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भोजपुरी विशेष - चीन के दीवार में सींह मारे वाला आकाशवाणी के “लोहा सिंह”

रेडियो के समय में लोहा सिंह रेडियो नाटक के बहुत लोकप्रिय कैरेक्टर रहला हां.
रेडियो के समय में लोहा सिंह रेडियो नाटक के बहुत लोकप्रिय कैरेक्टर रहला हां.

रेडियो ड्रामा के कैरेक्टर लोहा सिंह के बिहार आ उत्तर प्रदेश के पूरबी हिस्सा में बहुत बड़ श्रोतावर्ग रहल हा. इ कैरेक्टर भोजपुरी त ना बोलत रहल हा लेकिन एकर भाषा सबका समझ में आवत रहल हा. इहां तक कि इ कैरेक्टर से चीन के सरकार परेशान हो गइल रहे.

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 9, 2021, 9:06 AM IST
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आजु जबकि भारत-चीन सीमा पर लमहर समय से तनातनी चलि रहल बा, सन् उनइस सइ बासठ के एगो वाकया सुरता प चढ़त बा. ओही साल चीन का संगें लड़ाई भइल रहे. ओह घरी एगो गाना जन-जन के जबान पर रहे-
चीन तूं चीनी हो जइबऽ आके हिन्दुस्तनवा,
जवनवा हमरो घोरिके पीहें!

ओह समय पटना रेडियो पर 'लोहा सिंह 'के धूम मचल रहे. नाटक के हरेक एपिसोड में चीन पर व्यंगात्मक तरीका से जोरदार हमला होत रहे. फौजियन का बीचे ई नाटक खूब लोकप्रिय भइल रहे. बेरि -बेरि
चीनियन के ललकारे आ अपमानित करे. चीन के पेकिंग रेडियो टिप्पणी कइले रहे- ' जवाहर लाल नेहरू ने आकाशवाणी,पटना में लोहा सिंह नाम का एक भैंसा पाल रखा है, जो चीन की दीवार में सींग मारता रहता है.'

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लोहा सिंह मौजूदा दौर के 'सुपरमैन', 'शक्तिमान' नियर चरित-नायकने लेखा शोहरत के बुलंदी छूवेवाला अद्भुत चरित-नायक रहे. सउंसे उत्तर भारत में का गंवई, का शहरी, का बुतरू, का बूढ़-पुरनिया आ
का नवही - सभत्तर जवन चरित जन-जन के कंठहार बनिके राज करत रहे, ऊ रहे 'लोहा सिंह'.जवना तरी शरलॉक होम्स आ जेम्स बॉन्ड जइसन चरित्र अतना लोकप्रिय भइलन स कि उन्हनीं के लेखक के नांव पाठक भुला गइलन, ऊहे हाल लोहो सिंह का संगें भइल रहे. ओह विलक्षण नाट्य शृंखला के रचनाकार रामेश्वर सिंह काश्यप के असली नांव लोग भुला गइल आ ताजिनिगी ऊ लोहा सिंह का नांवें से मशहूर रहलन. इहां ले कि बिहार के रोहतास जिला के सासाराम शहर में जहवां उन्हुकर घर रहे, ओहू सड़क के नांव 'लोहा सिंह मार्ग' राखल गइल रहे.

देश-विदेश में धूम
हिन्दी, भोजपुरी आउर तमाम भारतीय भाषा में साइते कवनो चरित-नायक के 'लोहा सिंह ' जइसन शोहरत मिलल होई. सन् 1948 से लगातार पचास बरिस ले आकाशवाणी के मार्फत ऊ नाट्य शृंखला
ना खाली सउंसे देश में शोहरत के बुलंदी के छूवले रहे, बलुक लंदन काउंटी काउंटी काउंसिल, नेपाल, जोहांसबर्ग, मॉरिशस सरकारन के मांग पर भारत सरकार उहंवों ओकर कैसेट भेजववले रहे. रूरल ब्राडकास्टर नांव के अंतरराष्ट्रीय संस्थो एकरा शोहरत से एह कदर प्रभावित भइल रहे कि ऊ एह नाट्य शृंखला पर अभिभूत होके एगो लेख लिखले रहे-'अबाउट लोहा सिंह'.

