Bhojpuri Spl: जानीं के रहन परशुराम चतुर्वेदी? जेकरा अघोर बाबा से मिलल रहे संत-साहित्य के अनमोल धरोहर

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आचार्य परशुराम चतुर्वेदी (Acharya Parshuram Chaturvedi) कवनो परिचय के मोहताज नइखीं. इहां के प्रख्यात अनुसंधानकर्ता रहीं और व्यक्तित्व-कृतित्व के जिकिर बलिया रेलवे स्टेशन पर लागल शिलालेखो में मिली.

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 3, 2021, 1:44 PM IST
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उहां के वकील रहनीं, बाकिर साहित्य में अकूत सरधा संत-साहित्य के अधिकारी विद्वान बना दिहलस. उहां के हिन्दी-भोजपुरी के अनन्य भक्त रहनीं आ बलिया जइसन छोट शहर में उहांके हिन्दी प्रचारिणी सभा के स्थापना कइले रहनीं. पत्थल पत्थल पढ़निहारन के उम्दा किताब सुलभ करावे का गरज से उहांके 'चलता पुस्तकालय' नांव से एगो विशाल सार्वजनिक लाइब्रेरियो बनवले रहनीं. उत्तर भारत के संत-परंपरा पर उहांके ग्रंथ मील के पत्थल साबित भइल रहे आ आजुओ ओह कालजयी कृति के महातम के बखान बेगर संत-साहित्य के चरचा अधूरा मानल जाला. एह प्रख्यात अनुसंधानकर्ता के व्यक्तित्व-कृतित्व के जिकिर बलिया रेलवे स्टेशन पर लागल शिलालेखो में मिली. अइसन अनमोल रतन रहनीं आचार्य परशुराम चतुर्वेदी (1894-1979).

दू सूबा के सीमा प बसल गांव आचार्य जी के गांवें जाए के मोका सन् 1980 में जाए के मिलल रहे. उहांके गांव जवहीं दू सूबा के सीमा प बसल बा. गांव के दक्खिनी हिस्सा बिहार में परेला,जबकि उत्तरी भाग उत्तर प्रदेश के बलिया जिला में. गांव के उत्तरी छोर पर बसल उहांके मकान शहर से एकदम कटल बा. दियरा के ई गांव ना त सड़क से जुड़ल बा, ना मूलभूत जरूरी सुविधे से. एही जवहीं गांव के अपना पुश्तैनी घर में जनमल रहनीं आचार्य परशुराम चतुर्वेदी जी. उहंवें के उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में शिक्षक आचार्य जी के पोता ज्ञानस्वरूप चतुर्वेदी हुलसिके बतवले रहलन-'एगो निरक्षर किसान राम छबीला चौबे के बेटा रहलन बाबा. ऊ दू भाई रहलन. छोट भाई नर्मदेश्वर चतुर्वेदी इलाहाबाद में रहत रहलन,जिन्हिकर बेटी अमेरिका में बाड़ी. '

भारतीय संस्कृति के वरद पुत्र

ज्ञानस्वरूप लरिकाइएं से आचार्य जी के संगें रहिके बलिया में पढ़त रहलन. उहांके सुभाव, दिनचर्या,लेखन वगैरह के चरचा करत ऊ बतकही के आगा बढ़ावत कहले रहलन,'हमार बाबा सरल सुभाव के एगो अइसन मनई रहलन,जेकरा में देखावा इचिकियो ना रहे. उन्हुकर जान-परान साहित्यिक पुस्तकन में बसत रहे,जवना के ऊ आपन प्रेयसी मानत रहलन. स्पष्ट वक्ता त अइसन कि जवन किछु तींत-मीठ बात कहे के होखे,सोझे दूटूक कहि देसु. सांझ खा साते बजे खा-पीके सूति जासु. दस बजे एक बेरि उठिके हमरा पढ़ाई-लिखाई का बिसे में पूछताछ कऽ लेसु. फेरु सूति गइला प दू बजे भोर में उठिके एकान्त माहौल में लेखन करत रहलन. सबेरे पांच बजे किछु साहित्यिक संघतिया लोग का संगें घूमे निकलि जासु. लरिकाईं में खरिहानी में बइठिके ऊ छोट-छोट कविता से अपना लेखन के शुरुआत कइले रहलन. जब उन्हुकर अनुसंधान के काम चले,त जरूरी आउर महत्वपूर्ण किताब उपरियावे में छोटका बाबा नर्मदेश्वर चतुर्वेदी जी के अगहर भूमिका रहल. बाबा के उर्दू,फारसी, अंगरेजी,बांग्ला,संस्कृत वगैरह कई भाषा के गहिर ज्ञान रहे. बाकिर तमाम भोजपुरिया लोग से उहांके भोजपुरिए में बतिआईं. कहीं कि भोजपुरी हमनीं के संस्कृति ह. दरअसल भारतीय संस्कृति के वरद पुत्र रहलन बाबा. '
आजी हो गइली बाबा

