Bhojpuri: काशी क पंडित रामनंदपति सीखउले रहलन दारा शिकोह के संस्कृत, पढ़य पूरी कहानी

वाराणसी गजेटियर के अनुसार, दारा शिकोह 1956 ईस्वी में संस्कृत सीखय काशी पहुंचल रहल. पंडित रामनंदपति त्रिपाठी के विद्वता क काशी में डंका बजत रहल. दारा शिकोह पंडित जी से संस्कृत सीखावय क आग्रह कइलस. काशी क सनातनी पंडित समाज एक आक्रांता के लड़िका के देववाणी संस्कृत सीखावय के खिलाफ रहल अउर पंडित लोग विरोध क आवाज भी बुलंद कइलन.

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बाबा विश्वनाथ क नगरी काशी देश क सांस्कृतिक राजधानी कहल जाला. काशी विद्या अउर ज्ञान क प्राचीन समय से केंद्र रहल हौ. बड़े-बड़े जिज्ञासु इहां अध्ययन करय अउर ज्ञान हासिल करय आवय. काशी के पंडितन क दुनिया में नाम अउर मान रहल हौ. सत्रवीं शताब्दी में अइसय एक विद्वान रहलन पंडित रामनंदपति त्रिपाठी. मुगल बादशाह शाहजहां क बडका लड़िका दारा शिकोह पंडित रामनंदपति से संस्कृत सीखय काशी आयल रहल. दारा काशी में संस्कृत सीखलस अउर कई संस्कृत ग्रंथन क फारसी में अनुवाद कइलस. सिर्र-ए-अकबर शीर्षक से 52 उपनिषद क फारसी में अनुवाद दारा क उल्लेखनीय काम हौ. सिर्र-ए-अकबर क अर्थ होला ईश्वरीय शब्द.

उपनिषद क फारसी से फ्रांसीसी भाषा में अनुवाद भयल, फिर फ्रांसीसी से लैटिन भाषा में. लैटिन अनुवाद 19वीं शताब्दी में जर्मनी के विद्वान आर्थर शापनहावर के पास पहुंचल. शापनहावर उपनिषद पढ़ले के बाद ग्रंथ के मानवीय ज्ञान क पराकाष्ठा बतउलस. एकरे बाद ही जर्मनी में वैदिक ज्ञान के प्रति लोगन में दिलचस्पी बढ़ल.

वाराणसी गजेटियर के अनुसार, दारा शिकोह 1956 ईस्वी में संस्कृत सीखय काशी पहुंचल रहल. पंडित रामनंदपति त्रिपाठी के विद्वता क काशी में डंका बजत रहल. दारा शिकोह पंडित जी से संस्कृत सीखावय क आग्रह कइलस. काशी क सनातनी पंडित समाज एक आक्रांता के लड़िका के देववाणी संस्कृत सीखावय के खिलाफ रहल अउर पंडित लोग विरोध क आवाज भी बुलंद कइलन. लेकिन पंडित रामनंदपति कहलन -ज्ञान क पियासल जे भी ड्योढ़ी पर आवय, सबके ज्ञान क दान करब ही असली ब्राह्मणत्व हौ. पंडित जी दारा के संस्कृत सीखावय बदे खुशी-खुशी तइयार होइ गइलन. दारा काशी में रहि के रामनंदपति से संस्कृत क गहन अध्ययन कइलस. बाद में दारा के ही कहले पर पंडित रामनंदपति ’विराट विवरणम्’ नामक ग्रंथ लिखलन.