सामाजिक चेतना जगावे के उतजोग
जवना घरी आकाशवाणी,पटना से लोहा सिंह के प्रसारण होत रहे, ओह समय में सड़क सूनसान हो जात रहली स. जेकरा लगे रेडियो रहत रहे, ओह दुआर पर लोगन के भीड़ ठकचि जात रहे. देश-विदेश में 'लोहा सिंह ' के जबरजस्त मांग का पाछा जबरजस्त कारनो रहे. ऊ रहे ओकर बेजोड़ कथावस्तु आ प्रस्तुति.
हास-परिहास आउर व्यंग-विनोद से लबरेज़ 'लोहा सिंह ' के कथानक अशिक्षा, बाल बियाह, बेमेल बियाह, छूआछूत, नशाखोरी जइसन तमाम सामाजिक बुराइयन आ रूढ़ियन के खिलाफ एगो अइसन बरियार ताना-बाना बिनत रहे कि सुननिहार अंतर्मंथन खातिर मज़बूर हो जात रहलन.
राष्ट्रीयता त ओमें कूटि-कूटिके भरल रहत रहे. सन् बासठ के लड़ाई से लवटल फौजी लोहा सिंह (खुद प्रोफेसर रामेश्वर सिंह काश्यप) जब अपना जोरू 'खदेरन को मदर' आउर अपना उपरोहित मीत 'फाटक बाबा' (पाठक बाबा) के काबुल के मोरचा के कहानी सुनावत रहलन, त श्रोता हंसत-हंसत लोटपोट हो जात रहलन. चाहे भारत का संगें चीन के लड़ाई होखे भा पाकिस्तान के-लोहा सिंह के हरेक एपिसोड कबो खून खउलावे लागत रहे, त कबो जोश-खरोश से भरि देत रहे.

कॉकटेल भाषा
'लोहा सिंह' नाट्य शृंखला के बाकी पात्र जहवां भोजपुरी बोलत रहलन, उहंवें नाटक के प्रधान चरित-नायक लोहा सिंह हिन्दी-अंगरेजी-भोजपुरी समेत अनगिनत भाषा आउर लोकभाषा से मिलल-जुलल काॅकटेल भाषा के इस्तेमाल करेवाला एगो रिटायर सेना-अधिकारी हवलदार रहलन. तथाकथित अभिजात वर्ग त नाटककार पर 'भ्रष्ट भाषा ' गढ़ेके आरोपो मढ़ि देले रहे. बाकिर एह सतमेझरा सवदगर पंचमेल खिचड़ी के जेही पूर्वाग्रहमुक्त होके चटखारा ले-लेके सवाद चीखल, ऊहे ओकर दीवाना हो गइल. गूंग के गुर-अस ओकर बयान-बखान ना कइल जा सकत रहे. एक हाली जब हम नाटककार से एकर राज जानल चहलीं, त उन्हुकर साफ-साफ कहनाम रहे-' लोहा सिंह के भाषा खिचड़ी बा. सेना के जवान जब छुट्टी में घरे आवेलन, भा शहर से जब अर्धशिक्षित मजूर घरे लवटेलन, त अइसने मिलावटी भाषा के इस्तेमाल करेलन. आजुओ अइसन भाषा बोलेवाला अकसर भेंटा जालन.' सांचहूं, नाटक में रोचकता आउर स्वाभाविकता ले आवे का गरज से 'लोहा सिंह' जइसन चरित्र गढ़ल गइल रहे.