जवहीं दियरा से वापिस लवटला पर मिड्ढी के निजी मकान में आचार्य जी के बेटा रिपुंजय चतुर्वेदी जी से भेंट भइल. आचार्य जी चूंकि ओही मकान में रहत रहनीं, एह से ओह सड़क के नांव रखाइल रहे आचार्य परशुराम चतुर्वेदी मार्ग. आचार्य जी 1952में ओह मकान के नेंव रखले रहनीं. जवहीं के तत्कालीन ग्राम प्रधान रिपुंजय जी भावविभोर होके कहे लगनीं,'बाबूजी के अभाव बहुते खलेला. ऊ कबहूं हमनीं प खिसिआत ना रहलन. हालांकि हमनीं के खुद कमाईंजा,बाकिर तबहूं ऊ किछु-ना-किछु देते रहसु. कबहूं केहू से किछु लिहलन ना. हरेक सनीचर के ऊ एक्का से बेनागा गांवें जासु,फेरु सोमार के फजीरे लवटि आवसु. लरिकाइएं से उन्हुका में पढ़ेके लालसा रहे, बाकिर बाबा उन्हुका के पहलवान बनावल चाहत रहलन. बाबूजी जब अपना मामा से दिल के बात बतवलन, तब जाके ऊ उन्हुका के ऊंच पढ़ाई खातिर इलाहाबाद भेजववलन. विद्यार्थी जीवन में ऊ खुदे खाना बनावत रहलन. कविवर सुमित्रानंदन पन्त उन्हुकर सहपाठी रहलन.

बाबूजी जब गांव से घीव लेके जासु,त पंतजी मजाके-मजाक में चोराके खा जात रहलन . (निराला जी भी पंत जी प अइसने शिकाइत कइले रहलन). 'बेगर लाग-लपेट के ऊ सही बात कहि देत रहलन. जिनिगी के आखिरी समय में ऊ वकालत छोड़िके साहित्य-साधना खातिर समर्पित हो गइल रहलन. एही बीचे हमनीं के उपरोहित जी अपना एगो मोकदिमा के सिलसिला में उन्हुका से सिफारिश करे लगलन,बाकिर बाबूजी टस-से-मस ना भइलन. 'ऊ अपना आजी के 'बाबा' कहत रहलन. उन्हुकर एगो हमउमिरिया लइका उन्हुका बाबा के बाबा कहत रहे. एक दिन एह बात के लेके दूनों जाना पहुंचि गइलन बाबा का लगे कि ऊ केकर बाबा हउवन?बाबा पट्टीदार के लइका से कहलन-'हम तहार बाबा हईं!' एह बात के शिकाइत लेके बाबा गइलन आजी किहां. आजी हंसते-हंसत कहि दिहली-'तहार बाबा हम हईं!' तब से ऊ आजिए के बाबा कहे लगलन. '



स्वावलंबी बने के सीख

रिपुंजय जी के कहनाम रहे-'पढ़ल-लिखल लोगन के प्रबुद्ध वर्ग उन्हुका के साहित्य-मनीषी बूझे,बाकिर आम अदिमी उन्हुका के बस नामी वकीले जानत रहे. वकीलो रहलन ऊ आम वकीलन से हटिके. जब कवनो नया ममिला आवे,त ऊ दूनों पच्छ के मुवक्किल के बोलाके समुझावे आ समझौता करावे के हर मुमकिन कोशिश करसु. अइसन आदर्श वकील आजु-काल्ह कहां बाड़न?दिन-भर में जतना कमाई होखे,सांझि खा आधा हिस्सा माई के दे देसु आ आधा रकम साहित्य खातिर किताब कीने वगैरह में खरच करसु. लरिकाइएं में ऊ हमनीं के स्वावलंबी बने के सीख दे देले रहलन. '

आखिरी जातरा

3जनवरी,1979के दिन (पुन्न तिथि)इयाद आवते ऊ रोवाइन सूरत बनाके कहले रहलन, 'उन्हुका आंखि में मोतियाबिंद हो गइल रहे आ कानो में दरद होत रहे. लखनऊ में आंखि के सफल आपरेशन भइल. उहंवां मन ना लागल,त ऊ बलिया आ गइलन. एक रोज कवनो बात पर उन्हुका आंखि से लोर बहे लागल आ ऊ अनजान में आंखि मीसि दिहलन. आंखि से खून गिरे लागल,तुरुंते लखनऊ ले गइलीं जा,बाकिर हालत बिगड़ते चलि गइल. ओने रक्तचाप आ कमजोरियो बढ़ि गइल रहे. फेरु त तीन जनवरी के दस बजे रात में उन्हुकर परान-पखेरू उड़ि गइल. '

