Bhojpuri: कोरोना के कहर, सम्मानजनक अंत्येष्टि खातिर छछन गइल लोग

भले कम संख्या में होखे बाकिर कोरोना से मुअल बाप, महतारी के लाश छोड़ि के भागे वाला लोग बाड़न. मनुष्यता के जौन परिभाषा अब तक ले हमनी का जानत रहनीं हं जा, ऊ अइसना लोगन के कारन दूषित लउकतिया. एक जगह त एगो बेटा कोरोना से मुअल पिता के अंतिम संस्कार करे एसे ना आइल कि ओकरो कोरोना हो जाई. त बेटी आगे अइली सन आ पिता के अर्थी पर कंधा देके श्मशान ले गइली सन.

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अभियो मनुष्य में दया- माया आ सेवा बांचल बा. अइसन बहुते लोग बा जे बिना कौनो लाभ- लोभ के एह कोरोना काल में भी सेवा कर रहल बा. कुछ लोग अइसनो बा जौन मजबूरी में सेवा कर रहल बा. सेवा ना करी त नोकरी चलि जाई. तबो आशा के लौ जरता कि सब ठीक हो जाई आ हमनी के जीवन फेर पटरी पर चले लागी. त आगा ठीक रहो एकरा खातिर कुछ कष्टकारी परिस्थितियन के तरफ देखे के जरूरत परि गइल बा. हर जगह त ना बाकिर कुछेक जगह पर मानवीय संवेदना गायब हो जातिया. कइसे? आईं देखल जाउ.

भले कम संख्या में होखे बाकिर कोरोना से मुअल बाप, महतारी के लाश छोड़ि के भागे वाला लोग बाड़न. मनुष्यता के जौन परिभाषा अब तक ले हमनी का जानत रहनीं हं जा, ऊ अइसना लोगन के कारन दूषित लउकतिया. एक जगह त एगो बेटा कोरोना से मुअल पिता के अंतिम संस्कार करे एसे ना आइल कि ओकरो कोरोना हो जाई. त बेटी आगे अइली सन आ पिता के अर्थी पर कंधा देके श्मशान ले गइली सन. अंतिम संस्कार भइल. बाकिर महानगर में अइसनो लोग बाड़े जेकर सामाजिक दायरा बड़ा संकुचित बा. मुअला, जियला, बेमारी, हेमारी आ सुख, दुख में केहू आवे वाला नइखे. अइसनो लोग बा जे कौनो दोसरा शहर से ट्रांसफर होके आइल बा. ओकरा घर के केहू मरि गइल त एतना बड़ महानगर में के पूछी. बेचारी ओकर पत्नी/ पति अस्पताल वालन से निहोरा करता कि एह शहर में हम नया बानी. हमार संतान छोटे- छोटे बाड़न स. ओकनी का खुदे लाचार बाड़न स. केहू हित- रिश्तेदार के बोलावल संभव नइखे. त हमरा पति/ पत्नी के अंतिम संस्कार करवा दीं सभे.

मान लीं रउरा कहनीं कि ठीक बा, अंतिम संस्कार हो जाई, बाकिर मुंहे आग के दी? त मान लीं ऊ बेहाल- परेशान मेहरारू बिया त ऊ अवाक हो जातिया. कुछु बोले के हालत में रहते नइखे. हारि के ऊ कहतिया- हम मेहरारू हईं त का ह, हमहीं मुंहे आग देब. महानगर में अइसनो लोग बाड़े जे सामान्य बेमारी से अपना किराया का घर में मुअतारे बाकिर उनुका लाश के श्मशान ले जाए वाला केहू मिलत नइखे. ए कुल काम में नगरपालिका का ओर से मदद मिल जात रहल ह. कुछ पइसा जमा कइला पर चार गो लोग आके लाश श्मशान तक पहुंचा देत रहल ह. बाकिर एह घरी अंतिम संस्कार के काम करावे वाला कर्मचारियो बहुत व्यस्त हो गइल बाड़े सन. ओकनी के दम मारे के फुरसत नइखे मिलत. एतना लोग मुअतारे आ अतना तरह के काम ओकनी के जिम्मे बा कि ई कर्मचारी हेने जा सन कि होने जा सन एतना सोचे के समय नइखे. जेने कहाता ओनिए चल जा तारे सन.