नाटककार के शख्सियत
'लोहा सिंह ' के नाटककार चूंकि नाट्य शृंखला में लोहा सिंह के भूमिका खुदे अभिनीत करत रहलन, एह से आम लोग उन्हुका के उन्हुका मूल नांव का जगहा लोहे सिंह का रूप में जानत रहे. ऊ रहलन-बिहार के एगो छोट शहर सासाराम में एस पी जैन कालेज के प्राचार्य रहलन. सेवानिवृत्ति के बाद पटना में भोजपुरी अकादमी के अध्यक्षो रहलन. गोर रंग, चौड़ा मस्तक, लिलार पर लाल तिलक, ओठ प पान के लाली. नफासदपसंद शांत आ गम्हीर व्यक्तित्व. आडंबर-रहित सरलता आ शिष्टता के जियतार प्रतिमान. काश्यप जी के जनम सासाराम से पांच किलोमीटर उत्तर सेमरा गांव में 12 अगस्त, 1927 के पुलिस अफसर रायबहादुर जानकी सिंह आ राम सखी देवी के एकलउत पूत का रूप में भइल रहे. पढ़ाई-लिखाई मुंगेर,पटना आ इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में भइल रहे. सन् 1950 से पटना के बी एन कालेज में अठारह बरिस ले हिन्दी के प्राध्यापकी. ओकरा बाद 1968से शांति प्रसाद जैन कालेज, सासाराम में प्राचार्य के जवाबदेही सम्हारत 1989 में सेवानिवृत्ति.

तसलवा तोर कि मोर
'लोहा सिंह' के शुरुआतो के कहानी अजीबोगरीब बा. ओह घरी आकाशवाणी, पटना में सेवारत कथाकार राधाकृष्ण प्रसाद महानिदेशालय, दिल्ली के निर्देश पाके रामेश्वर सिंह काश्यप के हास-व्यंग से ओतप्रोत क्षेत्रीय भाषा में एगो नाट्य शृंखला लिखे के सलाह दिहलन आ सभसे पहिले 1948में 'तसलवा तोर कि मोर ' नाटक के प्रसारण भइल. बाकिर नाटक के नायक लोहा सिंह सुननिहारन में अतना लोकप्रिय भइल कि आगा से नाट्य शृंखला के नांवें 'लोहा सिंह' राखेके परि गइल. हालांकि एकरा पहिलहीं अपना विद्यार्थिए जीवन में काश्यप जी आकाशवाणी, पटना से प्रसारित 'चौपाल' कार्यक्रम में भोजपुरीभाषी प्रस्तोता 'तपेसर भाई' का रूप में शोहरत हासिल कऽ चुकल रहलन.

रामेश्वर सिंह काश्यप एगो कथाकार के तौर पर पढ़ते-लिखत खा डेग बढ़वले रहलन आ 'जब लहरें रो पड़ीं', 'स्वप्न और सत्य' जइसन उन्हुकर कहानी आचार्य नलिन विलोचन शर्मा आउर पं नंदकिशोर तिवारी नियर दिग्गज समालोचकन से सराहल गइल रहे. भोजपुरी कहानी 'मछरी', जवन स्त्री विमर्श पर केन्द्रित रहे, मील के पत्थल साबित हो चुकल रहे. कई गो यादगार निबंधो चरचा में रहलन स. महाप्राण निराला के जिनिगी से जुड़ल हिन्दी नाटक 'नीलकंठ निराला' (आगा चलिके 'अपराजेय निराला'), राष्ट्रीय अखंडता पर गीति-नाट्य 'समाधान' आ 'बेकारी का इलाज' खूब लोकप्रिय भइलन स. बाकिर सही माने में प्रचंड लोकप्रियता मिलल आकाशवाणी से प्रसारित अनगिनत नाट्य धारावाहिक 'लोहा सिंह ' से, जवन लगातार पचास बरिस ले आपन अमिट छाप छोड़ले रहे.

