Bhojpuri व्यंग्य: आज काल्ह प्यार के मतलब ह सेक्स, का इहे सेक्स इंकलाब ह?

नवकी दुनिया में पियार के मतलब होला सेक्स. सेक्स के बेगर परेम, ना बाबा ना! घोड़ा घास से इयारी करी त खाई का! सेक्स परेम के नेंवें ना, मकसदो होला. एक भरोसा,एक बल, एक आस-बिसवास सेक्से नू होला. जिन्दादिली के बिना जिनिगी कइसन, पियार के बिना जिन्दादिली कइसन आ सेक्स के बिना पियार कइसन!

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  • Last Updated: March 30, 2021, 3:27 PM IST
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एने एगो मुख्यमंत्री जी के बयान प बवाल आ बवंडर मचि गइल. ऊ बेचारू ठेहुना देखाऊ फाटल जींस पहिरे वाला फैशन प कमेन्ट कइले रहलन. भला ऊ फैसन का,जवना प कमेन्ट ना होखे! ई त एगो क्रान्तिकारी बदलाव के सूचक होला. पिछिलकी दूगो सदी में अउर किछु हासिल भइल भा ना, बाकिर अइसन एहसास त भइबे कइल कि ई महान क्रांतिकारियन के देश ह आ महिला क्रान्तिकारियनो के ऐतिहासिक अवदान के कबो भुलावल ना जा सके. कई गो विलक्षण इंकलाब त इहंवें जनमल रहे. इहो जुग क्रान्तिए के जुग मानल जाई.

कोरोना के खिलाफ लड़ाइयो त एगो क्रान्तिकारिए डेग बा. ई बात दीगर बा कि पहिले देश खातिर क्रान्ति होत रहे, अब खुद खातिर होत बा. लछिमीबाई हथियार से लैस, घोड़ा प सवार होके देश के दुश्मन के छक्का छोड़ावत रहली. नवकी फैसनेबुल वीरांगना अपना माई-बाप, टोला-परोस आ राह चलत मजनुअन के छाती प मूंग दरत बाड़ी. 'पियार कइल ना जाला,हो जाला' वाली बात अब बेमानी हो गइल बा, काहें कि अब त पियार के क्रान्ति खातिर ललकारे के परेला-'जब प्यार किया तो डरना क्या!' अगर इंडिया के क्रान्तिकारी ललना के लाइन में ठाढ़ होके इतिहास गढ़े के बा,त कमर कसिके मैदाने-जंग में कूदि परऽ आ पियार के क्रान्ति खातिर आपन तन-मन-धन-सभ किछु नेवछावर कऽ द.

बाकिर हम लैला-मजनूं, हीर-रांझा,शीरीं-फरहाद वाला पियार के बात नइखीं करत.ऊ घिसल-पिटल पियारो भला कवनो पियार ह? जिनिगी भर एक-दोसरा खातिर लोर बहावत तड़पि-तड़पि के मरि-खपि जा आ ताजिनिगी जुदाई आ नाकामयाबी के पीर झेलत रहऽ! नवकी दुनिया में पियार के मतलब होला सेक्स. सेक्स के बेगर परेम, ना बाबा ना! घोड़ा घास से इयारी करी त खाई का! सेक्स परेम के नेंवें ना, मकसदो होला. एक भरोसा,एक बल, एक आस-बिसवास सेक्से नू होला. जिन्दादिली के बिना जिनिगी कइसन, पियार के बिना जिन्दादिली कइसन आ सेक्स के बिना पियार कइसन!

का सेक्सी इंकलाब आइल बा भारतीय जीवन-पद्धति में! पहिले बेडरूम में जवन काम-क्रीड़ा होत रहे, करिया भुचेंग निसबद अन्हरिया रात में चोरी-चुप ब्लू फिलिम देखि के जवन चरम सुख हासिल कइल जात रहे, ऊ आजु दूरदर्शन के अलगा-अलगा सेटेलाइट चैनलन के मार्फत पूरा परिवार का संगें ड्राइंग रूम में सहजे हासिल हो जात बा. वाह,का रंगीन नजारा बा! जवन माई-बाप, भाई-बहिन, सास-ससुर, बेटी-बेटा अइसन बहुरंगी नजारा देखे-देखावे में कबो आड़े आवत रहलन, आजु ना खाली उन्हुका सोझा, बलुक ओह सभ का साथे लुफुत उठावे के मजे किछु अउर बा. श्लील-अश्लील आखिर होला का? ई त देखे वाला के आंखि में होला नू?
एह से जेकरा आंखि में इचिकियो शील आउर शरम बांचल होई, ऊ खुदे आपन आंखि मूंदि लिहन.खामखा आपन पसन दोसरा प थोपल कहवां ले जायज बा!ई त तोपे-ढांपे आ छिपावे के ना,बलुक खोले आ देखावे के जुग ह.जे ना देखल चाहे,आपन नयना बन्न कऽ लेउ भा फोरि लेउ!देखावे लायक चीझु के भला दाबे, ढांपे आ लुकवावे के का माने?आजुओ दकियानूसी नजर राखेवालन के मुंह करिया!

