Home /News /bhojpuri-news /

Bhojpuri: 17 साल के उमर में साधु बनय बनारस पहुंचल रहलन नेताजी सुभाष, पढ़ीं पूरी कहानी

Bhojpuri: 17 साल के उमर में साधु बनय बनारस पहुंचल रहलन नेताजी सुभाष, पढ़ीं पूरी कहानी

.

.

बाबा क नगरी नेताजी सुभाष चंद्र बोस के भी बहुत प्रिय रहल. जीवन में उ कई दइयां बनारस अइलन. बनारस में ओनकर सहपाठी अउर रिश्तेदार भी रहत रहलन. सुभाष पहिली बार 17 साल के उमर में साधु बनय बनारस पहंुचल रहलन. लेकिन इहां ओनकर मन बदलि गयल अउर उ वापस कलकत्ता लउटि गइलन. सुभाष के किस्मत में साधु के बदले नेताजी बनब लिखल रहल.

अधिक पढ़ें ...

सुभाष चंद्र बोस लड़कपन से ही गंभीर स्वभाव क रहलन. हाईस्कूल क हेडमास्टर बेनीमाधव दास ओन्हय जीवन क अइसन दर्शन समझइलन कि उ अध्यात्म के ओरी मुड़ि गइलन. सुभाष कटक के प्रोटेस्टेंट यूरोपियन स्कूल से प्राइमरी क पढ़ाई पूरी कइले के बाद 1909 में रेवेंशाव कालेजिएट में नाव लिखइलन. एही स्कूली क हेडमास्टर रहलन बेनीमाधव. सुभाष के स्वभाव से उ एतना प्रभावित भइलन कि बाकी विषय के साथे ही ओन्हय नैतिकता अउर अध्यात्म क भी पाठ पढ़ावय लगेलन -’’असली सत्य प्रकृति में निहित है. अतः इसमें स्वयं को पूरी तरह समर्पित कर दो.’’ सुभाष एकांत में बइठि के घंटन ध्यान साधना करय लगलन. माई-बाबू परेशान होइ गइलन कि लड़िका परीक्षा में फेल न होइ जाय, लेकिन 1912-13 में मैट्रिक क परिणाम आयल त पूरे विश्वविद्यालय में दूसरा स्थान. माई-बाबू बहुत खुश. सुभाष क अध्यात्मिक यात्रा जारी रहल. पंद्रह साल के उमर में उ विवेकानंद क साहित्य पढ़लन, ओनकर सिद्धांत जीवन में अपनइलन. विवेकानंद के जीवन से प्रेरणा लेइके ही उ रामकृष्ण-विवेकानंद युवाजन सभा क गठन कइलन.

सुभाष क जनम उड़ीसा के कटक में 23 जनवरी, 1897 के भयल रहल. ओनकर मूल घर बंगाल के परगना जिला में एक गांव में रहल. ओनकर पिता जानकीनाथ बोस नामी वकील रहलन. वकालत के खातिर गांव छोड़ि के कटक आइ गयल रहलन. मैट्रिक क पढ़ाई पूरी भइले के बाद सुभाष 1913 में कलकत्ता विश्वविद्यालय के प्रेसीडेंसी कॉलेज में पढ़य पहुंचलन. मन में अध्यात्मिक खदबदाहट बरकरार रहल. मन के शांति बदे उ इतिहास अउर धर्म से जुड़ल जगहन पर घूमय जायं. महापुरुषन क किताब पढ़य. अरविंद घोष क लेखन, दर्शन अउर यौगिक समन्वय क विचार ओन्हय बहुत प्रभावित कइलस. सुभाष क मन धरम अउर समाजसेवा के काम में लगय लगल. क्लासरूम क लेक्चर काल जइसन लगय. 1915 में इंटरमीडिएट क परिणाम अच्छा नाहीं आयल, नबंर बहुत कम. अब आगे के पढ़ाई बदे उ दर्शन शास्त्र विषय चुनलन, खूब मेहनत करय लगलन. लेकिन दर्शनशास्त्र से बीए आनर्स करत समय 1916 में एक अइसन घटना घटल कि जीवन क दिशा कलकत्ता से काशी के ओरी मुड़ि गयल.

