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B'day Special: रामधारी सिंह दिनकर के ह जन्मदिन, उ रहले ह जगतशिक्षक

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हिंदी साहित्य के बड़ कवि अउर साहित्यकार रामधारी सिंह 'दिनकर' के आज जन्मदिन ह. उनकर जन्म आजु के दिन 1908 में भईल रहे. उनकर जन्म बिहार के बेगुसराय जिले एगो छोट गांव सिमरिया में भईल रहे. एह मौका पर हमनी के रउआ लोगन के उनकर जीवन के बारे में बतावल जाता, उहो भोजपुरी में. जानीं.

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रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ‘ (23 सितंबर1908- 24 अप्रैल 1974) के राष्ट्रकवि के दर्जा अइसहीं ना मिलल रहल ह। उनुकर हर रचना पाठक के कुछ सिखा आ बता के दिल में उतरि जाले। महाभारत पर आधारित उनुकर रचना “कुरुक्षेत्र” विश्व भर के श्रेष्ठ 100 सर्वश्रेष्ठ काव्य में महत्वपूर्ण स्थान पवले बिया। पद्म विभूषण दिनकर जी के पदवी जगद्शिक्षक के भी रहे के चाहीं। राष्ट्रकवि अंग्रेजी, संस्कृत, बांग्ला आ उर्दू के अच्छा जानकार रहले। सन 1952 में हमनी के देश के पहिला संसद बनल त उनुका के राज्यसभा सदस्य बनावल गइल। करीब 12 साल ले ऊ राज्यसभा के सदस्य रहले। देश के पहिला प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू उनुका के राज्यसभा में ले अइले बाकिर कौनो गड़बड़ी देखसु त दिनकर जी नेहरू के कटु आलोचना क देसु। एतना कटु कि सुनिके नेहरू जी तिलमिला जासु।

नेहरू जी के खिलाफ कविता पाठ कइले बाकिर जब उनुका ठीक लागल त नेहरू जी के प्रशंसा भी कइले। लेखन में कइसन संतुलन रहे के चाहीं, ई दिनकर जी से बता गइल बाड़े। ऊ हमनी के सिखा गइल बाड़े कि पद का लोभ में गलत के साथ मत दीं। सच बोलीं आ ओकरा पर दृढ़ रहीं। बेगूसराय (बिहार) के सिमरिया गांव में उनुकर जनम भइल। पटना विश्वविद्यालय से बी.ए. कइले आ एगो स्कूल में अध्यापक हो गइले। ओकरा बाद सन 1934 से 1947 ले बिहार सरकार के सब रजिस्ट्रार आ प्रचार विभाग के उपनिदेशक, बिहार विश्वविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष, भागलपुर विश्वविद्यालय के उपकुलपति, कुलपति, भारत सरकार के हिंदी सलाहकार, साहित्य अकादमी पुरस्कार (“संस्कृति के चार अध्याय” खातिर) आ ज्ञानपीठ पुरस्कार (“उर्वशी” खातिर), राज्यसभा सदस्य….. लिखे लगला पर उनुकर उपलब्धि से कई गो पन्ना भरि जाई।

दिनकर जी सौम्य आ मृदुभाषी रहले। उनुका में अहंकार रहबे ना कइल। एतना चुंबकीय व्यक्तित्व रहे कि जे उनुका से भेंट करे जाउ, ऊ जाए के नांवे ना ले। बाकिर “उर्वशी” के छोड़ि दीं त उनुकर मये रचना वीररस से भरल बाड़ी सन। “उर्वशी” श्रृंगार रस के रचना ह। कई लोग “रश्मिरथी” आ “परशुराम की प्रतीक्षा” के श्रेष्ठतम रचना मानेला बाकिर ईहो माने वाला कम नइखन कि उनुकर हर रचना श्रेष्ठतम बिया। “प्रणभंग” (सन 1929) से जौन उनुकर काव्य यात्रा शुरु भइल ऊ गति पकड़त गइल। कुछ लोग कहेला कि “प्रणभंग” से साल भर पहिले उनुकर रचना “बारदोली- विजय संदेश” छप चुकल रहे। आ सम्मान के बात कहीं त उनुका के एतना सम्मान आ पुरस्कार मिलल बा कि गिनत- गिनत थाकि जाइब जा। “विद्या वाचस्पति” से लेके “साहित्य चूड़ामणि” आ डाक्ट्रेट के मानद उपाधि तक अनगिनत सम्मान मिलल उनुका के। ईहो तथ्य रोचक बा कि‘दिनकर’ जी कौनो भी पुरस्कार से ऊपर रहले ह। ऊ जेकरा से भेंट क लिहें ऊहे पुरस्कृत नियर महसूस करे लागत रहल ह। सबसे बड़ बात ई कि दिनकर’ जी हर साहित्य प्रेमी के हृदय सम्राट रहिहें।

