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niralas some deep incidents of the his life in bengal bhojpuri vinay bihari singh

Bhojpuri में पढ़ें- बंगाल में 'निराला' जी के जीवन के कुछ गहिर प्रसंग

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बहुत लोगन के मन में ई प्रश्न उठेला कि सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला” (जनम- सन 1897 निधन- अक्टूबर 1961) नियर सशक्त साहित्यकार जवानिए में अध्यात्म का ओर कइसे चलि गइल? छायावाद के एह पुरोधा जइसन जीवंत रचनाकार त कमे होला लोग. जे “वर दे वीणावादिनी वर दे..” नियर कालजयी कृति लिखल, जौन आज भी प्रेम से गावल जाला.

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जे “राम की शक्तिपूजा” नियर लंबा कविता लिख के काव्य साहित्य के नया गरिमा दे दिहल, ऊ वैराग्य भाव के पैरलल (समानांतर) लेके कइसे चलल? आ महिषादल रियासत के क्लर्क के पक्का नोकरी के लात मारि के लेखन में काहें उतरल, जबकि ओहघरी लेखन से दाल- रोटी चलल मुश्किले ना बहुते मुश्किल रहे! आईं निराला जी के जीवन के एगो हिस्सा का भीतर झांक के देखीं जा. ई निराला जी के बंगाल कनेक्शन के पुनरावलोकन ह.

बंगाल में महिषादल में सन 1897 में उनकर जनम भइल. ओइजे उनकर पिता जी रामसहाय तिवारी पुलिस रहले. महिषादल पश्चिम बंगाल के पूर्व मेदिनीपुर जिला में हल्दिया का लगे परेला. निराला जी के जनम के अढाई साल बादे उनका माता जी के मृत्यु हो गइल. मातृसुख से बचपने में वंचित हो गइले. ओहघरी बालविवाह होखे. त 14 साल के उमिर में सन 1910 में उनकर बियाह मनोहरा देवी से हो गइल. दू साल बाद गवना भइल. अभी छव साल अपना पत्नी का संगे बितवले. एगो बेटी भइल, तले महामारी (कालरा) फइल गइल. ओही में मनोहरा देवी के मृत्यु हो गइल.

निराला जी के उमिर ओह घरी 22 साल रहे. एकरा कुछ दिन बादे पिता के भी मृत्यु हो गइल. कुछ साल बाद बेटी सरोज के भी मृत्यु हो गइल. बेटी के मृत्यु पर ऊ भीतर से एतना हिल गइले कि “सरोज स्मृति” लिखले. आघात पर आघात लागत गइल. एइजे से उनकर रुझान अध्यात्म का ओर हो गइल. जीवन के ई कुल घटना उनका के झकझोरत गइली सन. निराला जी फेर दोसर बियाह ना कइले. लेखन अब उनकर संबल हो गइल. सन 1916 में उनकर पहिली कविता “जूही की कली” छप चुकल रहे. उनका जीवन में दू गो तत्व पैरलल चले लगले सन- लेखन आ अध्यात्म/वैराग्य. साधु संत लोग कहि गइल बा- संसार में रहीं, बाकिर संसार के होके मत रहीं. निराला जी के ईहे अवस्था हो गइल. हाईस्कूल के आगा ऊ ना पढ़ि पवले. कुछ दिन बादे महिषादल राज्य में उनकर नोकरी लागल- क्लर्क के पद पर. उनकर काम आ बुद्धिमत्ता देखि के सब चकित रहे. बाकिर महिषादल के राजा के हाउसहोल्ड अधीक्षक का संगे उनकर पटरी ना बइठे. का जाने काहें हाउसहोल्ड अधीक्षक उनकरा से खुन्नस खइले रहे. ई बात निराला जी पसंद ना परल आ एक दिन ऊ नोकरी से इस्तीफा दे दिहले. निराला जी के लंबा- चौड़ा हृष्ट- पुष्ट शरीर रहे. नियमित आमदनी के लात मारि के लेखन में उतरि गइले. विभिन्न पत्र- पत्रिका में लिखे लगले. निराला जी एगो बहुते सारगर्भित अध्यात्मिक लेख लिखले जौना के पढ़ि के रामकृष्ण मिशन के संन्यासी लोग उनुका के बोलावल आ कहल कि ऊ मिशन के पत्रिका “समन्वय” में काम करसु. रामकृष्ण मिशन से प्रकाशित पत्रिका में काम कइल सौभाग्य के बात रहे. निराला जी “समन्वय” में काम करे लगले. कुछ जगह लिखल बा कि निराला जी के मूल नांव सूर्जकुमार रहे, सन 1920 में ऊ आपन नांव सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला” रखले.

