Bhojpuri Special: जतरा के पतरा अउर रेणु, राज कपूर आ आंचलिकता के सवाल

संजोग देखीं कि रेणु के पहिचाने बदे हिंदी सलीमा के एतना बड़हन इंडस्ट्री में कुल जमा एक्के जोड़ा आँखि रहल आ ऊ रहल राज कपूर के. उहो रेणु जी के एक्के गो कहानी पर काम क पवले.. तीसरी कसम. अबहिनो जब तीसरी कसम के होस परेले त सलीमा के एक-एक ठो सीन आँखी में नाचे लगे लन. ‘चलत मुसाफिर मोहि लियो रे...’ के धुन काने में रस घोले लगेले.

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साहित्य में आंचलिकता के महातम एह नाते ना हौ कि ओसे कौनो खास बोली या भाखा के कुछ बल मिल जाले. ना, एहू नाते ना हौ कि ओसे कौनो जवार के संस्कृति के कुछ बिकास हो जाले. आंचलिक साहित्य के महातम के असल वजह ई हौ कि उहाँ ऊ जवार गहगहा के मूर्तमान हो जाले. अगर साहित्यकार समर्थ हो त ऊ जवार किताबी के पन्ना पर पाठक लोगन से एकदम बोलत-बतुआत कहकहा लगावत बुझाए लगाला. ऊ खाली साहित्य ना रहि जाला, कागज के पन्ना पर चलत सलीमा बन जाला. एकर सबसे बड़ा और जीवंत परमान हवें रेणु जी. हाँ-हाँ इहाँ फणीश्वर नाथ रेणु जी के बाति होत बा.

उहे रेणु जेकर पंचलाइट आज के बिजुलबत्तियो वाले जमाने में साहित्यप्रेमी लोगन के बीचे गाँवे गाँव जराता. सलम सलम वाला सलीमा के गीत गाए वाला गोधन अबहिनो केहू के भुलाइल ना बाटें. लेकिन संजोग देखीं कि रेणु के पहिचाने बदे हिंदी सलीमा के एतना बड़हन इंडस्ट्री में कुल जमा एक्के जोड़ा आँखि रहल आ ऊ रहल राज कपूर के. उहो रेणु जी के एक्के गो कहानी पर काम क पवले.. तीसरी कसम. अबहिनो जब तीसरी कसम के होस परेले त सलीमा के एक-एक ठो सीन आँखी में नाचे लगे लन. ‘चलत मुसाफिर मोहि लियो रे...’ के धुन काने में रस घोले लगेले. खाली एक्के गो ना, अइसन कई गो गीत हवें एह सलीमा में जौन जौने के सुध में मनई अपनो सुध-बुध भुला जा.

खाली शैलेंद्र के लिखल गीतन के बाति कैल जा त ‘पान खाए सैयाँ हमारो...’ हो या ‘सजनवा बैरी हो गए हमार...’ या फिर ‘लाली लाली डोलिया में...’ हर गीत अबहिनो आपन पूरा असर रखेले. ‘सजन रे झूठ मत बोलो...’ एक समय में भारत के हर जुटान के पहिचान बनि गैल रहल. बहुत लोगन के सुबह-शाम एक समय में एही गीत से होत रहल. एही तरह के एक और गीत हसरत जयपुरी के भी रहल एहमे ‘दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समाई’. हसरत जयपुरी के ही एगो और गीत ‘मारे गए गुलफाम...’ के ओह समय ई हैसियत हो गैल रहल कि ई तीसरी कसम के दूसर नाम हो गैल रहल. कई जगह अबहिनो शीर्षक के तौर पर दुनो एक साथे मिलेलन ‘तीसरी कसम उर्फ मारे गए गुलफाम’.



हम एह गीतन के चर्चा एहनाते नाई करत हई कि कौनो शैलेंद्र या हसरत जयपुरी या उनके जैसन ओह समय के और गीतकारन के चर्चा कइले में हमके बड़ा रस मिलेले. असल बाति ई ह कि पहिले से लेके आखिरी गीत तक तीसरी कसम के हर पद हर पंक्ति में जौन सहजता हौ, ऊहो रेणु के ओह आंचलिकता के पुरहर साझेदार हौ जौने के नाते उनके रचनाधर्मिता के जानल जाले. ओइसने सोझ, सपाट आ सीधे करेजा में उतरि जाए वाला जइसन पुरबिहा मनई होला. एह मामले में हमके राज कपूर एह नाते महत्वपूर्न लगेलन कि ऊ एह सलीमा के सुरू से आखीर तक रेणु के ओह आंचलिकता के हर सर्त के पूरी तरह निबहले जौन उनकर आ उनके माटी के पहिचान रहल.
बॉक्स ऑफिस पर ‘तीसरी कसम’ आपन का कारगुजारी देखवलस, ई त सलीमा के एक्सपर्टे लोग बता पाई. लेकिन ई बात तय हौ कि रेणु के हर कहानी में सलीमा के पूरी संभावना मौजूद हौ. अब ऊ चाहे ‘मैला आँचल’ हो या ‘जुलूस’ या ‘दीर्घतपा’ या फिर ‘परती परिकथा’. इहाँ तक कि उनके कुछ रिपोर्ताज पर उनके चित्रण के शैली के ई पूरा असर देखल जा सकेले. चाहे ‘ऋणजल-धनजल’ हो या फिर ‘बनतुलसी की गंध’.

