भोजपुरी विशेष: जानी खान पान संबधी भोजपुरी के कहावत सावन साग न भादों दही..

भोजपुरी में कहावतन के भंडार बा. केहू भोजपुरिया आदमी से दस मिनट बतइयां उ जरूर एक – दू गो कहावत के प्रयोग क दिही. इ कहावत खाली भाषा के सुंदर बनावे भर खातिर नइखे बल्कि ए सब में गूढ़ जानकारी बा.

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  • Last Updated: September 16, 2020, 12:23 AM IST
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‘सावन साग न भादों दही, कुवार दूध न कातिक मही....’ एही से मिलत जुलत भोजपुरी पट्टी में कहीं-कहीं एगो आउर कहावत कहल जाले. ‘सावन साग न भादों दही, अगहन माछ न कातिक मही....’ इ कहावत भोजपुरी प्रदेश में खूब प्रचलित ह. इ मत सोचब की इकुल कहे वाली बात है. पुरान लोग एकरा के ठीक से मानत रहलन जा. नियम से चलें आउर बरावें. जे ना बरावे ओकरा के लोग ‘जीभ चटाक’ कहें.

अब इ सवाल उठ सकेला कि एकर कवन जरुरत ह? त सुनी, इकुल एसे जरूरी ह की मेहनत करे वाला समाज हमेशा मवसम क साथ चलेला. ओकरी पीछे विज्ञान से ज्यादा उनहन लोगन क आपन अनुभव ह. जईसे की सावन में साग एसे ना खाए के चाही कि बुन्नी ढेर परले की कारन साग की पतई पर माटी जम जाले. केतनो बढ़िया से धो के बनायिब त तनीमनी माटी ओकरा में रह जाई. जब खाईब त दात मारी. किरीर-किरीर करी. दूसर बात इ ह कि बुन्नी-पानी में सागपात में किरवना ढेर रहेलन स. काट के धोवले की बादो ओमे कुछ न कुछ रह जालन स. त जीव हत्या की संगे एगो दिक्कत किरवना खयिलहूँ क रही. बहुत कीरवना अयिसनो होलन स की जल्दी मरे लन नाही. अब कवनो किरवना शारीर में चल जाई त बहुत नुकसान करी न. एसे बरावल जाला.

भादों क महीना तनी खरस वाला रहेला. आप देखीं न की दिल्ली में त भादो चढ़ते अस्पताल की बहरे जोखाम-बोखार वालन क लाईन लग जाले. ओकर कारन इ ह कि दिन में घाम तेज होला आउर राती क खूब शीथ पड़ेले. दिन में आप के घाम लागल आउर राती क तनिको शीथ लागल त मनई के बेमार होत देरी ना होले. चाहे कहीं से चल के अयिलीं आउर तुरंते पानी पी लिहलीं, तबो आप की गर में खुरुर-खुरुर शुरू हो जाई. अइसना में दही खरस के बढ़ा देले. सरदी, जोकाम, बोखार होखे क संभावना बढ़ जाले. गला पर ये कुल क प्रभाव दू-चार दिन रहेला. एहिसे कहल जाला की भादों में दही ना खाएके चाही.



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कुवार में दूध खाए खातिर एसे मना कईल जाला कि लोग बाग़ ये महीना में अपनी पितरन के दान करे ला. पनरह दिन दूध से बनल जाउर चढ़ावल जाला आउर पिंडा पारल जाला. विदवान लोग एकरोके बरावेला.

कातिक में ‘मही’, मतलब की माठा ना पिए के चाही. काहें से की कातिक में जाड़ा पड़े लगेले. जाड़ा में माठा पीयले से पेट में ठंढा घुसले क डर रहेला. खास करके बुढ़-पुरनिया आउर छोट लईकन के इ ढेर नुकसान करेला. ठंढा ढेर लगले पर छाती जाम हो जाले. सास लेवे में तकलीफ होखे लगेले. एसे लोग बरावेला.

