Bhojpuri: पिपरा के पतवा सरीखा डोले मनवा कि हियरा में उठेला हिलोर!

आजु कुदरत से दूर भागत मनई कतहीं के नइखे रहि गइल. जवन प्रकृति जन-जन के हिफाजत करत रहे, ऊ ओकरे भरपूर दोहन मनमाना ढंग से करत आइल आ ओकरे नतीजा बा कि वन,बाग-बगइचा, गांछ-बिरिछ के सफाया कइला का बाद कंकरीट के जंगल में आजु प्रानवायु खातिर तरसत बा. ना जाने, कतना लोग आक्सीजन लेवल कम हो गइला के कारन जिनिगी से हाथ धो बइठल.

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जब से दुनियावी महामारी कोरोना के आतंक फइलल-पसरल बा,हर अदिमी के हाल डावांडोल हो गइल बा. सभ केहू डर के माहौल में जी रहल बा आ अपना-अपना घर में लुकाइल दिन-रात सिरिफ दुखद खबरन से रू-ब-रू हो रहल बा. पीपर के पतई नियर सभे कांपत बा आ डोलत आंतर में शंका-ऊहापोह के बवंडर हिलकोरा मारत बा. तब एगो फिलिमी गाना के मुखड़ा रहि-रहिके इयादि आवत बा-

पिपरा के पतवा सरीखा डोले मनवा

कि हियरा में उठेला हिलोर!

आजु कुदरत से दूर भागत मनई कतहीं के नइखे रहि गइल. जवन प्रकृति जन-जन के हिफाजत करत रहे, ऊ ओकरे भरपूर दोहन मनमाना ढंग से करत आइल आ ओकरे नतीजा बा कि वन,बाग-बगइचा, गांछ-बिरिछ के सफाया कइला का बाद कंकरीट के जंगल में आजु प्रानवायु खातिर तरसत बा. ना जाने, कतना लोग आक्सीजन लेवल कम हो गइला के कारन जिनिगी से हाथ धो बइठल. एक-एक दिन के प्रानवायु खातिर पचासों हजार के आक्सीजन कीनल-बेसहल जा रहल बा आ जिनिगी-मउवत से जूझत लोगन से कफनखसोट कालाबाजारियन के करिया करतूत आजुओ बदस्तूर जारी बा. अइसन आफतकाल में प्रकृति के दरियादिली के एहसास होत बा, जवन हरेक मनई के अरबों-खरब रोपया के आक्सीजन मुफुते बांटत आइल बिया. अइसना समय ई दोहा सुरता प चढ़ि आवत बा-
पानी बाढ़े नाव में, घर में बाढ़े दाम

दोऊ हाथ उलीचिए ,यही सजन को काम.

बाकिर सवारथ में आन्हर अदिमी दूनों हाथ से उबीछे में ना,सहोथे में लागल बा,जबकि फेंड़-खूंट सही माने में आजुओ मनुजता खातिर दूनों हाथ से उबीछिके प्रानवायु के संजीवनी लुटावत बाड़न स. ओइसे त सभे हरियर गांछ-बिरिछ दिन में सुरुज के रोशनी में वातावरन में फइलल कार्बनडाई आक्साइड सोखिके प्रकाश-संश्लेषण के क्रिया करेलन स आ आक्सीजन छोड़िके माहौल के शुद्ध बनावेलन स,बाकिर एगो अइसनो फेंड़ बा,जवन दिन-रात चौबीसों घंटा बस आक्सीजने छोड़ेला आ उहे देववृक्ष पीपर कहल जाला. ताजिनिगी प्रानवायु खुलल दिल से फेंकिके तमाम जीवधारियन के जिनिगी बचावल ई आपन करम बूझेला. एही से तमाम गांछ-बिरिछ में ई सेसर (सर्वश्रेष्ठ)मानल जाला. जे दिन-रात लुटाई,उहे नू पुजाई!



पीपर के माने होला-पवितर, उत्तम. एही से ई मानल जाला कि पीपर में विष्णु भगवान के वास होला. श्रीमद्भगवद्गीता के दसवां अध्याय के छब्बीसवां श्लोक में श्रीकृष्ण भगवान के कहनाम बा-

'अश्वत्य: सर्व वृक्षाणाम.'(10/26)

माने,हम सभ फेंड़न में अश्वत्य यानी पीपर हईं. एह पीपर के श्रीकृष्ण जी अपने सरूप मनले बानीं. गीता के पनरहवां अध्याय में

पीपर के विश्व ब्रह्माण्ड के रूपक से जोड़ल गइल बा आ एकरा के संसार-वृक्ष भा सृष्टि-वृक्ष कहल गइल बा.

अइसहीं अथर्ववेद में एगो मंत्र बा-

'अश्वत्यो देव सदनम्.'

माने, पीपर के फेंड़ देवतन के निवास स्थान ह.

