Bhojpuri: बनारस के मनिकनिका घाट से निकलल रहल लोहिया क समाजवाद, पढ़ीं

डॉ. राम मनोहर लोहिया देश में समाजवाद क एक सूत्रधार रहलन. लेकिन ओनके समाजवाद क सूत्र बनारस के मनिकनिका घाटे से मिलल रहल, इ बात कम लोगन के पता हौ.

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  • Last Updated: March 23, 2021, 4:30 PM IST
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डॉ. राम मनोहर लोहिया देश में समाजवाद क एक सूत्रधार रहलन. लेकिन ओनके समाजवाद क सूत्र बनारस के मनिकनिका घाटे से मिलल रहल, इ बात कम लोगन के पता हौ. अब कहबा कि मनिकनिका घाटे से कइसे समाजवाद निकली भाई. त एकर जवाब इ हौ कि मनिकनिका भगवान शिव ठीहा हौ अउर शिव से बड़ा समाजवादी केव नाहीं हौ. मनिकनिका पर आइ के सब बराबर होइ जाला, शिव होइ जाला. शिव मतलब सत्य अउर शून्य. केव केतनौ बड़ा होय, छोटा होय, अमीर होय, गरीब होय, मनिकनिका सबके आईना देखावयला. लोहिया भी जब मनिकनिका पहुंचलन तब ओन्हय भी इहां जिनगी क सत्य देखायल. मन क कुल गांठ जरि गयल, द्वैत अद्वैत में बदलि गयल. अउर लोहिया समाजवाद क आला औघड़ बनि गइलन.

डॉ. लोहिया के भीतर अजादी अउर देश प्रेम क भावना संस्कार में मिलल रहल. पिता हीरालाल कांग्रेस क बड़ा नेता रहलन, महात्मा गांधी से नजदीकी रहल. पिता के साथ ही महात्मा गांधी से ओनकर भेट भइल. गांधी क ओनके ऊपर एतना असर रहल कि जब उ देश के विद्यार्थीन से स्कूल-कॉलेज छोड़य क आह्वान कइलन तब लोहिया 10 साल के उमर में ही स्कूल छोड़ि देहललन. ओह समय उ बंबई के मारवाड़ी स्कूल में पढ़ाई करत रहलन. डाॅ. लोहिया पिता के साथ आठ साल के उमर में ही 1918 में पहिली बार कांग्रेस के अहमदाबाद अधिवेशन में शामिल भइलन. विदेशी समानन क बहिष्कार कइले के नाते हीरालाल के जब सजा होइ गयल तब मात्र 14 साल के उमर में डाॅ. लोहिया 1924 में कांग्रेस के गया अधिवेशन में अपने पिता के प्रतिनिधि के रूप में हिस्सा लेहले रहलन.

आंदोलन, अधिवेशन अउर देशभक्ति क पाठ लोहिया के बचपन से बराबर मिलत रहल. लेकिन जीवन क असली पाठ ओन्हय तब मिलल जब उ 1925 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में 11वीं में नाम लिखउलन अउर दुइ साल बनारस में रहि के इंटर क पढ़ाई कइलन. बनारस में ओन्हय देश क संस्कृति अउर धर्म के बारे में पढ़य, जानय, समझय क मौका मिलल. बनारस क गली अउर गंगा ओनकर सबसे प्रिय स्थान बनि गयल. जब भी समय मिलय गंगा किनारे पहुंचि जायं. एक बार लोहिया मनिकनिका घाटे पहुंचलन. घाटे पर कई ठे चिता जरत देखि के मन में अइसन बैैराग पैदा भयल कि इ आजीवन ओनकर सबसे बड़ी पूंजी बनि गयल. लोहिया आजीवन अपुना बदे कुछ नाहीं जुटउलन. तन क कपड़ा छोड़ ओनके पास कुछ नाहीं रहल. पूरा जीवन, सोच समाज के समर्पित कइ देहलन. गैरबराबरी मिटावय क लड़ाई ओनकर असली राजनीति रहल. लोहिया के ही प्रेरणा से राजनारायण विश्वनाथ मंदिर में दलित प्रवेश क आंदोलन चलउलन अउर अंत में बाबा क दरवाजा दलितन बदे खुलि गयल.

लोहिया क जनम उत्तर प्रदेश में फैजाबाद जिला के अकबरपुर कस्बा में 23 मार्च, 1910 के भयल रहल. ढाई साल के उमर में ही माई चंदादेवी क निधन होइ गयल. ओनकर पालन-पोषण दादी कइलिन. पिता क साथ जादा मिलय क इ एक बड़ा कारण रहल. हीरालाल अक्सर राममनोहर के अपने संगे लेइके जायं. सभा, गोष्ठी, सम्मेलन अउर आंदोलन से परिचय एही के नाते बचपन में ही होइ गयल.
लोहिया पूरा देश अउर दुनिया घूमलन, लेकिन जेतना लगाव ओनकर बनारस से भयल ओतना दूसरे जगह से नाहीं. भारतीय राजनीति में डॉ. लोहिया एक मात्र अइसन नेता भइलन, जेकरे पास आजीवन एक घर तक नाहीं रहल. लेकिन बनारस से ओन्हय एतना प्रेम रहल कि उ बनारस में अपने हाथे से ’समता घर’ क नींव रखलन. ’समता घर’ समाजवादी लोगन क ठिकाना रहल. समाजवादी लोग इहां आइ के ठहरय, बइठक-चर्चा करय, समाजवादी आंदोलन क योजना बनावय. लहुराबीर के पास जगतगंज महल्ला में इ ’समता घर’ आज भी मौजूद हौ. लेकिन अब ओकर भूमिका बदलि गइल हौ. ’समता घर’ समाजवादी अड्डा नाहीं रहि गयल, बल्कि निजी संपत्ति बनि गयल हौ. लोहिया के निधन अउर समाजवादी आंदोलन के ठंडा पड़ले के बाद एक लंबे समय तक ’समता घर’ सूना पड़ल रहल. ’समता घर’ के एक ट्रस्टी क परिवार कब्जा कइ लेहलस. जनता पार्टी के विघटन के बाद राजनारायण जब दुबारा सोशलिस्ट पार्टी बनउलन तब ओन्हय फिर से ’समता घर’ क सुध आइल. उ एकरे एक हिस्सा से कब्जा खाली कराइ के ओही में सोशलिस्ट पार्टी क कार्यालय खोललन. लेकिन ओनके मरले के बाद सोशलिस्ट पार्टी भी खतम होइ गइल अउर ’समता घर’ पर फिर से पूरी तरह कब्जा होइ गयल.

