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भोजपुरी में पढ़ें- गांव खाली हरियाली से ना बची, गांव में रहे खातिर सुविधा भी जरूरी बा

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गांव के चित्र, लहलहात खेतन में खाड़ केहू के फोटो देखला प मन हरियरा जाला. बाकिर गांव के लोग के स्थिति का बा ? खेती में आदमी लागल त बा बाकिर उनका मिलत का बा? सुविधा खातिर बहुत से लोग शहर में आ के मेहनत मजूरी करताने. हेने गांव बचावे के बातिओ खूब होता, बाकि खाली बाति स का होई.

  • News18Hindi
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गांव के बचावे खातिर हर ओर से आवाज उठत रहेला. कवनो मंच होखे हर जगह गांव बचावे के चर्चा खूब होला. कहे-सुने में निमन लागेला. गांव होखे के चाहीं. गांव के हरियाली के याद सबका आवेला. पेड़ के छांह, सरसो के खेत. बाली के बोझ ले लरकत धान. सब आंखी के सामने लउकेलागे. जे सही में नइखे देखले ओकरा सिनेमा, टीवी के सीन से याद आ जाला. बाकिर गांव खाली एही से बांचि जाइ, इ एगो बड़ सवाल बा.

नगदी के जरूरत
एकर जवाब तब मिली जब गांव के जीवन के सही समझल जाई. केतना सुंदर लिखले बाने-  आहा ग्राम्य जीवन भी क्या जीवन है… बाकिर इ ग्राम्य जीवन में होत का रहल हा. का गांव के जीवन में अइसन रहल हा जवन अब नइखे? एकर सोझ जवाब इ बा कि पहिले गांव में लोगन के लगे नगद रुपया ना रहल हा. जवना के लिक्विड मनी कहल जाला. लोगन के सब काम अनाज से चलत रहल हा. बाकि रुकीं. हमरा कहे के मतलब इ नइखे कि फेर से वही युग में लौट लिहल जाई. बॉटर सिस्टम के बात कइल जाई. गहूं बदलि के चीनी किनल जाउ.

अब जब हर ओर नगदी आ ओहू से बढ़ि के डेबिट कार्ड क्रेडिट कार्ड के बात होता तब काहे गांव पीछे रही. उहां भी बॉटर सिस्टम के जरूरत नइखे. बाकि गांवन में अगर लोगन के पइसा ना मिली त उ शहर के ओर जइबे करिहें. गांव खाली होखबे करी. याद कइल जाउ त प्राइमरी स्कूल में लइका लोग पढ़त रहल हा त ओकर फीस नाम भर के होत रहल हा. केहू के नास्ता खातिर कवनो चीज खरीदे के जरूरत ना पड़त रहल हा. अब गांव गांव में मैगी आ स्लाइस ब्रेड पहुंच गइल बा. तब बिना नकदी के काम भी ना चली. अब प्राइमरी स्कूल के नाम पर खाली बिल्डिंग रह गइल बा त का उहां ईटा आ देवार पढ़ाई? बच्चा उहां काहे पढ़े जइहें.

दौर से तालमेल जरूरी
समाज के ताना बाना नया रूप ले लेले बा. जवन लोग खेत में मजूरी करत रहल हा उ सब मनरेगा से लेकर शहर के फैक्टरी-मिल में मजूरी करे लागल बा. खेती के करी, कइसे करी. पूर्वांचल के गांवन में पंजाब जइसन खेत नइखे जहां हार्वेस्टर से खेती हो सकेला. उहां शरीर के मेहनत से ही अनाज उपजावल जा सकेला. इहां इहो साफ क दिहल जरूरी बा कि पंजाब के उदाहरण दिहला के मतलब इ नइखे कि उहां मेहनत ना होला. बल्कि उहां खूब मेहनत होला. बाकिर बड़ बड़ जोत होखला के कारण मशीन के इस्तेमाल हो सकेला. भोजपुरी इलाका में छोट छोट चक बा. मशीन चलिए ना सकेला.
तब जरूरी बा कि उहां के खेतन के हिसाब से मशीन बने. कुछ अइसन होखे कि लोगन के खेती के जरिए भी नकदी हासिल हो सके. अभी भी नकदी खेती पूर्वांचल खातिर मुश्किल बा. तरह तरह के परेशानी सामने आवेला. अगर लोग नकदी फसल बोए लागे त अभी भी अइसना फसल के बाजार तक पहुंचावल मुश्किल बा. खरीददार खोजल आसान नइखे. कई लोग तरह तरह के सब्जी आ फल बो के देख लेले बा.

पंजाब-हरियाणा माडल पूरुब में केतना चली?
दरअसल, गांव के विकास खातिर अभी भी पुरान मॉडल से रास्ता खोजल जाता. या फिर देश भरि खातिर एक समान नीति तैयार कइल जाता. जवन नीति पंजाब हरियाणा खातिर फायदामंद हो सकेला उहे बिहार आ यूपी में किसान- गांव खातिर फायदामंद होई इ कहला मुश्किल बा. पूर्वांचल में नहर के समस्या बा. जहां बा उहां पानी के अतना बहाव नइखे कि सब जगह पानी पहुंच सके. फेर नहर के उ फायदा ना हो पावेला. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उपज अधिक भइला के एगो बड़ कारण एह क्षेत्र में नहर के जाल बा. एलीवेटेड कैनाल सिस्टम इहां के धरती के पानी से भरि देला. हां, पूरुब में गंगा जी के पानी जरुर बा जवन उहां के किसान खातिर लाइफ लाइन के काम करेला. फेर भी एकर एगो सीमा बा. इ अतना पर्याप्त नइखे कि पूरा पूर्वांचल के एकर फायदा मिलत होखे.

असुविधा में कइसे लोग रही
एह तरह से गांव के बरकत के संगे गांव के बरकार रखले खातिर सबसे ज्यादा जरूरी बा उहां के जरूरत के हिसाब से नीति बनवले के. एकरा अलावा जवन जरूरी बात बा उ जीए खातिर जरूरी सुविधा मुहैया करवले के बा. गांव में अबहियों अस्पताल आ डॉक्टरी के सुविधा नइखे. खैर गांव गांव में त सुविधा देबे के सरकार के नीयत आ ताकत दूनो पर संदेह बा. अगर रहित त मिल गइल रहित. कई गो गांव मिला के कहीं कहीं अस्पताल बा भी त उहां डॉक्टर नइखन. डॉक्टर गांव में कइसे रहिहें. एगो दूगो नर्सिंग-कर्मचारी के भरोसे अस्पताल चलत हवें सब. इलाज के सुविधा बहुत बेसिक जरूरत ह. गांव में इहे ना मिली त लोग आखिर उहां कइसे रही. दअसल, गांव तबे बचल रही जब गांवे में लोगन के पढ़ाई, इलाज आ सबसे जरूरी खर्चा खातिर नगदी रुपया मिली. ना त हरियाली फोटो आ सिनेमा में ही रही. ( डिसक्लेमर– ये लेखक के निजी विचार हैं. )

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