भोजपुरी में पढ़ें: विरह के कसक से सराबोर 'बारहमासा', पिया के वियोगवा में कुहुके करेजवा

'बारहमासा' में हरेक महीना क संगही विरही के मरम छुअत वेदना के गूँज मिलेला.

'बारहमासा' में हरेक महीना क संगही विरही के मरम छुअत वेदना के गूँज मिलेला.

पुरान भारतीय साहित्य में बारहमासा के बहुत समृद्ध परंपरा ह. अलग अलग भाषा में अपना अपना तरीका से एक वर्णन मिलेला. कुदरत से जुड़ल भोजपुरी साहित्य में एकर महत्व के बतावत लेख

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 11, 2020, 1:33 PM IST
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रसाती महीना के गंवई जिनिगी. झमाझम बारिश के झड़ी. माटी-ईंटा के खपरैल आ फूस के पलानी के छाजन से टप-टप टपकत पानी. खटिया-चउकी आ ओढ़ना-बिछौना भींजि रहल बा. नवकी दुलहिन के रोवां-रोवां असह वेदना आ दरद के टीस से वेयाकुल हो उठत बा. पिया गौना कराके उन्हुका के नैहर से ले आके ससुरा में बइठा दिहले, बाकिर खुद रोजी-रोटी के जोगाड़ में परदेसे गइले त आजु ले उन्हुकर कवनो खोज-खबर ना लिहले. पिया-मिलन के कइसन-कइसन सोनहुला सपना देखले रहली ऊ अपना नैहर में!बाकिर इहवां त सब मटियामेट हो गइल. बुझात बा जइसे कवनो फूल फुलाए का पहिलहीं मुरझा गइल होखे. परदेसी बालम के बिना भला के अइसन बा आपन जे घर के छवावे आ एह करिया भकसावन रात के भयावहता के मिलन के खुशनुमा चाननी में बदलि सके?उन्हुका मए अरमानन पर पानी फिर जात बा. बाट जोहते पावस ऋतु गुजरि जात बिया आ हाथे लागत बा बस विरह-वेदना आ निराशा.

बरसाती लोकगीत 'बारहमासा 'लिखे आ गावे के प्राचीन परिपाटी रहल बा. कई गो संतो कवि एह पर अनुभूतिपरक आ प्रभावी लेखनी चलवले बाड़न. बारहमासा में चइत से फागुन तक के बारहो महीना के कुदरती छटा आ विरही नायिका के देह-दिमाग के हाल के मरमभेदी चित्र उकेरल जात रहल बा. जायसियो 'पद्मावत ' के 'नागमती वियोग खंड ' में बारहमासा का जरिए नागमती के विरह-वर्णन करे में कामयाबी हासिल कइले रहलन. जइसे:
'बरिसे मघा झकोरि झकोरी,

मोर दुइ नैन चुअत जस ओरी. '

बांग्ला साहित्य के 'पल्ली गान ' में आ विजय गुप्त के 'मनसा मंगल ' में बेहुला के बारहमाशी बारहमसे के रूपांतरण ह. 'बारहमाशी' में हरेक महीना में परे वाला व्रत का विवेचन का संगही विरही के मरम छुअत वेदना के गूँज मिलेला. मए लोकभाषा में लोकसाहित्य के अनुभूत्यात्मक अभिव्यंजना बारहमासा में पावल जाला. भोजपुरी बारहमासा में त विप्रलम्भ सिंगार के प्रधानता दिल के छूवे बेगर ना रहे आ एह में विरही के वेदना के पराकाष्ठा पथलो दिल वाला के पघिला देला. एकरा अलावा वन में भटकत राम, लछुमन सीता के मनोदशा आ उर्मिला के विरह-बिछोह के प्रसंग बारहमासा में आवेला. गांव में बरसाती महीना में बारहमासा का अलावा छौमासा आ चौमासा गावहूं के परंपरा बा, जवना में छव आ चार महीना के वियोगजन्य वेदना के चित्र उकेरल गइल रहेला.



