भोजपुरी में पढ़ें: खतम होत भोजपुरी सबदन पर धेयान देबे के होई

लोक में बदलाव आइल बा. संगे संगे बहुत सबद भी भुलात जात बाने स. कभी लोक जीवन के हिस्सा रहल इ सब के भोजपुरी में खूब इस्तमाल होत रहल हा. अइसने भुलात आ गायब होत सबदन के याद करत हवे लेखक

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 24, 2020, 7:01 PM IST
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लूंणा, कूंची, पनरोह, दुअंछिया केकरा-केकरा यादि बा. बहुते लोग त चकरा गइल होई एह सबदन के पढ़ि-सुनि के. .हिंदी के सबदन के लोपइला के चर्चा अब होखे लागल बा. टेलीविजन आ सोसल मीडिया के जमाना में एह पर विचार होखहिं के चाहीं. ओइसे मानल जाता कि टेलीविजन आ सोसल मीडिया हिंदी के कतने सबदन के चलन से बहरिया देले बा. आ लोग ओकनि के गते-गते भुलात चलल जाता. बाकिर केहू के एह पर धेयान नइखे कि भोजपुरियो के कतना सबद पहिले चलन से दूरि भइले स. आ बाद में ऊ लोपा गइले स. अगर अइसहीं चलत रही त एगो दिन अइसन आई कि भोजपुरी समाज के स्मृति से ढेरहन सबद अइसन गायेब हो जइहें कि फेरू उनुका के यादि करे वाला आ समझे वाला ना रही. एकर एगो वजह ई बा कि भोजपुरी अभियो लेखन के ओइसन भासा नइखे बनि पाइल. जइसन हिंदी आ दोसर भासा बाड़ीन स. लिखइला में जवन भासा रहेले. ओकरा में आपाना समय- जमाना के सबद दर्ज होत रहेले स. आ आवे वाला पीढ़ी खातिर सुरक्षित रहि जाले स.

पहिले ऊ लोग जानि लेउ कि लूंणा का होत रहल हा. पहिले घरे-घरे बरतन राखि से मांजात रहले हा स. घर के मेहरारू लोगन के जिम्मे ई काम रहत रहल हा. त ऊ लोग पनरोह के एगो किनारा बइठि के राखि से जूठ आ गांदा बरतन धोवत रहल हा लोग. रखिया के लगावे खातिर खर्ह-पतवार के मोड़ि के ओकरा के पानी में भेंइ के राखि मिला के बरतन पर रगड़ाई होई आ एह तरी बरतन मांजात रहले हा स. पनरोह ओकरा के कहल जात रहल हा. जाहां इनार-कुआं से पानी ले आके बड़-बड़ बरतन गागारा, बाल्टी, घइलि आदि में धरात रहल हा. ऊहवें घर के कनिया-पतोहि, मेहरारू-लइकि लोग नहात रहल हा लोग आ जरूरत पर बरतन मांजत रहल हा लोग. पनरोह माने जाहां से घर के बहरी पानी के बहि जाए खातिर राहि रहल हा. अब पनरोह रहल ना. घर-घर कल-आ बोरिंग हो गइल बा. त नहाए-बरतन धोवे के जगहि बदलि गइल बा. एही तरही बरतन धोवे खातिर अब किसिम-किसिम के साबुन, लिक्विड आ पाउडर आ गइल बा. आ स्कॉच ब्राइट माने बनावटी लूंणा से बरतन धोआता. जब चलने ना रही त लूंणा केकरा यादि रही आ के यादि करि पनरोह.

पहिले ज्यादेतर घर के फर्श काच्चा रहत रहला हा. ओकर के बाहारि के साफ कइल जात रहल हा. ओकरा खातिर मूंजि, लमहर घासि, तरकुल भा खजूर के पतई फारि के ओकर झोंझ बना के बान्हि लियात रहल हा. कबो-कबो जियकिया लोग बना के ले अइहें आ बेचत रहले हा. ओहि से घर-फर्श बहरात रहल हा. ओहि के कूंची काहात रहल हा. अब गांवों में घर के फर्श पाक्का हो गइल बा. आ ओकरे झारे-बहारे खातिर अब बाजार से सींक के झाड़ू खरीदाए लागल बा. त लोग कूंची भुला गइले.



