भोजपुरिया लोकजीवन : फांकामस्ती में कबीर के ठाट इहां लउकेला

बाढ़, सुखाड़ आ अकाल के चपेट में भोजपुरी वाला इलाका हर साल आवेला, फेर भी इहां के लोकजीवन में मधुरता के कमी ना होला. जनम -जीवन आ जीवन के बाद भी, हर मौका खातिर गीत आ उत्सव के येह समाज में विधान बा. एकरा यही रंग से विद्यापति जी भी प्रभावित रहनी है. भोजपुरी लोक के यही महत्व पर लेख-

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  • Last Updated: September 23, 2020, 12:31 AM IST
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'धन्य भोजपुर ई हमार
आ धन्य इहां के माटी,
कवनो गुन में एसे केहू
ना आंटल, ना आंटी'
विश्वनाथ प्रसाद शैदा के एह मशहूर पांती में सबगुन आगर भोजपुर के कठकरेजी सुभाव आ जीयत जिनिगी आखिरी सांस ले कबो हार ना मानेवाला अक्खड़ मन-मिजाज के झलक मिलत बा. 'हारब त हूरब आ जीतब त थूरब 'कहाउत इहंवें सिरिजाइल रहे. इहवां भोजपुर कवनो गांव आ जिला के ना,बलुक देस-दुनिया में फइलल-पसरल सउँसे भोजपुरी हलका के सूचक बा. ताजिनिगी जद्दोजहद आ जीवटते के नतीजा बा कि भोजपुरिया मनई दुनिया-जहान के जवना कोना-अँतरा में गइलन, आपन जांगर ठेठवला का बल-बूता पर खास जगह बनवलन आ इतिहास में एगो मिसाल कायम कइलन. एकरा जरि में बा--भोजपुरिया लोकजीवन आ सामाजिक सरोकार. भोजपुरिया मनई खाली अपना बारे में ना, बलुक गाँव-जवार, देस-दुनिया खातिर जीए-मूवे में भरोसा राखेला. आन खातिर जान के बाजी लगावल इहां के लोगन के फितरत होला.

कुदरत के कोरा में हँसत-खेलत आइल बा भोजपुरिया लोक आ गते-गते इहंवें पनकल, फइलल-पसरल भोजपुरिया संस्कृति. 'भोजपुरी साहित्य के इतिहास' के अगरासन में डॉ अर्जुन तिवारी जी एकर झलक देखवले बानीं--'देवात्मा हिमालय के तलहटी से नेपाल तक आ विन्ध्य पर्वतमाला के बीच में गंगा, यमुना, गंडक, घाघरा, राप्ती सोनभद्र के तट पर जवन पावन, मनभावन वन-उपवन बा, उहे असली भोजपुर क्षेत्र ह. देवारण्य, सारण्य, चम्पारण्य आ विन्ध्यारण्य--ई चार स्वर्ण चतुर्भुज क्षेत्र में आपन भोजपुरी संस्कृति पनकल, बढ़ल, गदराइल, छितराइल आ एगो बट वृक्ष बनके समृद्ध भइल. प्रकृति के गोद में खेलत-कूदत, सगरी विकृति से दूर रहके हमनीं के भारतीय संस्कृति के चहुंतरफा फइला रहल बानीं, एही से पूरा विश्व 'अग्रजन्मा के रूप में भोजपुरी के पहचानेला.'



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भोजपुरिया लोकजीवन गाँवन में बसेला आ कृषि संस्कृति इहां के लोकसंस्कृति ह. घर-दुआर से गाँव-जवार ले, बधार के खेत-खरिहान से लड़ाई के मैदान ले इहाँ सोझ-साफ अदिमी का रूप में 'लोक ' लउकेला .बेगर लाग-लपेट, छल-कपट के साफ-साफ दूटूक कहे-सुने में बिसवास करे वाला लोक. पोथी के भारी-भरकम किताबी पंडिताई वाला ना, परेम के अढ़ाई आखर बाँचे वाला लोक. नेह-छोह से लबालब भरल भर-भवद्दी, हितई-नतई, मिताई-इयारी निबाहे वाला लोक. कसरती देह-धाजा वाला गभरू जवान, जे आत्मसम्मानी होला आ जेकरा झूठ-मूठ के बखान, छूत-छात, जी हजूरी, कायरता आउर दोसरा के मेहरारू पर बाउर नजर लगावल कबो बरदास ना होला .फेरु त ओकरा अनेति के खिलाफत खातिर लोहा लेबहीं के परेला. 'भानु' जी के एह सटीक कहनाम के भला कइसे भुलाइल जा सकेला:

'झूठ ना बखाने जाने, छूत-छात ना माने जाने,
माने-जाने सभके ,ना जाने जी-हजुरिया,
धुरिया चढ़ावे जाने, पीठ ना देखावे जाने,
दीठ ना लगावे जाने आन के बहुरिया,
आन पर लड़ावे जान, जान के न जान जाने,
चले के उतान जाने तान के लउरिया,
बात मरदानी जाने, चाल मस्तानी 'भानु ',
होला एक पानी के मरद भोजपुरिया.'

