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Bhojpuri: नवरातर के पूजा में जौ काहें बीजल जाला? जानीं एकर महत्व

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कुआर क नवरातर चलत हौ. जगह-जगह देवी माई क नौ दिन क पूजा शुरू हौ. तमाम सार्वजनिक दुर्गा पंडाल बनल हउअन त तमाम लोग अपने घर ...अधिक पढ़ें

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जौ क संस्कृत नाव ’यव’ हौ. जौ के अन्नब्रह्म मानल जाला. धरमग्रंथन में लिखल हौ कि ब्रह्मा जब सृष्टि क रचना कइलन तब धरती पर पहिली वनस्पति जौ ही पैदा भइल रहल. इ आदि अन्न हौ. वेद में जौ क विस्तार से वर्णन कयल गयल हौ. अथर्ववेद के एक मंत्र में कहल गयल हौ कि जौ अउर धान कल्याणकारी अउर बलवर्धक होयं. भूमिसूक्त में भी जौ क वर्णन हौ -’’यस्मान्नं ब्रीहि यवौ यस्या इमा पंचकृष्टया.’’ यानी पंचकृष्टया इ भूमि में जौ चावल आदि प्रचुर मात्रा में पैदा होलन. अथर्ववेद के एक श्लोक में इंद्र से कहल गइल हौ कि ’’हम दरिद्रता से उत्पन्न दुर्मति को गाय आदि पशुधन से दूर करें. जौ से अपनी क्षुधा शांत करें.’’ अथर्ववेद में जौ से ’यवाशिर’ बनावय क विधि बतावल गइल हौ. यवाशिर मतलब जौ क लप्सी. इहां इंद्रदेव से निवेदन कयल गयल हौ कि उ ऋषि के पास आइ के गाय क दूध अउर जौ मिलाइ के बनावल गइल यवाशिर क पान करयं. जौ के लप्सी में सोमरस भी मिलावय क वर्णन हौ. सोमरस वाली लप्सी में दही भी मिलावय क बात कहल गइल हौ. सोमरस अउर दही मिश्रित लप्सी बदे अथर्ववेद में ’दध्याशिर’ शब्द क इस्तेमाल कयल गयल हौ. दूध, दही अउर जौ मिश्रित सोमरस बदे ऋग्वेद में ’न्न्याशिर’ शब्द देहल गयल हौ.

वेद में इ कुल वर्णन से साफ होइ जाला कि जौ आदि अन्न हौ. वैदिक काल में ऋषि-मुनि लोग जौ अउर दूध क इस्तेमाल भोजन के रूप में करयं. एकरे अलावा हवन-पूजन में आहूति बदे भी जौ क ही इस्तेमाल कयल जाय. उहय परंपरा आज तक चलल आवत हौ. हर पूजा-पाठ में जौ क इस्तेमाल कयल जाला. बिना जौ के कवनो धार्मिक अनुष्ठान संपन्न नाहीं होत. नवरातर में भी जब माई के पूजा बदे कलशा बइठावल जाला तब सबसे पहिले जौ क ही पूजा कयल जाला. कलशा बइठावय के समय जौ बीजल भी जाला. कुछ लोग मट्टी क तह बिछाइके ओकरे उप्पर कलशा बइठावयलन त ओही मट्टी में जौ बीजि देलन. केतना लोग कलशा के उप्पर मट्टी क बरतन रखयलन अउर ओही में मट्टी भरि के जौ बीजयलन. ओकरे उप्पर चुनरी में लपेटल नरियर रखल जाला. केतना जने कलशा के पास अलग से मट्टी क तह बिछाइके या कवनो मट्टी के बरतने में जौ बीजयलन.

जौ माई के बहुत प्रिय हौ. बीजले के बाद इ दुइ-तीन दिना में जामि जाला. अगर अइसन नाहीं भयल त समझि ल इ भविष्य बदे अच्छा नाहीं हौ. अगर कलशा के नीचे बीजल जौ क जरई नवरातर बीतत-बीतत बढ़ि के कलशा के मुंहे तक पहुंचि जाय त समझि ल कि माई पूजा से प्रसन्न हइन. या कलशा के उप्पर बीजल जौ क जरई बढ़ि के लटकि के जमीन छूअय लगय तबौ मानल जाला कि माई बहुत प्रसन्न हइन. अगर जामल जौ क आधा हिस्सा पीयर अउर आधा हरियर हौ त साल क आधा हिस्सा अच्छे से बीती लेकिन आधा हिस्सा परेशानी में कटी. अगर जौ क जरई हरियर हौ या फिर सफेद हौ त एकर मतलब आवय वाला साल बहुत बढ़िया रही. माई क कृपा बनल रही, अउर जिनिगी में सुख-समृद्धि, खुशी भरल रही. लेकिन अगर जौ क जरई पीयर होइके झरय लगय त समझि ल माई पूजा से खुश नाहीं हइन, अउर आगे क समय बहुत मुश्किल वाला रही. अइसने में देवी भगवती के प्रसन्न करय क विशेष उपाय करय के चाही.

नवरातर में जौ बीजय क एक ठे अउर कारण बतावल जाला. दरअसल, जौ रबी क फसल हौ. रबी क बोवाई अक्टूबर-नवंबर से शुरू होइ जाला. कुआर क नवरातर रबी क बोवाई शुरू होवय से ठीक पहिलय पड़यला. जौ के अन्नब्रह्म मानल गयल हौ, एह नाते नवरातर में माई के पूजा में एकर बीजाई कइके एक तरह से रबी के बोवाई क शुभारंभ कयल जाला. अगर इ जौ बढ़िया से जामि के जरई खूब बढ़ि गयल त मानल जाला कि रबी क फसल बढ़िया होई.

जौ क सबसे जादा पैदावार रूस में होला. भारत में सबसे जादा जौ राजस्थान में पैदा होला. ओकरे बाद उत्तर प्रदेश, पंजाब, मध्य प्रदेश, हरियाणा, बिहार, हिमाचल प्रदेश, पश्चिम बंगाल अउर जम्मू-कश्मीर क नंबर आवयला. जौ में फास्फोरस, मैंगनीज, सेलेनियम, तांबा, अउर विटामिन बी जइसन खनिज पदार्थ प्रचुर मात्रा में पावल जालन. जौ दिल की बीमारी अउर टाईप 2 मधुमेह से बचावय क काम करयला. जौ क आटा सुपाच्य हौ. एकर इस्तेमाल आयुर्वेद में खूब कयल जाला.

(सरोज कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

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