ई बिचित्र बाति हौ कि जौने सलीमा में हर प्रांतीय भाषा के नाम पर एकहक ठो अलग-अलग कोटर बनल हौ, बॉलीवुड के बाद टॉलीवुड से लेके थालीवुड ले लौकेले ओहमें आंचलिक साहित्य के सम्मान करे वाला राजकपूर के बाद एक्को शोमैन ना लौकाले. बेशक भोजपुरी सलीमा बनल, मराठी, बंगला, पंजाबी, तमिल, तेलुगु, गुजराती, कन्नड़, मलयालम, असमिया तक हर भाखा में सलीमा बनेले. हर साल खरबन के बजट हर भाखा-बोली के नाम पर सलीमा के उद्योग में बहावल जाले. लेकिन एहमन से बड़े मोस्किल से कबो कौनो सलीमा अइसन लौका जा त तबो ई बड़ी बाति होई.

नाहीं त आंचलिकता के नाम पर अधिकतर सलीमा खाली एगो भाखा या बोली के प्रतिनिधित्व क के रहि जाले. ऊ ओह ढंग से आपन संस्कृति भी उभार ना पावेले जौने ढंग से ओके उभरे के चाहीं. एह सिलसिले मे हमके दू गो फिल्म याद आवेली. एक त एस.एन. त्रिपाठी के ‘बिदेसिया’ आ दूसर गोविंद मुनीस के ‘नदिया के पार’. बिदेसिया त भिखारी ठाकुर के लिखल आ कई बेर के खेलल मौलिक नाटके रहल. सही पूछीं त भोजपुरी में सलीमा बन सकेले, आ उहो एतना बढ़िया, एकर ऊ पहिला प्रमाण रहल. ठीक एही तरह से अवधी के लिए ‘नदिया के पार’ साबित भैल. ई अपने मूल रूप में ‘कोहबर की शर्त’ उपन्यास पर आधारित रहल. केशव प्रसाद मिश्र के ई उपन्यास भी अपने समय के सच पुरहर जीवंतता के साथ उजागर कइले में ओही तरह से सफल हौ जैसे कि रेणु जी के ‘मैला आँचल’ या ‘पंचलाइट’. भोजपुरी जवार पर राही मासूम रजा के ‘आधा गाँव’ या रामदेव शुक्ल के ‘ग्राम देवता’ आ अवधी जवार के लिए श्रीलाल शुक्ल के ‘राग दरबारी’ में भी एकर संभावना मौजूद बा.

निस्संदेह, भारत के अन्य भाखा-बोली के साहित्य में आंचलिकता के पूरी संभावना बा आ इहो तय हौ कि अगर ऊ सलीमा के परदा पर आवे त आंचलिक विशिष्टता के साथे-साथे भारत के एक-एक जवार के बहुत सूक्ष्म सत्य सामने लावे में सक्षम होई. एकरे बावजूद ई सच्चाई बा कि भारतीय साहित्य के एह मामले में पूरा सक्षम भइले के बावजूद भारतीय के एहमे रुचि बहुत कम लौकाले. आंचलिकता के बात कैल जा त भारतीय साहित्य के सामर्थ्य रहल जौन रेणु के बादे राजा राव के ‘कांतापुरा’ उपन्यास से दुनिया भर के अंग्रेजी साहित्य में खास भाषा और आंचलिकता के लेके नया विमर्श उठि गैल रहल. राजा राव के ई कृति खाली उपन्यास कला आ कथाशैली ही से ना, भाषा विज्ञान के दृष्टि से भी नया विमर्श छेड़ देहले रहल. का आंचलिकता के रेणु वाली अवधारणा के जन-जन तक पहुँचावे वाला राज कपूर के बाद फेर केहू मिली? (लेखक इष्ट देव सांकृत्यायन वरिष्ठ स्तंभकार हैं.)
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