आनरेरी मजिस्ट्रेट के पद से इस्तीफा

रिपुंजय जी फेरु एगो घटना के बयान करे लगनीं,'जब बाबूजी बलिया में 'आनरेरी मजिस्ट्रेट' रहलन,ओही घरी हमार चाचाजी आजादी के लड़ाई में एगो नामी कार्यकर्ता रहलन. अंगरेज जिलाधिकारी बाबूजी से चाचाजी के पता बतावे के कहलस,फेरु अउरी सहजोगियन के ठेकाना पूछे लागल. बाबूजी कहलन कि ऊ अइसन ना कऽ सकेले. अगिला दिने ऊ ओह पदे से इस्तीफा दे दिहलन. 'ऊ संत-साहित्य के समालोचके भर ना रहलन,बलुक खुदो संत रहलन. सन् 1967के भीषण बाढ़ में ऊ जिलाधिकारी के पानी से लबालब भरल गांवन में लेके गइलन,जीव-जान से लोगन के जान-माल के हिफाजत-बेवस्था में अगहर भूमिको निबहलन. '

सिद्धान्त प अडिग

एक हाली डॉ शोभनाथ लाल बतवले रहलन-'एक बेरि जब उन्हुकर जमीन 'लैण्ड शिलिंग ऐक्ट' में निकलेवाली रहे,त उन्हुका के माल के वकील सलाह दिहलन कि ऊ सिरिफ कागज में अपना पत्नी के परित्यक्ता घोषित कऽ देसु. फेरु त उन्हुकर जमीन बांचि जाई. चतुर्वेदी जी लाल-पीयर होत कहले रहलन-भलहीं मए खेत निकलि जाउ,बाकिर जीयत-जिनिगी,भले कागजे में सही,हम अपना अर्धांगनी के परित्यक्ता घोषित ना कऽ सकीं. '

वकालत परिणीता,साहित्य प्रेयसी

चलते-चलत रिपुंजय चतुर्वेदी बतवले रहलन-'सन्1912में ऊ 'हे मातृभूमि, सुखपुंज धाम' जइसन देशप्रेम से भरल कविता लिखले रहलन. सन्1926में लिखल उन्हुकर वीर रस के कविता 'गरजता सिंह-सा था यह किसी दिन राजपूताना' के आर्यसमाज के लोग आपन जयघोष मानिके रोज सस्वर पाठ करत रहे. एक हाली हम कहनीं, 'जदी रउआं कवनो महाविद्यालय भा विश्वविद्यालय में रहितीं, त ओह विभाग के शोभा बढ़ि जाइत. ' उहांके समुझवले रहनीं,'भलहीं विभाग के शोभा बढ़ि जाइत,बाकिर आजु हम जहवां बानीं,उहवां ना रहि पइतीं. वकालत हमरा के साहित्य परखे के विश्लेषणात्मक दृष्टि दिहलस. वकालत के काम के त एगो समय होला,बाकिर साहित्यसेवा के कवनो तय समय ना होला. न्यायालय के बाॅरो में बइठिके हम अपना शोधार्थियन के मार्ग-निर्देश देत रहेलीं. वकालत हमार परिणीता ह आ साहित्य प्रेयसी. '

बाबा गुलाब दास के प्रेरना

उहवां से लवटिके हम बालसाहित्य-संतसाहित्य के नेही-छोही रचनाकार डाॅ शोभनाथ लाल से मिलनीं. लाल साहेब कई गो गूढ़ रहस्य प से परदा उठावत कहले रहनीं-'संत साहित्य के हलका में आचार्य जी के नजरिया तब व्यापक भइल रहे,जब उहांके मुलाकात क्षिति मोहन सेन से भइल. फेरु उहांके कतने इलाका के भ्रमण कइनीं. एक हाली जब उहांके बांहि में असह पीरा होखे लागल,त उहांके बनारस गइनीं. उहंवें एगो पहुंचल अघोरपंथी संत बाबा गुलाब दास से उहांके भेंट भइल. बाबा से ना खाली संतसाहित्य पर शोध खातिर प्रेरना मिलल,बलुक संतसाहित्य से जुड़ल अनमोल धरोहर आउर संदर्भ ग्रंथो हासिल भइल. फेरु त काशी से लवटिके उहांके एह अनुसंधान में मनसा-वाचा-कर्मणा डूबि गइल रहनीं आ अनमोल रतन लेके बहरी आइल रहनीं. उहांके अकसरहां कहत रहनीं-साहित्यसेवा में जदी हम संत साहित्य के क्षेत्र ना अपनवले रहितीं,त हम आ हमार मनुजता कहीं सस्ते बिका गइल रहित. कबीर उहांके परमप्रिय संत रहलन.

ओकरा बाद श्रीकृष्ण में उन्हुकर आस्था रहे. कबीर प समीक्षात्मक दृष्टि का बारे में ऊ आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के दीक्षा,आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी आ पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल के सराहना करत रहलन आ कहसु कि कबीर प समीक्षा बीसवीं सदी में बइठिके ना,कबीर के काल-परिस्थिति में उतरिके परखे के होई. उहां के इहो कहीं कि संतन के अध्ययन करत-करत केहू ई समुझे जे हमहूं संत हो गइल बानीं,त ई भारी भूल होई. संतन के आदर्श बहुत ऊंच होला. बाकिर ई कहल उहांके बड़प्पन रहे, काहें कि संतन के अनेक लच्छन उहां में देखल जात रहे. ' (भगवती प्रसाद द्विवेदी जी वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)

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