डॉ. लोहिया के भीतर हिंदी के प्रति सम्मान भी बनारस में ही जागल रहल. बाद में उ सरकारी कामकाज में हिंदी ही नाहीं बाकी भारतीय भाषा के भी इस्तेमाल क वकालत कइलन. ओनकर कहना रहल कि भारतीय भाषा के सरकारी कामकाज अउर अध्ययन क अधार बनउले बिना भारत के लोगन क मानसिक गुलामी खतम न होइ पाई. लोहिया के भीतर इतिहास से लगाव भी बनारस में ही पैदा भयल रहल.

डॉ. लोहिया के बनारस से एतना लगाव होइ गयल कि इहां उ आपन कर्मस्थली बनावय क निश्चय कइलन. बनारस के चंदौली संसदीय सीट से 1957 में सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़लन. लोहिया क स्थिति काफी मजबूत रहल. चुनाव क हवा ओनके पक्ष में रहल. लेकिन लोहिया के हरावय बदे जवाहरलाल नेहरू आपन पूरी ताकत झोंकि देहलन. अंत में त्रिभुवन नारायण सिंह के सामने लोहिया कम वोट से चुनाव हारि गइलन. चुनाव हरले के बाद लोहिया कहले रहलन -हम केहूं के का देइ सकीला. हमरे पास न जात हौ, न धर्म अउर न संपत्ति. हम एतना ही कहि सकीला कि देश क गरीब अउर आम आदमी हमय आपन समझय.



डाॅ. लोहिया पं. जवाहरलाल नेहरू क बहुत सम्मान करय. नेहरू भी लोहिया क बहुत आदर करय. लोहिया के प्रतिभा क नेहरू मुरीद रहलन. नेहरू जब कांग्रेस क अध्यक्ष बनलन तब लोहिया के महासचिव बनउलन. नेहरू से लोहिया क पहिली मुलाकात 1921 में फैजाबाद किसान आंदोलन के समय भयल रहल. लेकिन नेहरू के प्रति प्रेम बनारस में पैदा भयल. लोहिया अपने दोस्तन के संगे नेहरू के कामकाज अउर सोच पर अक्सर चर्चा करय. धीरे-धीरे नेहरू के तरफ ओनकर आकर्षण बढ़य लगल. लेकिन आगे चलि के नेहरू से ओनकर वैचारिक मतभेद पैदा होइ गयल अउर लोहिया नेहरू क कटु आलोचक बनि गइलन. इहां तक कि 1942 में कांग्रेस के इलाहाबाद अधिवेशन में उ नेहरू क जमि के विरोध कइलन अउर ओकरे बाद अल्मोड़ा जिला कांग्रेस के सम्मेलन में उ नेहरू के ’झट से पलटि जाए वाला नट’ तक कहि देहलन. नेहरू से मतभेद एतना गहिरायल कि 30 जनवरी, 1948 के गांधी क हत्या के बाद जब मार्च 1948 में कांग्रेस क नासिक में अधिवेशन भयल, तब लोहिया उहां कांग्रेस से अलग होवय क निश्चय कइ लेहलन, अउर सोशलिस्ट पार्टी क गठन कइलन.

लोहिया के बारे में एक खास बात इ भी रहल कि महात्मा गांधी की ही तरह उ भी कभी आपन जनमदिन नाहीं मनउलन. हलांकि ओनके मरले के बाद ओनकर अनुयायी लोग आज ओनकर जनमदिन मनावयलन. जनमदिन न मनावय क दुइ कारण रहल. एक कारण इ कि ढाई साल के उमर में ही माई चंदादेवी क निधन होइ गयल रहल. पिता हीरालाल हमेशा अजादी के आंदोलन में व्यस्त रहय. फिर जनमदिन के मनावय. देश के अजादी मिलय तक जनमदिन मनावय क कवनो माहौल ही नाहीं रहल. अजादी के बाद भी लोहिया कभी जनमदिन नाहीं मनउलन. एकर बड़ी वजह इ रहल कि एही दिना 23 मार्च, 1931 के क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी भगत सिंह, राजगुरु अउर सुखदेव के फांसी देहल गइल रहल. डाॅ. लोहिया भगत सिंह क बहुत आदर करय. अपने से खाली तीन साल बड़ा भगत सिंह के शहीदी दिवस पर आपन जनमदिन मनाइब उ हरगिज सही नाहीं समझलन. (डिस्क्लेमर- लेखक सरोज कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
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