Bhojpuri Special: होसला भरबीतन के- सउंसे कुदरत साथ निभवलस

अगर केहू के मन में कवनो काम करे के हौसला होखे अउर उ ठान लेबे कि हम इ काम कर के ही मानब, त ओकरा के कोई ना रोक सकेला. पूरा प्रकृति ओकर साथ देबे ला. एह कहानी में भी कुछ अइसही पढ़े के मिली.

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एगो रहले भरबीतन. बीत्ता भर के देह, सिंकिया शरीर. अपना माई के दुलरुआ एकलउत. भरबीतन के जनमते, बाप दुनिया छोड़ि देले रहलन. एह से भरबीतन अपना माई के आंखि के जोन्हीं रहले. भरबीतन जब बीत्ता भर के भइले, त गांव के संघतियन के आपन-आपन भइंसि चरावत देखले. भरबीतनो अपना महतारी से जिद करे लगले- हमहूं भइंसि चराइब. उन्हुकर बीत्ता भर के देह-धाजा देखिके माई मना कइली, बाकिर भरबीतन ना मनले. आखिरकार माई के भइंसि कीनिके देबे के परल. भरबीतन संघतियन का संगें भइंसि चरावे चलि गइले.

कुल्हि संघतिया अपना-अपना भइंसि के पीठ पर फानिके चढ़ि गइलन स. भरबीतन पाछा से अपना भइंसि के पीठ पर चढ़े खातिर ओकर पोंछि धऽ के लटकि गइले. ओही घरी भइंसि गोबर कइलस आ भरबीतन के देहिए पर गोबर के चोत एह तरी गिरल कि ऊ गोबर के चोत का नीचे दबा गइले. उन्हुकर संघतिया खोजे लगलन स, बाकिर उन्हुकर कवनो अता-पता ना मिलत रहे. संजोग से गोबर बीनेवाली किछु मेहरारू जब अइली स, त गोबर के चोत उठावत खा भरबीतन ओही में दबाइल मिलले. घरे अइला पर उन्हुकर माई नहवा-धोवा के दोसर कपड़ा पहिरवली.

जब भरबीतन के संघतिया खेत में हर जोते लगलन स, त भरबीतनो माई से जिदिया के बेरि-बेरि हर जोते खातिर रिरिआए लगले. हारि-पाछिके माई के हर-बैल कीनहीं के परल. खेत में ले जाके हर-बैल नधइलन स. भरबीतन हर के परिहथ के मुठिया पर उचकिके बइठि गइले. बैल चले लगलन स, खेत जोताए लागल. आवे-जाए वाला लोग अचरज से देखे लागल. हरवाह लउकते ना रहे आ बैल अपने आप चलत खेत जोतत रहलन स. परिहथ के मुठिया पर बइठल भरबीतन के हती चुकी देह केहू के लउकते ना रहे. ओही घरी राजा के बियाह के बरियात निकलत रहे. सभ-के-सभ बरियतिहा लगलन स आंखि फारि-फारिके ओनिए देखे. खेत जोतत बैलन के जोड़ी आ परिहथ के मुठिया पर बइठल भरबीतन. अब राजा के बरियात से धियान हटाके सभकर निगाह भरबीतन पर जमि गइल. राजा खीसीआगिया बैताल हो गइले आ भरबीतन के ढकेलिके हर-बैल अपना महल में भेजवा दिहले.

घरे आके भरबीतन माई से सभ खिस्सा बतवले. माई झूठ दिलासा दियवली, बाकिर भरबीतन ना मनले आ राजा से लड़िके आपन हर-बैल वापिस लेबे के तय्यारी करे लगले. माई राजा के हैसियत-
सामरथ के बखान करत भरबीतन के औकात बतवली, बाकिर भरबीतन कवनो हाल में हार माने खातिर तय्यारे ना रहले. ऊ सींकि के गाड़ी बनवले, गाड़ी खींचे खातिर मूस के मनवले आ चलि दिहले राजा से लड़ाई करे.

