Bhojpuri: हिन्दी पत्रकारिता में भोजपुरी माटी के मानुष के धमक आ गमक

हिन्दी के नामवर आलोचक नामवर सिंह से लेके, कविता के क्षेत्र में महारथ हासिल करे वाला केदार नाथ सिंह आ काशी के अस्सी नामक चर्चित किताब के लेखक काशीनाथ सिंह तक, अइसन कई गो नाम बा, जवन भलहीं हिन्दी के सेवा में आपन जीवन खपा दिहल लोग, बाकिर भोजपुरी खातिर कुछ ना क पवला के मलाल एह लोगन के मन में जरूर होई.

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हिन्दी पत्रकारिता में भोजपुरी माटी के गमक आ धमक देश के कोना-कोना में मिल जाई. ई खाली पत्रकारिता तक ले ही सीमित नइखे. साहित्य के क्षेत्र में भी एकर गंध सूंघल जा सकेला. हिन्दी के नामवर आलोचक नामवर सिंह से लेके, कविता के क्षेत्र में महारथ हासिल करे वाला केदार नाथ सिंह आ काशी के अस्सी नामक चर्चित किताब के लेखक काशीनाथ सिंह तक, अइसन कई गो नाम बा, जवन भलहीं हिन्दी के सेवा में आपन जीवन खपा दिहल लोग, बाकिर भोजपुरी खातिर कुछ ना क पवला के मलाल एह लोगन के मन में जरूर होई.

गोपेश्वर सिंह दिल्ली यूनिवर्सिटी में हाल ले प्रोफेसर रहले हां. मैनेजर पांडेय जेएनयू में शिक्षक रहनी आ हिन्दी में खूब नाम कमइनी. ई सभे खांटी भोजपुरिया ह, बाकिर अपना माटी के बोली भोजपुरी खातिर ई लोग कुछ ना क पावल. इहे हाल हिन्दी पत्रकारिता के बा. छोट से बड़ पद तक माने रिपोर्टर-सब एडिटर से संपादक तक ई लोग रहल आ अबहियो बा. नाम आ शोहरत भी खूब कमाता. ई भोजपुरी माटी के कमाल ह. भोजपुरी माटी अइसन उपजाऊ होला, जहां से निकल के केहू कतहीं जाईं, ओही जा आपन छाप छोड़ दी.

हं, त इहां हमनी के बात करत रहनी हां हिन्दी पत्रकारिता में भोजपुरिया प्रतिभा के. भोजपुरिया लोग के कमाल ई ह कि कलकत्ता (अब कोलकाता) जइसन खांटी गैर हिन्दी परदेस (प्रदेश) में ई लोग हिन्दी के झंडा बुलंद कइलस. ई त सभे जाने ला कि देश में हिन्दी के पहिलका अखबार उदंत मार्तंड के प्रकाशन सबसे पहिले बंगाली बहुल कोलकाता से शुरू भइल. सीधे कहल जाव त इहे माने के परी कि कोलकाता हिन्दी पत्रकारिता के जनम स्थान ह. ओकर मालिक भले एक जन बंगाली रहले, बाकिर संपादक रहनी युगल किशोर शुक्ल. रहे वाला त उहां के कानपुर के रहनी, बाकिर गैर हिन्दी भाषी इलाका में भोजपुरिया समाज एतना भरल रहे कि उहां के बोली-भाषा भी भोजपुरिये हो गइल रहे.

बंगाल से दुसरका हिन्दी अखबार 1890 में निकलल रहे- हिन्दी बंगवासी. ओकर मालिक आ संपादक जाति से त बंगाली रहे लोग, बाकिर बंगाली संपादक अमृत लाल चक्रवर्ती गाजीपुर के रहनी, जवन खांटी भोजपुरिया इलाका मानल जाला. कलकत्ता से ओह घरी भा ओकरा बाद जेतना अखबार निकलली सन, ओइमे बालमुकंद गुप्त, विष्णुराव पराड़कर, अंबिका प्रसाद वाजपेयी, लक्ष्मण नारायण जइसन हिन्दीभाषी लोग रहे. एइमे कई जने त भौगोलिक कार्यक्षेत्र भइला के बावजूद कवनो भोजपुरिया से कम ना रहे लोग. पराड़कर जी भलहीं मराठी मूल के रहनी, बाकिर उहां के कोलकाता, बनारस जइसन जगहा पर रहला के कारण अपना बड़हन भोजपुरिया पाठक वर्ग का वजह से कवनो भोजपुरिया से कम ना रहनी. ई लोग ओह समय में कोलकाता के हिन्दी पत्रकारिता के बुनियादी प्रशिक्षण केंद्र रहे लोग, जेकरा से ट्रेनिंग लेके भोजपुरिया माटी के सैकड़न पत्रकार देश भर में फइल गइल लोग. ओही घरी कोलकाता से भारत मित्र के प्रकाशन शुरू भइल रहे. उहो अखबार एही लोगन के ट्रेनी पत्रकार से भरल रहे, जे अपना मूल निवास के कारण खांटी भोजपुरिया रहे लोग.

