बनले के बाद भी दक्ष क लड़िका सृष्टि के चिंता में डूबल हयन. ओनसे रहि नाहीं गयल, अउर उ दक्ष के लड़िकन के पास पहुंचि गइलन. नारद कहलन, ’’अबही त तू सब धरती क अंत देखबय नाहीं कइलऽ, फिर भी सृष्टि क चिंता सतावय लगल? जवने धरती पर सृष्टि बढ़ावय चाहत हयऽ, पहिले ओहके ठीक से जानि त लऽ. बिना जनले कवनो काम करब ठीक नाहीं होत, बाद में पछताए के पड़यला.’’

नारद क बात दक्ष के लड़िकन के समझ में आइ गइल. उ आपस में राय कइलन अउर पहिले पूरी धरती क भ्रमण करय क निर्णय कइलन. संतान पैदा करय क बात फिलहाल टालि देहलन. दक्ष के जब इ घटना क पता चलल त ओन्हय बहुत दुख भयल अउर उ आसक्ति के साथे फिर से रमण कइलन, अउर फिर लड़िकन क जनम भयल. दक्ष क इ कुल लड़िका भी ओही नर-नारायण तीर्थ पहुंचलन अउर उहां नहइले के बाद संतान वृद्धि क संकल्प लेहलन. लेकिन देवर्षि नारद फिर धमकि पड़लन. नारद के समझइले पर इ सब भी अपने बड़ भाईन के तरे धरती के बारे में ठीक से जानय-समझय क निश्चय कइलन. दक्ष के जब एकर सूचना मिलल त ओन्हय नारद के उप्पर बहुत गुस्सा आयल. उ अब नारद के शाप देइ देहलन -’’नारद तोहार भेष भले ही साधु क हौ, लेकिन तू मन क बड़ा कुटिल हयऽ. तू प्राणिन के ओनके उद्देश्य से भटकावय क काम करत हयऽ. तू हमरे लड़िकन के भ्रमित कइके ओन्हय ओनके काम से रोकलऽ, अउर संसार में भटकय बदे प्रेरित कइलऽ. आज से तू भी संसार में एक जगह दुइ घड़ी से जादा न टिक पइबऽ. हमेशा भटकत रहबऽ.’’ ब्रह्मा दक्ष के शांत करइलन, ओन्हय फिर से संतान पैदा करय बदे कहलन. एदइयां दक्ष के लड़की पैदा भइलिन. लड़किन क बियाह महर्षि कश्यप, धर्म, चंद्रमा, भृगु अउर अष्टनेमि से भयल. लड़किन के गर्भ से देवता, असुर, यक्ष-गंधर्व, पशु-पक्षी, वनस्पति अउर कीड़ा-मकोड़ा आदि पैदा भइलन, धरती जीवधारिन से भरि गइल.

देवर्षि नारद दक्ष क सराप स्वीकार कइ लेहलन, अउर इहां-उहां भटकय लगलन. जब एक जगहे दुइ घड़ी से जादा समय तक रुकि ही न पावयं त आश्रम कइसे अउर काहें बनय. लेकिन उ अपने भटकाव क उपयोग भी तीनों लोक में लोगन के रस्ता देखावय बदे कइलन. एह तरे देवर्षि नारद क भटकाव तीनों लोक बदे वरदान बनि गयल. तीनों लोक में कहीं भी कवनो घटना-दुर्घटना घटय, केहूं पर कवनो संकट आवय, अत्याचार होय, नारद उहां नारायण नारायण कहत एक हाथे में वीणा लेहले पहुंचि जायं, संकट के समाधान क रस्ता बतावयं. धरती पर राक्षसन के अत्याचार क समाचार देवतन तक पहुंचावय, त राक्षसन के भी संकट से उबरय क रस्ता बतावयं. प्राणिन के भक्ति मार्ग के जरिए भगवान तक पहुंचय क मंत्र बतावयं, त पापिन के भी उद्धार क रस्ता बतावय. भक्त ध्रुव अउर भक्त प्रहलाद देवर्षि नारद के नाते ही भगवान विष्णु क दर्शन पावय में सफल होइ पइलन.

नारद के एही कौशल के नाते ओन्हय ब्रह्मांड क पहिला पत्रकार कहल जाला. जवने तरह से पत्रकारिता क उद्देश्य लोक कल्याण हौ, अउर एही के नाते पक्ष-विपक्ष, अपराधी-पीड़ित, प्रशासन-जनता सब लोग पत्रकारन के सम्मान देलन अउर ओनसे आपन पक्ष, समस्या खुलि के बतावयलन, ओइसय नारद क भी ओह जमाने हर जगह सम्मान रहल, बिना रोक टोक उ हर जगह पहुंचि जायं, हर पक्ष ओनसे आपन समस्या खुलि के बतावय, अउर समाधान क उपाय पूछय. नारद सबके हित अउर सच के हित क बात सोचयं अउर समस्या के समाधान क रस्ता बतावयं. देवता से लेइके राक्षस तक सब लोग नारद क समान रूप से सम्मान करयं. हलांकि आज के समय में पत्रकारन क सम्मान घटत जात हौ. ओन्हय आपन सम्मान बरकरार रखय बदे नारद जइसन निष्पक्ष बनय क जरूरत हौ. नारद जयंती जेठ बदी प्रतिपदा पर आज कम-से-कम पत्रकारन के इ संकल्प लेवय के चाही.

(सरोज कुमार स्वतंत्र पत्रकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

Tags: Article in Bhojpuri, Bhojpuri

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