हर साल दहार, सुखार, अकाल के चपेट में आवेवाला भोजपुरी इलाका अभाव-तंगी से भरल-पुरल रहल बा. इहे कारन बा कि इहाँ के अधिकतर मरदाना रोजी-रोटी के जोगाड़ में परदेसे जाके छिछिआए खातिर अलचार बाड़न. बाकिर अभावो में लोक संस्कार आ लोक संस्कृति भोजपुरिया लोग-लुगाई के जिनिगी के जियतार बनवले राखेले .इहे वजह बा जे आस-हुलास के डोर ई लोग हरदम थम्हले रहेला आ खुद त जागल रहबे करेला, समाजो के जगवले राखेला. त्रिलोचन शास्त्री जी एही

लोक खातिर बुला कहले रहलन:
'भाव उन्हीं का सबका है
जो थे अभावमय,
पर अभाव से दबे नहीं,
जागे स्वभावमय .'

इहाँ के लोकजीवन में जनम से मउवत ले संस्कार आ ओह से जुड़ल लोकगीत रचल-बसल रहेला .फसिल आ मउसम से जुड़ल, परब-तेवहार पर गवाए वाला गीतन के भला का कहे के!जनम-छठियार पर सोहर, जनेव-बियाह में एक से बढ़िके एक गीत, उहँवें जँतसार आउर रोपनी-सोहनी-कटनी के मन मोहे वाली गीत-गवनई .फगुवा, चइता, कजरी, बारहमासा के त बाते अउर बा .आल्हा-ऊदल, कुंवर विजयमल, बिरहा के भला के बिसरा सकेला .नारी-कंठ से फूटे वाला संझा-पराती, झूमर .परेम पियारी गारी त पथलोदिल के पघिला देले .तबे नू मए दुख-दलीदर भुलाके लोग झूमे खातिर अलचार हो जाला.

विद्यापति जी के त कहनामे रहे--देसिल बयना सब जन मिट्ठा!भोजपुरी के मिठास त जग-जाहिर बा. एह में कुदरती मिठासो नू घोराइल बा. आंजनेय जी के रसगर बानगी अखियान करे जोग बा--'कहल जाला जे भोजपुरी के पानी आ बानी मीठ, बरियार आ सहजोर होला .एमें मदन रस मातल महुआ के ताजगी आ मह-मह महक बा, अपना मनमोहक नशा में अग-जग के गोति देबे वाला लेंढ़ियात कटहर के सरस गभुराइल गमगम गमक बा, मोजराइल आम के मदमातल सुवास बा, अपना जोरावर माटी के सोन्हाई बा, भरम के काटिके मरम के डिठार करा देबे वाली भाषा के आंजन बा, पुरखन के मरजाद बा, हियरा हुलसावे वाली गंगा के पवित्रता बा, हिमालय के ऊंचाई बा,सागर के अतल गहराई बा, अमराई के जुड़छाँह बा आ सुरुज के तेज जवरे आगि के गरम आँचिओ---'

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बाकिर आजु बुद्धू बक्सा, फिलिम आ बाजारवाद के गाँव-गाँव में पइसार लोकजीवन के सहजता छीनत जा रहल बा आ छीजत जा रहल बिया आदिकाल से पीढ़ी दर पीढ़ी गहिर पइठ बनवले लोकसंस्कृति .ई आत्मघाती सुरसा लीलत जा रहल बिया--हितई-नतई के, दोस्ती-इयारी के, एक-दोसरा के सुख-दुख में साझ निश्छल सोच के आउर सामूहिकता में जीए वाली जिन्दादिली के .नतीजतन लोग अपना आप में सिमटल-सिकुड़ल जा रहल बा .

आजु भोजपुरिया लोकजीवन से लोक के लोप होत जा रहल बा परदुखकातरता कतहीं लउकत नइखे .सवारथ आ अरथ में आन्हर समाज कुंवर सिंह, मंगल पाण्डेय नियर लोकनायकन के लोकनायकत्व के भुला देले बा .'बाबू कुंवर सिंह तेगवा बहादुर--' आ 'सदा आनंद रहे एहि द्वारे--' नियर हुलास-उछाह से भरल गीत-गवनई का जगहा मशीनी औपचारिकता, अपसंस्कृति, लँगटई आ दबंगई के पइसार चिन्ता-चिन्तन के विषय बा .भोजपुरिया लोकजीवन आ खाँटी माटी के मन-मिजाज के माफिक का ऊ सोन्ह-मीठ अहसास फेरु ना लवटी?

'फाँकामस्ती में कबीर के ठाट इहां लउकेला,
कुंवर सिंह-अस धरे फँफेली, जे बेसी फउकेला,
रकत बहे मंगल-चित्तू के, मन सोझबक आ निश्छल,
नाथे नाग तुरंते जे कढ़ले छत्तर छउकेला,
बिगुल बजाव ऽ अब विद्रोही, हक आपन खाँटी ह,
सोन्ह-मीठ गुरवा जइसन ई भोजपुरी माटी ह ऽ .'
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