दारा रामायण, महाभारत, गीता, योग वशिष्ठ अउर 52 उपनिषद क संस्कृत से फारसी में अनुवाद करइलस. एह काम में 150 विद्वानन क मदद लेहल गयल रहल. इ कुल अनुवाद ईरान के रास्ते यूरोप के देशन में पहुंचल, जहां एनकर अंग्रेजी में अउर दूसरे भाषा में अनुवाद भयल. उहां क लोग संस्कृत के अथाह ज्ञान भंडार से परिचित भइलन. भारतीय ग्रंथन क, संस्कृत भाषा क दुनिया में त धाक जमि गयल. दुनिया में भारतीय संस्कृति, संस्कृत अउर वेद-शास्त्र क प्रकाश अगर पहुंचल हौ, अउर ओकरे कारण भारत क सम्मान बढ़ल हौ, त एकर श्रेय दारा शिकोह के जाला. लेकिन अपने देश में संस्कृत भाषा धीरे-धीरे उपेक्षा क शिकार होत गइल. आज का हालत हौ, सबके सामने हौ.
काशी प्रवास के दौरान दारा मैदागिन के पास रुकल रहल. ओही के कारण महल्ला क नाम दारानगर पड़ि गयल. दारा जब काशी प्रवास पर रहल, ओही दौरान आगरा में शाहजहां बीमार होइ गयल. औरंगजेब समय क फायदा उठाइ के गद्दी पर कब्जा कइ लेहलस. शाहजहां के कैद कइ लेहलस अउर दारा के भी बंदी बनाइ लेहलस. औरंगजेब के न त दारा क संस्कृत प्रेम पसंद रहल, अउर न त शाहजहां क दारा प्रेम. औरंगजेब दारा के काम के इस्लाम विरोधी मानत रहल. दारा के इस्लाम विरोधी करार देइ के 30 अगस्त, 1959 के रात ओकर कत्ल कराइ देहलस.

दारा क जनम 20 मार्च, 1615 के राजस्थान के अजमेर में भयल रहल. उ अपने चारों भाईन में अलग स्वभाव क रहल. बिल्कुल सूफियाना स्वभाव. दारा क जादा समय साधु-संतन अउर पंडितन के संगत में बीतय. संत मियां मीर से उ हिंदू धर्म अउर उपनिषद क ज्ञान लेहलस. मालवा क संत बाबा लाल बैरागी से वेद ज्ञान अर्जित कइलस. अंत में दारा के इत्मीनान होइ गयल कि कुल धर्मन क निचोड़ एक हौ. दारा अपने स्वभाव के कारण ही शाहजहां क चहेता रहल. शाहजहां दारा के ही आपन उत्तराधिकारी बनावय चाहत रहल. लेकिन औरंगजेब दूनों से खफा रहल.

दारा के मरले के बाद औरंगजेब भी बनारस पहुंचल रहल. उ रामनंदपति त्रिपाठी के घरे से कुछ ही दूरी पर आपन डेरा डललस. पुरनिया लोग बतावयलन कि त्रिपाठी परिवार औरंगजेब के काशी प्रवास से भयभीत रहल. काहें से कि दारा ओनही से संस्कृत सीखले रहल. औरंगजेब जब सराय बनवावय लगल त बार-बार दीवार टूटि जाय. औरंगजेब से केव कहलस कि पंडित रामनंदपति से सलाह लेहल जाय. औरंगजेब पंडित जी के पास संदेशा भेजवउलस. रामनंदपति गंगा जल से गारा बनवावय बदे कहलन. औरंगजेब क आदमी लोग मसक में गंगा जल भरि के लियइलन. गंगा जल से गारा बनल, अउर ओही गारा से दीवार जोड़ायल, फिर दीवार नाहीं टूटल. एह घटना से औरंगजेब पंडित रामनंदपति से बहुत प्रभावित भयल.



पंडित रामनंदपति त्रिपाठी के ही परिवार में कई पीढ़ी बाद कमलापति त्रिपाठी पैदा भइलन. कमलापति भी संस्कृत क विद्वान रहलन. स्वतंत्रता सेनानी, कांग्रेस क दिग्गज नेता कमलापति जबतक जियलन, बनारस के राजनीति में एकछत्र राज कइलन. बनारस के जवने महल्ला में औरंगजेब रुकल रहल, उ महल्ला आज औरंगाबाद के नाम से जानल जाला. कमलापति के समय में महल्ला में मौजूद ओनकर घर राजनीति के गलियारा में औरंगाबाद हाउस के नाम से प्रसिद्ध रहल. औरंगाबाद हाउस अबही भी हौ, लेकिन ओकर राजनीति क रंग उड़ि गयल हौ. (लेखक सरोज कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)

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