टीवी, फिलिम से लेके दिनचर्या ले-हर जगहा नारी के इंकलाबी भूमिका देखते बनत बा. जइसे सेक्स के बेगर पियार अधूरा बा,ओइसहीं नारी के अंग-प्रदर्शन के बिना विज्ञापन के कल्पनो नइखे कइल जा सकत. विज्ञापन चाहे महिला खातिर होखे, लरिकन बदे होखे भा मरदन खातिर, नाचत-गावत कामुक अंदाज से सभके लुभावत-ललचावत नारी बेजान विज्ञापनो में जान डालि देली. जब आधुनिक जिनिगिए विज्ञापन हो गइल बा, त फेरु दूरदर्शनी विज्ञापन से परहेज काहें? ई त हमनीं खातिर नाज़ करे के विषय बा कि सरकारी-गैरसरकारी संस्थानन, लोकसभा, विधानसभा में तैंतीस फीसद आरक्षण के मांग करेवाली नारी विज्ञापन के हलका में नब्बे प्रतिशत आरक्षण करवा लेले बाड़ी. का नाचे-गावे,देह देखावे के कला में ई क्रान्तिकारी बदलाव काबिलेगौर नइखे?

भारतीय नारी अब विश्वसुंदरी के खिताब धड़ल्ले से पावत बाड़ी.इहो सेक्सी इंकलाबे के नतीजा ह.सुन्नर होखल आ सुन्नर लउकत दूनों अलगा-अलगा बात ह. कम-से-कम कपड़ा में सभ किछु देखा दिहल का सभका बूता के बात बा? तबे नू सिरिफ शारीरिक सौष्ठव, उठे-बइठे, चले-फिरे आ बोले-बतियावे के ना,बलुक हंसे-मुसुकाए के तौर-तरीको डायना हेडन के प्रशिक्षण के माध्यम से सीखे के परल रहे.एह नया दौर में कुदरती सुनरई के त बाते बेमानी बा.कुकुरमुत्ता-अस पनपल पाॅर्लर संस्कृति में बिउटी पाॅर्लर का जरिए बदसूरत के खूबसूरत आ सुन्नर के सौन्दर्य-साम्राज्ञी के उपाधि रेवड़ी नियर बांटल जात बा.



अब ले त इनल -गिनल लरिकिए भावी दुलहा में मीन-मेख निकालिके रिजेक्ट करत बाड़ी, बाकिर ऊ दिन दूर नइखे, जब रिजेक्टेड दुलहा लोग के डूबे खातिर ओने चुरुओ भर पानी नसीब ना होई.तब सुहाग के चिन्ह महिला खातिर ना, शादीशुदा मरद खातिर धारण कइल जरूरी होई, जवना से कि पत्नीव्रत धरम के पालन करत ऊ एने-ओने मुंह मारे से बाज आवसु. पति घर-बार चौका-बासन, झाड़ू-पोंछा, पाक कला आ बाल-बुतरू पाले-पोसे में महारत हासिल करिहन,खुद के घर के चहारदीवारी ले सीमित रखिहन,जबकि पत्नी नोकरी, बैपार आउर बहरी के रंगीली दुनिया से सरोकार रखिहें.तब संतान के नांव का संगें हरेक दस्तावेज में महतारी के नांव अंकित रही आ आजु के पुरुष प्रधान समाज अपने आप स्त्री-प्रधान समाज में परिणत हो जाई. नारी उन्मुक्तता के सपनीली दुनिया में मन भर विचरिहन आ खूंटा से बन्हाइल मरद मुकुती खातिर छपिटइहन.तब मर्दानगी शर्मिंदगी के पर्याय होई आ औरताना, स्त्रियोचित अंदाज गर्व के सूचक होई. जोरू के गुलाम भइल तब गौरव के बात होई.नारी के रौब गालिब करेके विशेषाधिकार होई आ भींजल कुकुर-बिलार भइल आ दुम हिलावल नर के नियति होई. मोंछि राखेवाला तमाम मरद दंडित होइहन आ नारी पिटाए के ना,पीटे के अधिकारिणी होइहन.तब नारी से जुड़ल मए मुहावरा के माने बदलि जाई.

एकइसवीं सदी के आवेवाला दिन नारी के होई.तब दहेज मांगें वालन के ना,तिलक-दहेज़ ना देबेवाला पतियन के जियते जिनिगी अरथी निकली.डांड़ से तरुआर लटकवले रानी लछिमीबाई नियर अश्वारोही नारी जब बरियात सजाके निकलिहन, त सभ केहू झूमि-झूमिके गाई-नाची-'घोड़ा प होके सवार चलेली दुलहिन नार, कमरिया में बन्हले तरुआर-!'

सकुचात-लजात शरमीला दुलहा दुलहिन के पांव प लोटे खातिर बेयाकुल हो उठी,बाकिर ऊ बदला के भावना के बात इंकलाब में ना सोची.दुलहिन दुलहा से मनमानी छेड़खानी करिहन,फेरु दूनों सरेआम चुंबन-आलिंगन लेत एक दोसरा के हाथ में हाथ डलले सेक्सी इंकलाब के मार्ग प्रशस्त करे का गरज से बेडरूम में ढूकि जइहन.एह नवकी सदी के सेक्सी इंकलाब-

जिन्दाबाद! जिन्दाबाद!! (डिस्क्लेमर: भगवती प्रसाद द्विवेदी वरिष्ठ स्तंभकार हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)
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