1914 में कोलकाता से विश्वमित्र के प्रकाशन शुरू भइल. ओकर संपादक आ मालिक मूलचंद अग्रवाल रहले, बाकिर सगरी संपादकीय काम भोजपुरिया क्षेत्र के पत्रकार लोग के जिम्मे रहे. अगर भोजपुरिया क्षेत्र के नामचीन पत्रकार लोग के नाम गिनावल जाव त ओइमे आचार्य शिवपूजन सहाय, रामदहिन ओझा, मुंशी नवजातिक लाल जइसन कई जने पत्रकार लोग के नाम आई. शिवपूजन सहाय बक्सर के रहे वाला रहनी त बलिया के रहे वाला रामदहिन ओझा रहनी. रामदहिन ओझा जी बांग्ला के मशहूर अखबार- युगांतर के हिन्दी संस्करण के शुरुआत कोलकाता से कइले रहनी. रामकृष्ण मिशन, बेलूर मठ से निराला के संपादन में भी एगो अखबार निकलल रहे. मुंशी नवजातिक लाल (बलिया) आ शिवपूजन सहाय (बक्सर) के यारी अबही ले लोग इयाद करेला. पत्रकारिता पर कई गो किताबन के रचयिता पद्मश्री कृष्ण बिहारी मिश्र एह दूनो के इयारगही पर एगो किस्सा सुनाई ले. जब मुंशी जी के निधन हो गइल त शिवपूजन सहाय जी मुंशी जी के घरे गइनी. उहां के उनका विधवा से कहनी कि कवनो जरूरत होखे त खुल के बतइह. एह से कि हमनी दू जान भले रहनी हां सन, बाकिर एक देह अइसन संबंध रहल हा. तब मुंशी जी के जनाना कहली कि अउरी तकलीफ त झेला जाई, बाकिर छाती पर पहाड़ नियर ई दूगो बेटी बाड़ी सन. एकनिये के बियाह के चिंता बा. तब शिवपूजन सहाय अपना बेटा-भतीजा के बतावत कहनी कि रउरा कहीं त दूनो के हम अपना घरे ले जायेब. उहां के अइसन करबो कइनी.

कलकत्ता से हिन्दी में कई गो पत्र-पत्रिका निकलली सन, जवना के मालिक बंगाली रहे लोग, बाकिर अखबार हिन्दीभाषी लोग निकाले आ एइमे बेसी लोग भोजपुरी पट्टी के ही रहे. राजाराम मोहन राय हिन्दी बंगदूत निकलले त श्याम सुंदर सेन समाचार सुधा वर्षण के प्रकाशन शुरू कइले. अबे कोलकाता से भारत मित्र, विश्वमित्र, सन्मार्ग, छपते-छपते, जनसत्ता, प्रभात खबर आ राजस्थान पत्रिका के संस्करण निकल रहल बा. पहिले के ज्यादातर हिन्दी पत्र त अब बंद गो गइल बाड़ी सन.
कोलकाता के हिन्दी पत्रकारिता के जनक मानल जाव त नवजागरण के पत्रकारिता के स्थल बनारस के कहल जा सकेला. बनारस में भी हिन्दी पत्रकारिता के स्वर्णिम इतिहास रहल बा. बनारस से आजादी के लड़ाई के समय रणभेरी के प्रकाशन शुरू भइल. ओही के आसपास आज के प्रकाशन शुरू भइल रहे. दूनो अखबार पर ओह बेरा के अंगरेजी सल्तनत प्रतिबंध लगा दिहले रहे. एह दूनों के प्रकाशन में जवन नामचीन पत्रकार लोगन के नाम आवेला, ओइमें विष्णुराव पराड़कर, रामचंद्र वर्मा, दुर्गा प्रसाद खत्री, दिनेश दत्त झा और उमाशंकर जइसन लोग शामिल रहे. ओकरा बाद त हिन्दी पत्र-पत्रिका के तांता बनारस में लाग गइल. रणहंता, चंद्रिका, शंखनाद, चिंगारी, तूफान जइसन पत्र के प्रकाशन बनारस से शुरू भइल. आजादी के समय जवन-जवन अखबारन पर प्रतिबंध लागल रहे, ई जुझारू पत्रकार लोग ओकर चुप्पे प्रकाशन भी करे.