अंगरेज प्रोफेसर ई.एफ. ओटेन कुछ लड़िकन क पिटाई कइ देहलस. सुभाष कक्षा प्रतिनिधि रहलन, त घटना क विरोध कइलन. दूसरे दिना छात्र कॉलेज में सामूहिक हड़ताल कइ देहलन. कॉलेज प्रबंधन अउर दूसरे प्रोफेसरन के हस्तक्षेप से कइसव मामला शांत भयल. लेकिन एक महीना बाद प्रोफेसर साहब फिर एक लड़िका क पीटि देहलन. छात्रन में घटना क प्रतिक्रिया भइल, कुछ छात्र मिलि के प्रोफेसर साहब के धुनि देहलन. घटना में सुभाष शामिल नाहीं रहलन, लेकिन कॉलेज से निकालय जाए वाले छात्रन के सूची में ओनकर भी नाव रहल. निष्कासन अइसन रहल कि कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुल कॉलेजन क दरवाजा बंद. यानी आगे के पढ़ाई क रस्ता बंद. इ घटना सुभाष के मन के अशांत कइ देहलस.

सुभाष घरे वालन के बिना बतइलय एक अइसने गुरु के तलाश में निकलि पड़लन, जवन ओन्हय मौजूदा परिस्थिति में आगे क रस्ता बताइ सकय. काशी के बारे में उ बहुत सुनले-पढ़ले रहलन. लेकिन इहां ओनकर मौसा-मौसी भी रहलन. कई जगह से घूमत-घामत अंत में उ काशी पहुंचलन. कई साधु-सन्यासी से मुलाकात कइलन, रामकृष्ण मिशन भी गइलन. लेकिन ओनकरे अशांत मन के केव शांत नाहीं कइ पइलस. चौखंभा महल्ला के बंगाली ड्योढ़ी में जब मौसा-मौसी के पास पहुंचलन त उहां से वापस घर-परिवार में लउटय क रस्ता मिलल. सुभाष क इ अध्यात्मिक यात्रा एक तरह से जिनगी क निर्णायक यात्रा रहल. अगर उ काशी में रमि गयल होतन त देश क ’नेताजी’ न बनि पइले होतन. यानी सुभाष चंद्र बोस के वापस लउटाइ के ओन्हय नेताजी बनावय में काशी क एक बड़ा योगदान रहल हौ. इ बात ओन्हय बाद में समझ में आयल रहल. बनारस से लगाव क इ एक बड़ा कारण रहल.

निष्कासन क धीरे-धीरे एक साल बीति गयल. बनारस से मिलल ऊर्जा के साथे सुभाष वापस कलकत्ता विश्वविद्यालय पहुंचलन, प्रवेश क दोबारा अनुमति मंगलन. प्रेसीडेंसी के अलावा दूसरे कॉलेज में पढ़य क अनुमति मिलि गइल. शायद इ ओनकरे अध्यात्मिक यात्रा के पुण्य क प्रताप रहल. सुभाष स्कॉटिश चर्च कॉलेज के प्राचार्य डॉ. अर्कहार्ट से मिललन. अर्कहार्ट दर्शनशास्त्र क विद्वान रहलन, उ सुभाष के व्यवहार से प्रभावित भइलन अउर कॉलेज में भर्ती कइ लेहलन. सन् 1919 में दर्शनशास्त्र बीए क रिजल्ट आयल त सुभाष पूरे विश्वविद्यालय में दूसरे स्थान पर. एकरे बाद पिता के आग्रह पर आईसीएस करय उ 1919 में इंग्लैंड चलि गइलन. इहां भी चौथा रैंक आयल. लेकिन सुभाष क मकसद कुछ अउर रहल. समाज-सेवा, देश-सेवा खातिर आईसीएस क नोकरी छोड़ि के 1921 में भारत लउटि अइलन.

सुभाष जवने जहाजी में सवार रहलन, ओही में रविंद्रनाथ टैगोर भी रहलन. टैगोर ओन्हय महात्मा गांधी से मिलय क सलाह देहलन. सुभाष 16 जुलाई, 1921 के बंबई मे गांधी से मिललन. लेकिन बहुत संतुष्टि नाहीं मिलल. उ कलकत्ता लउटि अइलन अउर देशबंधु चितरंजन दास से मिललन. देशबंधु से उ बहुत प्रभावित भइलन. ओन्हय आपन नेता, मार्गदर्शक मानि बइठलन. सुभाष राष्ट्रीय आंदोलन में हिस्सा लेवय लगलन, कुछय दिना में कांग्रेस क बड़ नेता बनि गइलन. सन् 1938 में कांग्रेस क अध्यक्ष चुनल गइलन. अध्यक्ष बनले के बाद भी नेताजी सुभाष बनारस आयल रहलन. बीएचयू में ओनकर भाषण रहल. स्वागत में जइसे पूरा बनारस उमड़ि पड़ल रहल. भीड़ एतना कि कैंट स्टेशन से बीएचयू पहुंचय में घटन लगि गयल, रात 11 बजि गयल. बंगाली टोला इंटरकॉलेज अउर चितरंजन पार्क में भी ओनकर सभा भइल. 1939 में कांग्रेस छोड़ले के बाद उ पूरे देश क दौरा करत रहलन, 11 महीना में 900 सभा कइलन. ओह समय भी नेताजी बनारस आयल रहलन. कमच्छा में जब भारत कला भवन क उद्घाटन रहल, तब भी उ बनारस आइलन. भारत कला भवन में नेताजी सुभाष से जुड़ल कई स्मृति मौजूद हौ.