राह में जब गोजर के नजर एह अचरज पर परल, त ऊ पूछि बइठल,'का बात बा,भरबीतन भाई?'
भरबीतन कहले-
'सींक के मोरे आरी गाड़ी,
मूस जोतिके जात बानीं,
रजवा सरवा हर चोरवलस,
ओह से लड़े जात बानीं.'

भरबीतन के दुस्साहस पर गोजर के अभिमान भइल. ऊ कहलस, 'हमहूं तहरा एह लड़ाई में साथ देब. हमहूं तहरा संगें चलल चाहत बानीं.'

'गोजर-गोजर! आ जा,
कान में समा जा!'
भरबीतन बोलले आ गोजर उन्हुका संगें लागि गइल.

एही तरी बिच्छी सवाल कइलस, सांप सवाल कइलस. हाड़ा-बिरनी सवाल कइलन स. जरत-बरत आगी सवाल कइलस. आन्हीं-पानी के सवाल गूंजल. भरबीतन सभ केहू के बस एके बात बतवले-

-'सींक के मोरे आरी गाड़ी,
मूस जोतिके जात बानीं,
रजवा सरवा हर चोरवलस,
ओह से लड़े जात बानीं!'

फेरु त सभे भरबीतन का संगें चलि दिहल. सांप,बिच्छी, गोजर, हाड़ा-बिरनी, आगी आउर आन्हीं-पानी के संग-साथ भरबीतन के होसला बढ़ा दिहलस.

जब सिवान पर जाके ऊ राजा आ उन्हुका मंतिरी,फौज के ललकरले, त सभ उन्हुकर खिल्ली उड़ावे लगलन स. चोरी आ सीनाजोरी! उन्हनीं के ई अनेति आन्हीं-पानी से बरदास ना भइल आ बवण्डर का संगें अइसन मूसरधार बरखा शुरू भइल कि चारू ओरि त्राहि-त्राहि मचि गइल. एही बीचे सांप-बिच्छी, गोजर, हाड़ा-बिरनी राजा आ मंतिरी के घेरि लिहलन स. ओह लोग के त सिट्टिए-पिट्टी गुम हो गइल. ओने आगी मए फौज के अपना चपेट में ले लिहलस. अब त का सिपाही, का मंतिरी आ का राजा! सभ-के-सभ लागल चिरौरी करे आ गोहार लगावे-

'माफ करऽ भरबीतन भाई!
हर-बैल अबहीं लवटाइब!'

हर-बैल का संगें सांप-बिच्छी, गोजर, हाड़ा-बिरनी, आगी, आन्हीं-पानी के लेले मूस जोतत सींक के गाड़ी में जब भरबीतन अपना घर का ओरि लवटत रहले, त अइसन जनात रहे, जइसे उन्हुका बियाह के बरियात निकलत होखे. भरबीतन के जबान पर बस अपना होसला आ सभकरा उतजोग से रचाइल जीत के गीत के पांती रहे-

'रजवा सरवा हर लवटवलस,
सउंसे कुदरत साथ निभवलस.'

भरबीतन के ई किस्सागोई बहुत किछु कहत बिया. मनई के पहिचान ओकरा देह-धाजा से ना,ओकरा करम से होला. जेकरा पर लोग हंसेला,खिल्ली उड़ावेला,उहो अपना होसला से,दमखम से अइसन करिश्मा कऽ देला कि दिग्गजो लोग दांत तरे अंगुरी दबा लेला. ई लोककथा इहो सनेस देत बिया कि जब कवनो दबंग अइसना दबाइल-कचराइल अदिमी ,जेकर कवनो आहि-अलम ना होला, प अनेति-अतियाचार करेला,त भगवानो के ई बरदास ना होला आ सउंसे कुदरत अइसहीं कमजोर के साथ निभावेला,जइसे भरबीतन के हमजोली बनिके विजय दियववलस. अनेति के खिलाफत आस-बिसवास से करे के दियानत एह कथा के बेशकीमती बनावत बा. भरबीतन के कथा गइल वन में, रउओं सोचीं अपना मन में! (लेखक भगवती प्रसाद द्विवेदी जी वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)

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