सांच कहल जाव त 19 वीं सदी में हिन्दी पत्रकारिता के बड़हन केंद्र बनारस बन गइल रहे. ‘बनारस’ काशी से निकले वाला पहिला साप्ताहिक रहे. 1872 तक एकर प्रकाशन जारी रहे. द रिकार्डर आउर सुधाकर के शुरुआतो इहां से भइल. भारतेंदु हरिश्चंद्र के पत्रकारिता में प्रवेश 1867 में भइल. औरत लोग खातिर बोलबोधिनी आ साहित्यिक पत्रकारिता सरस्वती के प्रकाशन भी काशी शुरू भइल. आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी सरस्वती के संपादन कइनी. श्याम सुंदर दास के अगुवाई में एगो संपादन मंडल बनल रहे. शिवपूजन सहाय जी जागरण पाक्षिक के शुरुआत कइले रहनी. 1934 में प्रेमचंद जी काशी से हंस के प्रकाशन शुरू कइनी. छाया पथ आ कमला अइसन पत्रिका के भी शुरुआत काशी से भइल. पराड़कर जी कमला के संपादक रहनी.

हिन्दी दैनिक भारत जीवन के प्रकाशन 1914 में शुरू भइल. 1920 में आज के प्रकाशन शुरू भइल. बाबू शिव प्रसाद गुप्त जी अपना करीबी बाल गंगाधर तिलक से सलाह के बाद एकर प्रकाश शुरू कइनी. पंडित गंगाशंकर मिश्र के संपादन में सन्मार्ग के प्रकाशन 1946 में शुरू भइल, जवना के प्रकाशन आज कोलकाता समेत कई शहरन से भी हो रहल बा. बनारस, हलचल के अलावा गांडीव के प्रकाशन 1950 में शुरू भइल. जनमुख, भारत दूत, काशी वार्ता नाम से सांध्य अखबार भी काशी से निकले लागल. 1972 में जनवार्ता भी शुरू भइल. कई गो भोजपुरी इलाका के लेखक लोग तैयार भइल. चतुरी चाचा के व्यंग्य कालम आजो लोग के जुबान पर बा. अब त दैनिक जागरण, अमर उजाला, हिन्दुस्तान, राष्ट्रीय सहारा, जनसंदेश जइसन राष्ट्रीय स्तर के अखबारो काशी से निकल रहल बाड़े सन.

कोलकाता में हिन्दी अखबार के प्रकाशन भलहीं पहिले शुरू भइल, बाकिर बाद में एकर विकास-विस्तार बनारस में बेसी भइल. लेखक, संपादक के संगे अखबार के निचला पद पर काम करे वाला तमाम लोग भोजपुरी अंचल के रहे आ अबहूं बा. बलिया जइसन भोजपुरी इलाका से निकलल हरिवंश बड़ पत्रकार भइले. अबे ऊ राज्यसभा के उपसभापति बाड़े, बाकिर उनकर पहचान पत्रकार के रूप में बेसी बा. कृपाशंकर चौबे बलिया के हवें. काफी समय तक ऊ कोलकाता में पत्रकारिता कइले. अबे ऊ महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा में प्रोफेसर बाड़े. एह से ई कहल जा सकेला कि भोजपुरिया लोग के बिना हिन्दी पत्रकारिता के पांव टिकावल मुश्किल बा. (ओमप्रकाश अश्क वरिष्ठ पत्रकार हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)

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