Bhojpuri: राजा राम मोहन राय जे ताजिनिगी नारी के हक खातिर लड़ल

महिला उत्थान के लिए राजा राम मोहन राय ताउम्र काम करते रहे.

महिला उत्थान के लिए राजा राम मोहन राय ताउम्र काम करते रहे.

राजा राम मोहन राय के शुरुआती पढ़ाई त गांवें में पूरा भइल रहे, बाकिर आगा के पढ़ाई खातिर ऊ पटना आ गइल रहलन. अबला नारी प कई किसिम के अतियाचार ऊ अपना आंखी देखलन-महसूसल आ ओह दिसाईं ठोस काम करेके मने-मन निरनय ले लिहलन.

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मई महीना के बाइस तारीख के जब राजा राम मोहन राय के जयंती मनावल जात रहे, त पटना में उहां के इयाद में बनल राजा राम मोहन राय सेमिनरी के चरचा आइल आ एहू बात के खुलासा जियतार ढंग से भइल कि राजा जी के खास तौर से पढ़ाई-लिखाई पटने में पूरा भइल रहे आ उहांके कई भाषा के गहिर ज्ञान हासिल कइले रहनीं. ओइसे त उहांके महज एकसठ साल के उमिर पवले रहनीं आ तकरीबन दू सइ बरिस पहिलहीं एह असार संसार से नाता तूरिके अनंत में विलीन हो गइल रहनीं,बाकिर ओही घरी उहांके आधुनिक भारत के निरमान के मजबूत नेंव राखि देले रहनीं आ एही राजा राम मोहन राय के भारतीय पुनर्जागरन के जनमदाता मानल जाला. अबला नारी के दयनीय हालत के उहांके आत्मसात कऽ लेले रहनीं आ एही से स्त्री के बुनियादी हक खातिर ना खाली जुझनीं,बलुक ब्रिटिश हुकूमत से कानूनो बनववनीं.

राजा राम मोहन राय के जनम पच्छिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिला के एगो गांव राधानगर में भइल रहे. रूढ़िवादी ब्राह्मण परिवार में पैदा होके सामाजिक कुरीतियन आउर अंधबिसवास के खुलल आंखि से देखे के मोका मिलल. बाबूजी रामकांत राय वैष्णव कर्मकांडी ब्राह्मण रहलन आ मूर्तिपूजा में उन्हुकर गहिर आस्था-बिसवास रहे. बाइस मई, 1772 के जनमल राजा राम मोहन राय के शुरुआती पढ़ाई त गांवें में पूरा भइल रहे, बाकिर आगा के पढ़ाई खातिर ऊ पटना आ गइल रहलन. अबला नारी प कई किसिम के अतियाचार ऊ अपना आंखी देखलन-महसूसल आ ओह दिसाईं ठोस काम करेके मने-मन निरनय ले लिहलन. इहवां राजाजी के तिसरकी आंख खुलि गइल आ हिन्दी का संगें बांग्ला, संस्कृत,अरबी आउर पारसी भाषा-साहित्य के गहिर-गझिन अध्ययन कऽके उहांके अध्येता बनि गइनीं. वेद आ उपनिषद के खूब गहिराई में डूबिके ज्ञान हासिल कइनीं. फेरु त उहांके जिनिगी के निरर्थकता के भान भइल रहे आ हिमालय आउर तिब्बत के जातरा पर उहांके निकलि गइल रहनीं.

हिमालय-तिब्बत के जातरा से वापिस अइला प बाबूजी रामकांत राय वैष्णव के लागल कि बेटा हाथ से निकलल जात होखे. ऊ फटाफट बिना देरी कइले बियाह करा दिहलन. राम मोहन राय के धियान त रहे समाज में फइलल-पसरल रीति-रेवाज आ पुरुष प्रधान बेवस्था के असंगति-विसंगति पर. उहांके पहिल किताब लिखनीं-'तुहपत अल-मुवाहिद्दीन',जवना में धरम के अहमियत आ हिमायत त कइल गइल रहे,बाकिर कठमुल्लापन, कुरीति आउर अंधबिसवास के खुलिके खिलाफत सभकर धियान खिंचलस. ओमें अनुष्ठान, करमकांड आ मूरत पूजे के विरोधो रहे,जवन रामकांत राय (बंगाली लोगन में रामकंटो रॉय) के ना रुचल. आखिरकार 1803 में बाबूजी बैकुंठधाम चलि गइल रहलन.