एही बीच में एगो वीडियो सामने आइल बा कि एगो पीपीई किट पहिरले आदमी, एगो बिना पीपीई किट पहिरले आदमी के मदद से एगो लाश के (आरोप बा कि ई कोरोना से मुअल आदमी ह) कौनो पुल से नीचे नदी में फेंकता. माने ओह मुअल आदमी के सम्मान के साथे अंतिम बिदाइयो नइखे होखत. त एगो ई दृश्य बा. आ महानगर में जेकरा चार गो कंधा देबे वाला आदमी नइखे भेंटात, ऊ का करी? ओकरा घर के लोग छछनता कि मुअल आदमी के सम्मानजनक अंतिम संस्कार होखे. सम्मानजनक माने ढंग से, स्ट्रेचर पर लेटा दिहल जाउ आ बिजली वाला श्मशान के चूल्हा तक ले जाए के व्यवस्था हो जाउ. ओकरा बाद त चूल्हा का लगे अइसन सिस्टम बा कि लाश एगो ट्राली नियर स्ट्रेचर पर सुता दिहल जाला आ ट्राली तेजी से लाश के चूल्हा का लगे डगर के अचानक चूल्हा में फेंक देले. बस खतम. हो गइल अंतिम संस्कार. लकड़ी से लाश जरावे के बा त चार- पांच घंटा इंतजार करेके परी. लाश जरे में एतना देर लागिए जाला. बाकिर मुख्य समस्या बा कि श्मशान तक लाश पहुंची कइसे. आसपास केहू पूछे नइखे आवत. सब डेरा के दूर- दूर रहे के चाहता. जेकर केहू परिचित नइखे, ऊ बुरबक बनि जाता. कहां जाउ, केकरा लगे गुहार लगाओ.
अब रउरा कहब कि महानगर में त कतने अइसन संस्था बाड़ी सन जौन कुछ रुपया लेके अंतिम संस्कार करावतारी सन. ओकनी के वेबसाइट भी बा. त सरकार रउरा ठीक कहतानी. बाकिर अकेली स्त्री जब अस्पताल में भा घरे फंसि जाई त ओकर बुद्धि तुरंते ना खुले. ओकरा के केहू मददगार चाहीं. आ एघरी कोरोना के डरे केहू आवे नइखे चाहत. हं अंत्येष्टि करावे वाली जगह पर फोन क के रउरा अंतिम संस्कार करवा सकेनी. जानकारी लेबे के उत्सुकता में एगो अइसने संस्था के हम फोन कइनी. फोन करते एगो स्त्री के आवाज अउवे कि कोरोना से आदमी मुअल बा कि सामान्य बेमारी से. कोरोना वाला शव के चार्ज अलग बा. सामान्य रूप से मुअल आदमी के शववाही गाड़ी मिली. बिना सजावट के तीन हजार रुपया. सजावट करब त आठ हजार रुपया तक रेट बा. गाड़ी संगे ड्राइवर आ खलासी आई. लाश उठावे के आदमी चाहीं त हर आदमी आठ सौ से एक हजार रुपया ली. मान लीं चार आदमी लागी त चार हजार रुपया एक्स्ट्रा. बाकिर एगो वेबसाइट पर गइला पर लउकल ह- बंगाली विधि से संस्कार- 40 हजार रुपए, बिहारी, गुजराती विधि- 70- 80 हजार रुपए. मारवाड़ी विधि- एक लाख रुपए. त अब एमें त कुछ कहल ना जा सकेला. जइसन दोकान, ओइसन दाम.

अब देखीं, जियते में कुछ लोग अपना महतारी के पूछत नइखे. मध्य प्रदेश के राजगढ़ के देवाखेड़ी गांव के निवासी रामकुंवर बाई अपना पति लक्ष्मण सिंह के मुअला के बाद से ही अकेला हो गइल बाड़ी, उनका पांच गो बेटा बाड़न सन बाकिर कुल बेटा शादी होते अलगा हो गइले सन. बूढ़ महतारी के अपना संगे राखे खातिर कौनो बेटा तेयार नइखन स. हारि के महतारी पुलिस से शिकाइत कइली. एसपी माने पुलिस अधीक्षक पांचों बेटन के बोला के समुझवले. तबो कौनो बेटा अपना 80 बरिस के महतारी के अपना संगे राखे के तेयार ना भइल. एसपी खिसिया गइले आ पुलिस पांचों लइकन के खिलाफ 'वरिष्ठ नागरिक देखभाल अधिनियम की धारा 24' के तहत अपराध दर्ज करे के आदेश दिहले. दू गो बेटा गिरफ्तारो हो गइल बाड़न स. त ई त हाल बा कुछ नालायक लइकन के. महतारिए बोझ बनि गइल बिया. बाद में एह पांचों लइकन के बाल- बच्चा भी एकनी बोझ बूझी, तब समझ में आई- जौन करनी, तौन भरनी.

बाकिर अच्छा बात ई बा कि कोरोना के भयभीत काल में भी कुछ लोग अइसन बाड़न जौन सेवा भाव लेके काम कर रहल बाड़न. तब ई लागता कि ई पृथ्वी कबो करुणा, दया आ सहानुभूति के भाव से खाली ना रही. जब एह कठिन समय में अइसन लोग हाजिर बाड़न त हमेशा अइसन लोग रहिहन. आ का जाने भगवाने अइसना लोगन के रूप में आके मदद करत होखसु. त मनुष्यता के अकाल नइखे. करुणा के अकाल नइखे. करुणा अब ना खतम भइल त कबो ना खतम होई. (लेखक विनय बिहारी सिंह वरिष्ठ स्तंभकार हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)

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