अब बात दुअंछिया के. पहिले माटी के चूल्हा बनावल जात रहल हा. ओह में लकड़ी जरा के खाना पकावल जात रहल हा. तब एकअंछिया, दुअंछिया, तीनिअंछिया चूल्हा बनत रहला. जवना में आगि के लपट एगो, दूगो आ तीनि को निकलत रहल हा. जब कई किसिम के आ ढेर खाना बनावे के रहत रहल हा त दुअंछिया-तीनिअंछिया जरावल जाइ. एक ओर भात के अदहन बइठि त दोसरा ओर दालि, तीसरा ओर तरकारी. एह के अइसे समझीं कि जइसे आजु गैस के चूल्हा बा. जवना में एक बर्नर, दू बर्नर, चार बर्नर होला. कुछ अइसहीं.
अब त उज्जवला योजना के चलते ढेरे जगह गैस पहुंच गइल बा. ओइसे पहिलहिं से लकड़ी वाला चूल्हा कम होत चलि गइल बा. त लोगनि के दुअंछिया कइसे यादि रही.

भोजपुरी समाज से तमाम अइसन सबद बाड़न स. जवन खतम हो गइले भा लोपा गइले. लोपाइल सबदन के बारे में कहल जा सकेला कि तकनीक के बढ़त चलन से चूंकि पुरान तकनीक खतम होत चलि गइल त ओकरा में इस्तेमाल होखे वाला सबद भी लोपा गइले स. जइसे खेती-बारी में इस्तेमाल होखे वाला सबद. पहिले पटवाही ज्यादेतर बरखा के पानी चाहें इनार – कुआं से होत रहल हा. लेकिन अब जगह-जगह ट्यूबेल आ ड्रिबलिंग सिस्टम आ गइल बा. त पुरनका तकनीक के जरूरते ना रहि गइल. जइसे पहिले खेत में जाहां पानी ना चढ़ि. त काठ के बनल बड़ बटुला जइसन औजार हाथा से पानी एक तरह से कांछि-कांछि के उपर चढ़ावल जात रहल हा. अब ना हाथा के जरूरत रहल ना ओकरा के यादि करे के, एहि तरी पहिले बैल के जरिए रहंटि आ जमोटि से पानी निकलात रहल हा. रहंटि त मदर इंडिया फिलिम देखे वाला लोग देखि लीही. बाकिर जमोटि चमड़ा के एक तरह से बड़हन झोरा होत रहल हा. जवना के इनार-कुआं में रसरी के सहारा से गिरावल जात रहल हा आ ओह में पानी भरि जाइ. एक बेरि में तीस-चालीस लीटर ले पानी आवत रहल हा.

ओकरा के बैल के जरिए घराड़ी यानी पहिया के मारफत खींचात रहल हा, एही तरी ढेंकुलि होत रहला. एगो खांभा पर बांस के पट लगावल जात रहला हा. ओकरा एक तरफ भारी बोझा बान्हाई आ दोसरा तरफ रसरी-डोरि से ढलवां पेनी वाला बालटी जोड़ा त रहल हा. ओह में बाल्टी डाले खातिर मेहनत त लागत रहल हा. लेकिन पानी निकाले में बांस के पीछे वाला लागल बोझा सहयोग करत रहल हा.