असही अगहन में मछरी ना खाए के चाही. इ महीना ओकरा के अंडा देवे, खनदान बढ़ावे क महीना होला. ए समय मछरी खईले तीनगो दिकत होले- एगो त इ कि मछरी खा जाईब त ओकर अंडा ना बनी आउर ओकर प्रजाति खतम हो जाई. दूसर इ की जीव हत्या होई. तीसर, जवन सबसे जरुरी ह, उ इ की गाभिन मछरी खाए में नीमन ना लागेले. तितावे ले. अब आप समझ सकीला की एतना खतरा मोल ले के मछरी खायल केहुके बाउर ना लागी त नीमनो ना लागी. भुजल चाहे पकवल मछरी अपनी सुवाद खातिन जानल जाले. अब तीत मछरी खाइ के अपने जीभ के सजा देवल केहू ना चाही. भोजपुरी परदेश क अदमी त बिलकुल ना चाही.

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इ विचार करे वाली बात बा कि गाँव में बुढ़-पुरनिया लोग अईसन कहावत काहें कहत रहलें? एमे धरम से मतलब ना ह. इ खाटी अनुभव बाटे. एतना त आप सब जानिलां कि समय से खायल-पीयल एसे जरुरी ह की आप की शरीर क ताक़त बनल रहे. शारीर में कवनो प्रकार क कमजोरी ना बनी त अस्पताल गईले क जरुरत ना पड़ी. अब ओमयिन कवन नियम केतना ठीक रही. इ बात समझे वाली ह. जईसे की मौसम की अनुसार फल, सब्जी पैदा होले. ओके खईले पर ठीक रहेला. ताजा उहे मिलेले. अब विज्ञान क जमाना ह.

आज काल्ह त कुल चीज बारहो महीना मिलत बा. बजार जायिब त डब्बा में बंद क के आप के कुल समान मिली. केकर सीजन बा आउर ना बा, इ पते ना चलेला. लेकिन आप सब त जानीलां की बारहो महीना कवनो फसल ना पैदा होखत. बेचे वाला लोग फसल खरीद के ठंढा करे वाली मशीन में रख लेत बा आउर ओकरा के बेचत बाड़न आउर खाए वाला शहराती लोग खूब खात बाड़न जा. कुछ गांवों में रहे वाला लोग इहेकुल खाए लागल बाड़न. एकर नुकसान का बा? इ समझ जायिब त आप के इ कहावत नीमन लागे लागी.

ठंढा करे वाली मशीन में रखल खाना आउर सब्जी क पोषक तत्व खतम हो जाला. खाना गरम क के खायीं चाहे सब्जी पका के खायीं, एक बार मशीन में डाल दिहलीं त ओकर मूल रूप ख़तम हो गईल. उ बनावटी बन गईल. अब आप देखब की अईसन खाए वाला लोग देखे में खाना त बहुत नीमन खात बाड़न, लेकिन शारीर कमजोर होत जात बाड़े. इ काहें होत ह. एगो त इहे बात बा की मशीन क प्रयोग बढ़ गईला से शारीर ढेर अराम में पड़ गईल बा. दूसर, जवन बढ़ियां समझ के लोग खात बा, उ सच में बढ़िया बाड़े नाहीं. पोषक तत्व वाली चीज खायिब तब न राउर शारीर मजबूत रही.

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भोजपुरी पट्टी में अईसन कहावत बहुत हईं सो. ओमे ज्यादातर अनुभव की पूंजी पर बनावल गईल बाड़ी स. आप देखब की समय के अनुसार ना चालले में आज केतना खतरा बा. आज कईगो बेमारी जीवन जियले क गलत तरीका अपनवले से पैदा होत बा. जईसे कि राती भर जागल, दिनभर सुतल, कुटाइम खईले-पियले से ढेर दिक्कत बा. कुछ जाने एतना परशान हो जात ह कि आपन गरदन खुदे दबा के जिनगी खतम कय लेत हवें. अब आप सोची की तनीसा खईले-पीयाले आउर समय से सुतले पर आदमी आपन जीवन नीमन तरीका से जी लेई उ ठीक बा की शारीर में पचास गो बेमारी पाल के आउर अपन गरदन खुदे दबा देहि, उ ठीक बा!
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