Bhojpuri Special: रेणुजी के लेखन में फूल भी बा, शूल भी बा, धूल भी बा, भावी भारत के कल्पना भी रहे...

सामाजिक, धार्मिक अउर राजनीति शोषण के रेणुजी जइसन सजीव चित्रण कइले वइसन शायद कवनो दोसर लेखक ना कर पइले. आज से पचास-पचपन साल पहिले रेणुजी राजनीतिक बिरोधाभास के जइसन खाका खींचले रहन ऊ आज के दौर में भी सटीक बा. उनकर कहानी में भावी भारत के भी कल्पना रहे.

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फणीश्वरनाथ रेणु के कहानी के केन्द्र में गांव रहे. लेकिन ऐह गांव में पूरे भारत के झलक रहे. रेणु जी खुद ‘मैला आंचल’ के बारे में लिखने बानी, एकरा में फूल भी बा, शूल भी बा, धूल भी बा, गुलाब बा, कीचड़ भी बा, सुंदरता भी बा, कुरुपता भी बा, हम एकरा से बच-बचा के ना निकल पइनी. सामाजिक, धार्मिक अउर राजनीति शोषण के रेणुजी जइसन सजीव चित्रण कइले वइसन शायद कवनो दोसर लेखक ना कर पइले. आज से पचास-पचपन साल पहिले रेणुजी राजनीतिक बिरोधाभास के जइसन खाका खींचले रहन ऊ आज के दौर में भी सटीक बा. उनकर कहानी में भावी भारत के भी कल्पना रहे.

गनपत के बहाने कौमनिस्ट के सच्चाई
राजनीति में कार्जकरता के कतना फजीहत होला एह सच्चाई के रेणुजी आपन कहानी ‘आत्मसाक्षी’ में देखवले बाड़े. 1964 में भारत के कौमनिस्ट पाटी में बंटवारा हो गइल रहे. आत्मसाक्षी कहानी के पात्र गनपत एह बंटवारा से बेहाल हो जात बाड़े. उनकर आपन घर-बार ना रहे. अपना दम पs पाटी के आफिस खाड़ा कइले रहन. आफिसे उनकर बसेरा रहे. लेकिन पाटी में बंटवारा के बाद गनपत के आफिस छोड़े के हुकुम सुना दिहल जात बा. उनका के पाटी से भी निकाल दिहल जात बा. तब गनपत के राजनीति से मोहभंग हो जाता. ऊ अपना के ठगाइल महसूस करत बाड़े. दिन रात गांव-गांव में घूम के कौमनिस्ट पाटी के परचार कइले लेकिन मिलल का ? राजनीति में कार्जकरता के कइसे सोसन होला, एह कहानी में बड़ा सटीक चित्रण कइल गइल बा.

हर अदिमी के दू टुकड़ा, दू मुखड़ा
रेणु जी आत्मसाक्षी कहानी में लिखले बाड़े, परिवार, जात, धरम अउर हर अन्याय से लड़े वला लड़ाकू गनपत आज अखड़ा में हारल पहलवान जइसन चित पड़ल बाड़े. सभ केहू उनका पीठ पs एक लात लगा के, गारी दे के चल देता. पैतीस साल तक मुंह, जीभ, मन पs लगाम लगा के ऊ पब्लिक के काम कइले. केहू के एगो तिनको ना चोरवले, ना पाटी के एक पइसा गड़बड़ कइले. माई-बाप, भाई-बहिन, गांव सामज से भी बढ़ के पाटी के झंडा के समझले. लेकिन सभ बेकार हो गइल. गनपत के बूझात बा कि सूरज-चांद में भी दरार पड़ गइल. दुनिया के हर चीज दू भाग में बंटा गइल. हर अदिमी के दू टुकड़ा, दू मुखड़ा हो गइल बा. उनकर मन उनका से सवाल पूछत बा, गनपत तहार लीडर लोग धरम के अफीम कहे ला लेकिन ऊ लोग काहे ना अपना बेटा-बेटी के बियाह दोसरा जात में करे ला ? बेटा के बियाह में कामरेड रामलगन सरमा 25 हजार रोपेया गिनवले रहन. गनपत के मन पूछता बा, तहरा लीडर लोग के लइका दारजिलिंग, देहरादून के अंग्रेजी स्कूल में पढ़ेला, तहार पाटी के सचिव के मेहरारू कांग्रेसी मंत्री बने खातिर जात-पात कर रहल बाड़ी, ई कौमनिस्ट पाटी के कइसन रूप सामने आ गइल बा ? रेणुजी अपना कहानी में राजनीतिक उत्पीड़न के जवन चित्र ऊ पचास सालपहिले खींचले रहन ऊ आज बी जेंव के तेंव लागत बा. आजो नेता खातिर अगर नियम और कार्जकरता खातिर अलग नियम बा.