रामधारी सिंह दिनकर’ के रचना में वीरता त बड़ले बा, विद्रोह आ क्रांति के ओज भी बा। ऊ सशक्त आशावादी कवि रहले ह। जे निराश रही, ऊहो उनुकर रचना पढ़ि के जीवन के अलग एंगिल से देखे लागी। उनुकर लिखल कुछ पंक्ति पढ़ीं-

सच है, विपत्ति जब आती है, कायर को ही दहलाती है,
शूरमा नहीं विचलित होते, क्षण एक नहीं धीरज खोते,
विघ्नों को गले लगाते हैं, कांटों में राह बनाते हैं।
मुख से न कभी उफ कहते हैं, संकट का चरण न गहते हैं,
जो आ पड़ता सब सहते हैं, उद्योग-निरत नित रहते हैं,
शूलों का मूल नसाने को, बढ़ खुद विपत्ति पर छाने को।….
एगो अउरी उनकर बहुते प्रसिद्ध रचना बा। ओकर चर्चा ना कइल जाउ त उनुका प्रति श्रद्धा स्मरण पू सदियों की ठंडी-बुझी राख सुगबुगा उठी,
मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है ।

त कहल जा सकेला कि ‘दिनकर’ जी हमनी के हिंदी साहित्य के विरल कवि रहले ह। उनुकर रचना पढ़ते थाकल, पछताइल, हारल मानसिकता वाला में जबर्दस्त जोश आ जाई। उनुका के राष्ट्रकवि के अलावा जनकवि भी कहल जाला। बिना कौनो लाग- लपेट के सीधे चोट करे वाला कवि रहले ह दिनकर जी। उनुकर एगो कविता देखीं- “जीना है तो मरने से डरो नहीं”-
वैराग्य छोड़ बांहों की विभा संभालो
चट्टानों की छाती से दूध निकालो
है रुकी जहां भी धार, शिलाएं तोड़ो
पीयूष चंद्रमाओं का पकड़ निचोड़ो….।
आ एगो हइहो रचना देखीं-
कुंकुम? लेपूं किसे? सुनाऊं किसको कोमल गान?
तड़प रहा आंखों के आगे भूखा हिंदुस्तान…..

आ ‘दिनकर’ जी खाली कविते ना लिखले एक से एक ओजस्वी गद्य भी लिखले। प्रसिद्ध साहित्यकार हजारी प्रसाद द्विवेदी कहले बाड़े कि ‘दिनकर’ जी अहिंदीभाषी लोगन के बीच कौनो कवि से बहुत ज्यादा लोकप्रिय बाड़े। हरिवंश राय बच्चन कहले कि ‘दिनकर’ जी के एकही ना बल्कि गद्य, पद्य, भाषा आ साहित्य सेवा खातिर अलग- अलग ज्ञानपीठ पुरस्कार देबे के चाहीं। रामवृक्ष बेनीपुरी कहले कि ‘दिनकर’ जी देश में क्रांतिकारी आंदोलन के स्वर देले बाड़े। नामवर सिंह कहले बाड़े कि ‘दिनकर’ जी सचहूं के सूर्य बाड़े। राजेंद्र यादव त स्वीकार कइले कि ‘दिनकर’ जी के रचना उनुका लिखे के प्रेरणा दिहलस। काशीनाथ सिंह कहले बाड़े कि ‘दिनकर’ जी राष्ट्रवादी आ साम्राज्य- विरोधी कवि रहले ह।

रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का बारे में जतना लिखाई, कमे बा। उनुकर व्यक्तित्व आ कृतित्व अइसन रहल ह कि रउरा उनुकर कतनो प्रशंसा लिखीं, लागी कि अधूरा रहि गइल। भारत जब चीन से हारल त ऊ जवाहरलाल नेहरू पर करारा प्रहार कइले। कहल जाला कि “परशुराम की प्रतीक्षा” कविता संग्रह में ‘दिनकर’ जी जवाहरलाल नेहरू पर निशाना सधले बाड़े।

ईहो सुखद बा कि सन 1999 में भारत सरकार उनुका सम्मान में डाक टिकट जारी कइलस।‘दिनकर’ जी आह भरे वाला कवि ना रहले ह। जे आह भरत रही, ओकरा के ऊ पसंदो ना करत रहले ह। उनुकर सरोकार मनुष्य के दुख- दर्द से रहल ह। अइसन कवि जेकरा के देश के जनता हमेशा ऊंचा आसन पर बइठवले रही। ‘दिनकर’ जी कौनो धड़ा भा खेमा से दूर रहत रहले ह। स्वतंत्र रहिके ही ऊ एतना उच्च कोटि के रचना लिख सकत रहले ह। आपन व्यक्तिगत लाभ- हानि के किनारे राखिके ऊ देश आ समाज के लाभ- हानि के चिंता करत रहले ह।

उठने दे हुंकार हृदय से, जैसे वह उठना चाहे;किसका कहां वक्ष फटता है, तू इसकी परवाह न कर।

आज अइसन साहित्यकार दुर्लभ बा लोग।

(विनय बिहारी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं. लेख में लिखे विचार उनके निजी है.)

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