पहिले उखि जहां पेरात रहल हा और जहां गुर बनत रहल हा. ओह जगहि के कलुहाड़ी कहल जात रहल हा. जवना बरतन में ऊखि के रस के पका के गुर बनत रहल हा. ओकरा के ताव कहल जात रहल हा. ओइसे ताव के एगो अर्थ ऐन मोका भी होला.  पहिले जब भोज होत रहल हा. त बड़ चूल्हा पर भोजन बनत रहल हा. ओकरा खातिर जमीन में गहीर नरी नियर खोनात रहल हा. ओही में बड़की चइली जरा के खाना बनत रहल हा. ओही के तिउर कहात रहल हा. अब त गांवों गैस के चूल्हा पर भोज होता त केकरा फुरसत बा कि तिउर के यादि करे.  पहिले गांव में तिरकट जाए खातिर पर पातर-पातर रास्ता होत रहले हा स. ओही के छवरि आ ठहरि कहात रहल हा. छवरि आ ठहरि त अबो बा. बाकी टीवी, तकनीक अब ओकरा के रास्ते बना देले बा. एही तरे पहिले घरहिं आटा सातू पिसात रहल हा. धान कूटात रहल हा. एकरा खातिर जांत यानी चक्की आ ओखरि के इस्तेमाल होत रहल हा. लेकिन अब ओकर चलन नइखे त ई सबद सब लोपा गइले स. पहिले भोजपुरी इलाका में मोट अनजा खूब पैदा होत रहल हा.

सांवा, कोदो, बाजड़ा, तिसी, बरे, पहलादा यानी बोकला, टांगुन आदि. एह में से अब बरे, बोकला, टांगुन के पैदावार तकरीबन खतमे हो गइल बा. त लोग एकरो के भुलाता. सांवा, कोदो, बाजड़ा, तिसी आपाना पुस्टई के चलते एक बार फेरू डाक्टर लोगन के ध्यान खींचले बा त ई सबद जी गइल बाड़े स. एही तरे पहिले घर से निकले खातिर पिछुआरा में छोट दुआर होत रहलि हा. ओकरा के दुअरखोला कहल जात रहल हा. बाकिर अब लोग नवका फैशन में ओकरा के खिरकी कहे लागल बा. पहेलि कच्चा घर के दीवार खासतौर पर बियाह-सादी चाहे तीज-तेवहार में ऐपन लगावल जात रहल हा. अब काच्चा घर ना रहले स त ओकर जरूरते ना रहि गइल.

पूजा-पाठ, खासकर रामनमी के देबी पूजा में पूरी संगे रसियाव बनत रहल हा. रसियाव यानी बिना दूध के खीर. पूजा में ई अबो बनेला. बाकिर लोग अब ओकरा बिना दूध वाला खीर कहे लागल बा. पहिले खीर के भोजपुरी समाज जाउर कहत रहल हा. बाकिर अब लोग ओके भुला गइल. पहिले भोजपुरी समाज में कांची, चोंथा, गुर्हुमा, लपसी, महुआरि बनत रहल हा. कांची माने बिना घीव में आटा के भुंजले हलुआ. चोंथा जवना के आजु लोग मीठा चिल्ला कहे लागल बा. गुर्हुमा माने आटा के मीठा घोल के घीव में जीरा के छौंका के बाद बनावल द्रव पदार्थ. एकरा के खासतौर पर कवनो तेवहार के पारन के वक्त बनावल जात रहल हा. ओइसे मरनि में एकादसा के दिने भोजपुरी समाज में पहिला बार पक्का खाना माने पूड़ी-छौंका वाली तरकारी बनत रहल हा. त ओह दिन गुर्हुमा जरूर बनी. अनंत चतुर्दशीयो के दिने इ बनत रहल हा. लेकिन अब ई सब पुरान बात हो गइल. एही तरी पहिले महुआ के फूल के रस निकालि के ओह में कांची बनी त ओकरा के लपसी कहल जात रहल हा. आ ओही रस में आटा के घोरि के पुआ पाकी त ओकरा के महुआरि कहात रहल हा.

समूचा संसार में लोग आपन भासा-परंपरा के बचावे के कोसिस कर रहल बा. जरूरत बा कि भोजपुरियो समाज जागे आ आपाना संस्कृति के बचावे खातिर प्रयास करे. भोजपुरी के लोपात सबद सब ओकरा संस्कृतिये के परतीक हवन स.
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