जवन देखले भोगले उहे लिखले
रेणुजी के जीवन में गाव अउर शहर के अदभुत मेल बा. ऊ हिंदी साहित्य के पहिल लेखक रहन जे खुद खेती करत रहन. जब धान के रोपनी के समय आवे तs ऊ आपन गांव औराही हिंगना चल जास. रोपनी डोभनी खतम हो जाव तs ऊ पटना आ के कलमकारी करे लागस. उनकर एक फोटो बहुत मसहूर बा जवना में ऊ बाबा नागार्जुन संगे खेत में धान रोप रहल बाड़े. गांव में जवन ऊ देखले-भोगले, ओकरे के कहानी में उतरले. रेणुजी के लिखल रिपोर्ताज में समकालीन राजनीत के अदभुत बरनन बा. उनकर लिखल रिपोर्ताज ‘चुनावी लीला-बिहारी तर्ज’ में 1967 के बिधानसभा चुनाव के पहिले के जिक्र बा. जइसे आज के सरकार अउर विपक्ष अखबर अउर पत्रकार से नाखुश रहे ला उहे हाल 1967 में भी रहे. रेणुजी लिखले बाड़े, पत्र अउर पत्रकार से केहू खुश नइखे. ना बिरोधी दल के लोग न सरकार चला रहल कांग्रेस के लोग. बिरोधीदल के सभा में एक अखबार के मुख्यमंत्री के खबर कहल गइल. जब कि ओही अखबार के एगो रिपोरटर के मुख्यमंत्री के आदिमी धमकी देले रहन. मुख्यमंत्री के अनराजी रहे कि ऊ पत्रकार आपन बात उनका मुंह में पेन्हा देत रहन. जेकर राजनीत से वास्ता नइखे ओह लोग के कहनाम बा कि चुनाव में पतरकार लोगन के पांचों अंगुरी घीव में बा.

रेणुजी निष्पक्ष पतरकार भी रहन
एही रिपोर्ताज में रेणुजी लिखले बाड़े, टिकट के लड़ाई में जीतल कांगरेसी लोगन के सदाकत आसरम में मिलन अउर भोज के आयोजन भइल. अगिला दिन अखबरा में खबर छपल कि हर कंडिडेट के एक जीप अउर अढ़ाई हजार रोपेया मिली. चुनावी लीला शुरू बा. अब देखे के बा कि कांगरेस में लगल आग के मुख्यमंत्री कइसे बोतावत बाड़े. कायस्थ कांगरेसी, राजपूत कांगरेसी, भूमिहार कांगरेसी, मैथिल बराहमन कांगरेसी, बैकवर्ड कांगरेसी, मैजरोटी-माइनोरिटी ग्रुप के अनराज अउर नेता चुनाव में कवन रंग देखइहें, ई देखे वला बात होई. 1967 के चुनाव में रेणुजी जवन आशंका जतवले उहे भइल. आपस में लड़त-भिड़त कांगरेस के करारी हार भइल. बिहार में पहिला बेर गैरकांगरेसी सरकार बनल. रेणुजी मिजाज से क्रांतिकारी अउर बिचार से समाजवादी रहन. लेकिन जब ऊ पत्रकार के रूप में कलम उठवत रहन तs बिना कवनो पक्षपात के उहे लिखस जनव आंख के सोझा होखे. लेखन में अइसन ईमानदारी बिरले मिले ला. (लेखक अशोक कुमार शर्मा वरिष्ठ स्तंभकार हैं.)
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