संजोग से कामयाबी ले
गम्हीर विषय से एकाएक काश्यप जी कइसे हास-व्यंग का ओरि मुड़ि गइनीं? जब हम पूछले रहलीं, त उहां के जवाब में ओठ के मुसुकी घुलि-मिलि गइल रहे- ' एकरो के महज संजोगे कहि सकेनीं. ठीक ओइसहीं, जइसे विज्ञान के कई गो आविष्कार संजोगे मात्र से हो गइल रहे.' कइसन रहे ऊ सुखद संजोग, जब काश्यप जी अपना बाबूजी के नोकर के एगो रिश्तेदार सैनिक से मिलला का बाद 'लोहा सिंह' जइसन चरित्र के कल्पना कइले रहनीं आ मीत-शुभचिंतकन के सराहना आ आशातीत सफलता पाके साहित्य के अउर विधन से मुंह मोड़ि लेले रहनीं. शोहरत के बुलंदी के एहसास उहां के तब भइल रहे, जब प्रयागराज के खुलल मंच प जांबाज सैनिकन का सोझा 'लोहा सिंह ' के मंचन भइल रहे. फेरु त देशे में ना, विदेशो में एकर मंचन कामयाबी के झंडा गाड़त चलि गइल रहे.

मान-सम्मान
लोहा सिंह सिरिफ चुटीला हास-व्यंग पैदा करेवाला नायक ना रहे, बलुक ऊ ग्रामीण जनता के सच्चा प्रतिनिधियो रहे. नाटककार एक ओरि जहवां सामाजिक कुरीतियन, अंधबिसवास आउर दकियानूसी मान्यता प 'लोहा सिंह ' के मार्फत खुलिके चोट कइले रहे, उहंवें दोसरा ओरि युद्ध के विभीषिका, सामाजिक, सांस्कृतिक, सियासी आउर आर्थिक मुद्दन के जरि में पइसिके समाधान देबेके दिसाईं सकारात्मक पहलो कइले रहे. लोहा सिंह अइसन चरित नायक बा, जवन दीढ़ संकलप के धनी बा-ठीक लोहा नियर. दोसरा तरफ ऊ जन-जन के दुख-दरद के सांचो के हमदरद बा-पिघिलत मोम मतिन.
उहां हास के चटक हंसी बा,त व्यंग के चुभन आ पैनापनो बा. लोहा सिंह का साथे उन्हुकर मेहरारू 'खदेरन को मदर ' बाड़ी, बेटा खदेरन बाड़न आ संगें-संगें उपरोहित फाटक बाबा बाड़न, जिन्हिका मधुर बानी में हर एपिसोड के समापन लोहा सिंह के तारीफ में होत बा- ' जजमान, को नहिं जानत है जग में. .' 'लोहा सिंह ' के नाटककार के भारत सरकार पद्मश्री के अलंकरण देले रहे.

बिहार सरकार से 'बिहार रत्न' आ अखिल भारतीय भोजपुरी परिषद से 'भोजपुरी रत्न' के मानो-सम्मान मिलल रहे. बाकिर ऊ जनता के बीचे भेंटाइल शोहरते के सभसे बड़ सम्मान मानत रहलन. 24अक्तूबर, 1992 के पटना के तत्कालीन आवास में अचानक काश्यप जी के पेट में दरद उठल आ देखते-देखत उहां के हमनीं का बीच से उठि गइनीं. बाकिर अक्षर पुरुष के साइते कबो छरन होला. आजुओ अइसन लागेला, जइसे ऊ अपना 'खदेरन को मदर ' से उलाहना भरल सुर में कहत होखसु-' जेठ के चिलचिलात दुपहरिया में अंगारे-से दहकते-लहकते पत्थल पर बैठके आइसक्रीम खाने में ही तो वैवाहिक जिनिगी का मजा है!' आ तुरुंते 'खदेरन को मदर ' के तकियाकलाम गूंजत बा-' अरे मारु बढ़नी रे!'

( लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं.)
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