राम मोहन राय जी एगो नया आध्यात्मिक 'एकेश्वरवाद' के जनम देले रहनीं. जब ईश्वर एक ही बाड़न,फेरु अतना मजहबी टंटा आ रूढ़िवादिता काहें खातिर?
ओह घरी समाज में औरत के हाल बेहाल रहे. सतीप्रथा के बोलबाला रहे, जवना के कारन मरद के मुअला प बेवा मेहरारू के जियते चिता पर सुता दिआत रहे. चूंकि बालबियाह के रेवाज रहे,एसे कमसिन लरिकी कवनो अधेड़ उमिर के मरद भा बूढ़ से बियहा जात रहे आ किछुए साल में मरद के मुअला प ऊहो जान गंवावे खातिर अलचार हो जात रहे. मरद त कइयो गो शादी रचा सकत रहे,बाकिर विधवा के बियाह करेके इजाजत ना रहे. एह सभके मूल में रहे स्त्री-शिक्षा के अभाव. आगा चलिके भीमराव अंबेडकर एह बात के रेघरिअवले रहलन कि कवनो समाज के बढ़ंती-विकास के कसउटी होला ओह समाज के स्त्री के स्थिति. महात्मा गांधी, अंबेडकर के प्रेरनास्रोत राजा राम मोहने राय रहनीं.

राम मोहन राय जी 1814 में एगो संस्था 'आत्मीय सभा' के गठन कइनीं आ सामाजिक चेतना जगावे के अभियान आरम्भ कऽ दिहनीं. उहांके सउंसे देश में घूमि-घूमिके एह तथ पर असरदार ढंग से रोशनी डलनीं कि वेद में भा उपनिषद में कतहीं नारी खातिर सतीप्रथा के कतहीं कवनो जिकिर नइखे. उहांके साफ-साफ कहनाम रहे कि मेहरारू के मरद के संगें सती होखे के खिलाफ कानून बने के चाहीं.

उहांके लरिकिन के पढ़ाई पर जोर दिहनीं,बहुबियाह प रोक लगावे के अभियान चलवनीं आ समाज के समुझवनीं कि स्त्री के सम्पत्ति पर मालिकाना हक मिले के चाहीं. मुर्शिदाबाद में उहांके ईस्ट इंडिया कम्पनी के राजस्व महकमा में नोकरी कइनीं. उहांके गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बैटिंग से सतीप्रथा के खिलाफ कानून बनववनीं आ एह अभिशाप से नारी के मुकुती दियवावे में इतिहास रचेवाली भूमिका अदा कइनीं.सन् 1828में उहांके 'ब्रह्म समाज' के स्थापना कइले रहनीं, जवना के शाखा देश-विदेश में फइलल-पसरल रहे.



हालांकि लगभग एकसठ साल के उमिर में 27 सितम्बर, 1833 का दिने ब्रिस्टन के नजदीके स्टाप्लेटन में राजा राम मोहन राय के दैहिक काया अनंत में विलीन हो गइल रहे, बाकिर आधुनिक भारत के ओह दृष्टिसम्पन्न निर्माता के ई देश कबो ना भुला सके.आजु जवन नारी-सशक्तीकरण के बात हो रहल बा,ऊ उहेंके देन हऽ. आजीवन उहांके नारीशिक्षा पर जोर दिहनीं. सन् 1822 में उहांके 'अधिकारी स्कूल ' के शुरुआत कइले रहनीं. उहांके दिली मंशा रहे कि नवकी पीढ़ी के भारतीय संस्कृति के शिक्षा अनिवार्य रूप से दिहल जाउँ,बाकिर एकरा संगे-संगे अंगरेजी,विज्ञान, तकनीकी प्रौद्योगिकी आ पच्छिमी चिकित्सा पद्धति के उच्च स्तर पर पढ़ाई आउर अनुसंधानो के निहायत जरूरत बा. दू सइ साल पहिले राजा राम मोहन राय सुचिंतित ढंग से आधुनिक भारत के निरमान के मजबूत नेंव रखले रहनीं, ओही प आजु आलीशान महल खाड़ बा. बाकिर जब ले स्त्री के अधिकार से जुड़ल राजा जी के तमाम सपनन के अमली जामा नइखे पहिरावल जात,तब ले ओह दूरद्रष्टा के आत्मा के चिरशांति ना मिली. (लेखक भगवती प्रसाद द्विवेदी वरिष्ठ साहित्यकार हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)

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