नेताजी क बनारस से एतना लगाव रहल कि उ शहर के विकास क पूरी योजना बनइले रहलन. बनारस के मैनचेस्टर बनावय चाहत रहलन. ओह जामाने में ही ओनकरे दिमाग में इ बात आइल रहल कि अगर बनारस के बुनकरन के बिजली देइ देहल जाय, त देश लंकाशायर अउर मैनचेस्टर के वस्त्र निर्यात कइ सकयला.

बनारस के सोनारपुरा में नेताजी क एक सहपाठी मित्र रहलन शिवनाथ चटर्जी. शिवनाथ से ओनकर बड़ी आत्मीयता रहल. नेताजी जब बर्मा के मांडले जेल में तीन साल क सजा काटत रहलन तब उ शिवनाथ के चार जून, 1926 के एक लंबी चिट्ठी लिखले रहलन. चिट्ठी से पता चलयला कि नेताजी केतने विराट व्यक्तित्व वाला रहलन. चिट्ठी ’नेताजी संपूर्ण वांग्मय’ में मौजूद हौ. चिट्ठी में शिवनाथ के परिवार क कुशल-क्षेम पूछले के बाद कॉलेज के दिन क याद कइले रहलन. चिट्ठी में संस्कृत 24 पुस्तकन क एक सूची भी भेजले रहलन, जवने के बीपी के जरिए भेजय क आग्रह कइले रहलन. नेताजी इ बात भी लिखले रहलन कि कवनो भी चिट्ठी ओनके पास बिना सेंसर कइले नाहीं पहुंचत. यानी ओनकर इशारा रहल कि जवाबी चिट्ठी में कवनो आपत्तिजनक बात न रहय के चाही.

खाली नेताजी के ही बनारस से लगाव नाहीं रहल, बल्कि बनारस वालन के भी नेताजी से बहुत लगाव रहल. इ लगाव क ही परिणाम हौ कि बनारस में नेताजी क मंदिर बनावल गइल हौ. दुनिया में नेताजी सुभाष क इ पहिला मंदिर हौ. लमही के इंद्रेश नगर में विशाल भारत संस्थान के ओरी से स्थापित मंदिर क उद्घाटन नेताजी के 123वीं जयती पर 23 जनवरी, 2020 के भयल रहल. मंदिर में नेताजी क छह फुट ऊंची करिया ग्रेनाइट क प्रतिमा हौ, अउर उप्पर 11 फुट ऊंची सुनरे रंग क छतरी लगल हौ. खास बात इ कि मंदिर क पुजारी दलित परिवार क बिटिया खुशी रमन भारतवंशी हइन. सुभाष मंदिर सबेरे सात बजे भारत माता के प्रार्थना के साथे खुलयला अउर संझा के सात बजय से पहिलय आजाद हिंद सरकार क राष्ट्रगान होला, फिर पांच दइया नेताजी के जय हिंद के साथे सलामी देइ जाला. अंत में महाआरती होला. आरती के बाद लोग पुजारी क पैर छुइ के आशीर्वाद लेलन. आरती अउर प्रसाद लेहले के बाद मंदिर क दरवाजा अगले दिना बदे बंद होइ जाला.

(सरोज कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

Tags: Bhojpuri News, Netaji subhas chandra bose

विज्ञापन
विज्ञापन

राशिभविष्य

मेष

वृषभ

मिथुन

कर्क

सिंह

कन्या

तुला

वृश्चिक

धनु

मकर

कुंभ

मीन

प्रश्न पूछ सकते हैं या अपनी कुंडली बनवा सकते हैं ।
और भी पढ़ें
विज्ञापन

टॉप स्टोरीज

अधिक पढ़ें

अगली ख़बर