स्कंद पुराण के श्लोक 247आ 41-44के मोताबिक, पीपर के जरि में विष्णु भगवान के वास होला. एकरा तना में केशव(श्रीकृष्ण)रहेलन. डाढ़ आ शाखा में नारायण के निवास रहेला. पतई-पतई में श्री हरि डोलत रहेलन. एकरा गोदा(फल)में मए देवगण एके संगे मौजूद रहेलन.

पीपर के महातम ज्ञान-वृक्ष आ ब्रह्मवृक्ष का रूप में बा. बिहार के बोधगया में एही अश्वत्य यानी पीपर वृक्ष का नीचे गौतम बुद्ध के ज्ञान हासिल भइल रहे. एह से एकरा के बोधिवृक्ष कहल जाला. मानवीय करुना आ शांति में बिसवास राखेवाला बौद्ध धर्मावलम्बी लोग एह बोधिवृक्ष के शाखा श्रीलंका समेत कई देशन में ले गइल. आजुओ देश-विदेश के लोग बोधिवृक्ष के पावन छांह में बइठिके धेयान करेलन आ अपना मनौती के बहतर एकरा शाखा में बान्हिके आस्था-बिसवास के इजहार करेलन.

आजु विज्ञान एह तथ के साबित करि चुकल बा कि पीपर हरदम आक्सीजन बहावेला आ कार्बनडाई आक्साइड के सोखि लेला. वैदिक काल से एकरा पवित्रता के बात एही के मूल में बा,जवना से कि एकरा प्रति आस्था बढ़े आ एकर हिफाजत होत रहे. एह प शनी देवो के वास मानल जाला आ शनी के कोप से बांचे खातिर हरेक शनीचर के एकरा सोरी में जल ढरकावल जाला.

पीपर के काटल अनिष्टकारी होला. देवतन के वास का संगहीं एकरा ऊपर भूत-परेत, पिचास आ राकसो के रहे के डर बतावल जाला, जवना से कि एकरा प्रति जनमानस के सरधाभाव बनल रहो, एकर अस्तित्व बरकरार रहो आ जीवधारियन के प्रानवायु मुफुते में मिलत रहो.

मनई के मउवत का बाद सनातन धरम में आस्था राखेवाला एही फेंड़ के डाढ़ पर घंट टांगेला आ दिवंगत आत्मा के चिरशांति खातिर घंट में रोज दूनों बेरा तय दिन ले पानी देला. फेरु एकादसा का दिन तमाम परिजन के एकरे छाया में मुंडन होला आ महापातर के हाथे करमकांड कराके दान-दछिना दिआला. एह तरी,एकरा के मोक्षदायी वृक्ष मानल जाला.

पीपर के लगावे में कवनो खास मेहनत-मशक्कत ना करे के परे. एकर लमहर अरदुआइ होला आ झगांठ होके ई कई पीढ़ी ले कायम रहेला. ई प्रानवायु आक्सीजन त मुक्तहस्त बांटबे करेला, तमाम जीवधारियन के शीतलतो देला.

एकर छंहरी गरमी में ठंढा पहुंचालेले आ ठंढा में गरमी के एहसास करावेले. एकरा छांह में लरिका-सेयान,बूढ़-जवान,मरद-मेहरारू का संगें गोरुओ-माल हरारत मेटावेलन आ डाढ़ से पुलुई ले बानर,रूखी, चिरइन के बसेरा होला. इहवां बालमंडली किसिम-किसिम के खेला खेलेले आ झूमि-झूमिके गावेले-

चाक डोले,चकबंबक डोले

खैरा पीपर कबहूं ना डोले!

पीपर के फेंड़ जरि से पुलुई ले औषधीय गुणन से भरल-पुरल रहेला. पीपर के पतई से लगातार शुद्ध आ जीवन रक्षक हवा के प्रवाह बनल रहेला. एकर ध्वनिओ रोगनाशक होला. एकरा में कीटाणु नष्ट करेके ताकत होला. छाल से गोदा ले अनेक रोगन के अचूक दवाई होला. एकर अंग-प्रत्यंग आयुर्वेदिक-एलोपैथिक चिकित्सा में उपयोगी होला.

मौजूदा वैश्विक आपदा के दौर में जब सांस-सांस आक्सीजन खातिर तरसत बा,जरूरत एह बात के बा कि एह अश्वत्य जगत के पालक-पालनहार पीपर के फेंड़ पौधरोपन सघन रूप से होखे आ एकर हिफाजत कऽके फेरु से प्रानवायु के संजीवनी जनमानस के सहजे सुलभ करावल जाउ. नवकी पीढ़ी के प्रकृति से मन से जुड़े आ जोड़े खातिर सकारात्मक, रचनात्मक अभियान चलावे के नितान्त आवश्यकता बा,काहें कि जब प्रकृति बांची,तबे जिनिगी बांची आ कुदरती संगीत सुख पहुंचावत रही. आईं, पीपर बचाईं, प्रकृति बचाईं, जिनिगी बचाईं. (लेखक भगवती प्रसाद द्विवेदी जी वरिष्ठ साहित्यकार हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)

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