रामकृष्ण मिशन में निराला जी स्वामी विवेकानंद के लिखल कई गो किताबन के हिंदी में अनुवाद कइले. सबसे बड़का बात ई कि स्वामी विवेकानंद के गुरु रामकृष्ण परमहंस पर केंद्रित किताब के ऊ हिंदी अनुवाद कइले. कौन किताब? रामकृष्ण परमहंस के एगो घनिष्ठ शिष्य रहले महेंद्रनाथ गुप्त. अध्यापक रहले. मठ में उनका के मास्टर साहब कहल जाउ. त ऊ एगो डायरी लिखले जौना में हर अतवार के रामकृष्ण परमहंस का करतारे, का बोलतारे ई सब बात नोट करत रहले. ओही के मिशन अंग्रेजी में “गास्पेल आफ रामकृष्ण” आ बांग्ला में “रामकृष्ण कथामृत” प्रकाशित कइलस. निराला जी एकर हिंदी में “रामकृष्ण वचनामृत” के रूप में अनुवाद कइले बाड़े, जौन आज भी उपलब्ध बा आ खूब चाव से पढ़ल जाला. ओहीघरी ई बात प्रसिद्ध हो गइल कि आध्यात्मिक पुस्तकन के अनुवाद करत- करत निराला जी घनघोर आध्यात्मिक व्यक्ति हो गइल बाड़े आ अध्यात्म के ई रंग परमानेंट बा, स्थाई बा. उनकर दाढ़ी बढ़ल, उघारे देह के एगो दिव्य संत नियर उनकर फोटो एक समय खूब प्रचलित रहे. हिंदी के कवि नागार्जुन उनका पर एगो कविता लिखले बाड़े-
“ बाल झबरे, दृष्टि पैनी, फटी लुंगी, नग्न तन/
किंतु अंतर्दीप्त था आकाश-सा उन्मुक्त मन/

उसे मरने दिया हमने, रह गया घुटकर पवन/

अब भले ही याद में करते रहे सौ- सौ हवन….”

ओकरा बाद सन 1923 में निराला जी “मतवाला” पत्रिका के प्रकाशन शुरू कइले. निराला जी के आदर से महाप्राण कहल जाला. कई गो अउरी पत्रिका निकललन ओमें “मनोरमा” नामक पत्रिका भी शामिल बिया. उनकर कई गो विधा में लिखल रचना समग्र हमनी के साहित्य के थाती बा. अंतिम समय में निराला जी, उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में आ गइल रहले. उनकर पैत्रिक घर उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिला के गढ़ाकोला में रहे. एइजा एगो बात के याद दियावल जरूरी बा. जब निराला जी के मृत्यु भइल त उनकर बक्सा खोलल गइल. ओमें का रहे? एगो रामनामी आ एगो भगवद्गीता. कुल ईहे संपत्ति छोड़िके निराला जी नियर महान साहित्यकार एह दुनिया से विदा ले लिहले. उनकर ईहे संपत्ति हमनी के कई गो संदेश देतिया- अध्यात्म के, मनुष्यता के, प्रेम आ सौहार्द के, देह के नश्वरता के.

निराला जी के समूचा जीवन देखला पर साफ हो जाता कि उनकर जीवन बहुते कठिन रहे. आर्थिक रूप से ऊ कभी भी मजबूत ना हो पवले. कई बार साग- पत्ता उबाल के भोजन के रूप में ओकर सेवन कइले बाकिर आत्मसम्मान का संगे कबो समझौता ना कइले. कई लोग जाड़ा में उनका के नया शाल ओढ़ा के चल जाउ त रोड पर कौनो भिखारी के ठंड से कांपत देखिके निराला जी आपन नया शाल भिखारी के ओढ़ा देसु. परदुख कातर निराला जी जीवन भर फक्कड़ रहले बाकिर आत्मसम्मान से जियले. कुछ लोग कहेला कि निराला जी अंतिम समय में विक्षिप्त हो गइल रहले. त कई गो आध्यात्मिक आदमी विक्षिप्त नियर रहेला, एकर माने ई ना कि ऊ पागल बा. जे उनका के पागल देखता ऊहे पागल बा. निराला जी वैराग्य में जीयत रहले. उनुका के विक्षिप्त कहल अपना के विक्षिप्त कहल बा. निराला जी के सौ- सौ बार प्रणाम बा.

(विनय बिहारी सिंह स्वतंत्र लेखक हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

Tags: Article in Bhojpuri, Bhojpuri

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