बारहमासा में नारी के दिव्य सतीत्वो के वर्णन मिलेला. पति के प्रतीक्षा करत-करत पत्नी के आंख पथरा जात बाड़ी स, बाकिर ऊ सपनो में अपना पति का अलावा अउर केहू के धेयान करत नइखे. प्राकृतिक दृश्य का साथे-साथे गृहस्थ जिनिगी के विविध रंगो बारहमासा में उकेरात रहल बा. कतहीं अनावृष्टि के कारन मचल हाहाकार, त कतहीं इंदर भगवान से जल बरिसावे के विनती. पारिवारिक जिनिगी के अलगा-अलगा नेह-नाता के तनोबाना एह गीतन में जहां-तहां भेंटा जाला.

चइत के बसंती महीना. बेला-चमेली के फूलन के खुशबू. गुदगुदावे वाली हवा के शोखी. भौंरा के गूँ ज. पपीहा के पिउ-पिउ के पुकार. कोइलर के कूक. अइसना में अगर प्रिय के साथ ना होखे त प्रिया के करेजा भितरे-भीतर दरकि जाला. अपना बेबसी के इजहार करत ऊ सखी से कहत बिया:
'कुहु-कुहु बोले रामा काली रे कोयलिया,

फाटेला करेजवा हमार हे,

अब ले ना अइले मोरे पिया परदेसिया,

नयना से बहे जलधार हे!'

बइसाख के गरमी में नवयौवना के मन-परान वेयाकुल हो उठत बा आ ऊ जल बिन मछरी-अस छपिटाए लागत बिया:
'जइसे सुखल जाला ताल-तलैया,

तइसे सुखल जाला जान हे,

तलफेली जइसे सखी जल में मछरिया,

तइसे तलफे मोरे प्रान हे!'

जेठ के जानलेवा गरमी. धरती के ओठ पर फाटत बेवाई. विरह के ज्वाला में धधकत विरही।
''दिन दुपहरिया में बरिसे अगिनिया,

धुरिया में उड़ेला अंगार हे,

विरह-अगिनिया में जरत जवनिया,

धह-धह जरे संसार हे!'

आषाढ़ के रिमझिम बरखा. झकझोरत हवा आ वन में नाचत मोर के देखिके करेजा फाटे लागत बा प्रिया के. सून सेज आंख से मोती टपकावे खातिर मज़बूर क देत बा.
'बिलखत बीत जाले विरह के रतिया,

रोइ-रोइ होइ जाला भोर हे,

मनहुं ना भावे मोहि सूनी  सेजरिया,

मदन करत अति जोर हे!'

कजरी के बहार लेले आ पहुंचल बा सावन. हरियरी आ झुलुहा के मजा लेत सखी-सलेहर, बाकिर ओकर धू-धू क के जरत बा कुम्हिलात देह. अपना मन के बात ऊ भला कहबो करे त केकरा से?
'निसि दिन धधकत विरह अगिनिया,

धह-धह जरे मोर गात हे,

केकरा से कहीं हम शरम के बतिया,

दिन-दिन तन कुम्हिलात हे!'

भादो के अन्हियारी रात. पानी से लबालब भरल ताल-तलैया. बेंग के टर्र-टर्र. झिंगुर के झंकार. रस से सराबोर गदराइल यौवन आ बालम के गैरहाजिरी.
''आधी-आधी रतिया में बोलेला दादुरवा,

झिंगुर करे झनकार हे,

पिया बिनु सेजिया प कांपेला करेजवा,

होइ जाला जिया बेकरार हे!'

कुआर आ कातिक महीनो में विरही के आस निराशा में बदलि जात बा. नीरस मेघा नियर ओकर संसार नीरस हो गइल बा. शरद के चान, शीतल पवन---सब जरला प नून छिरिकत जनात बाड़न:
'उगेला गगनवां में शरद के चांदवा,

मोरा लेखे जरेला अंगार हे,

पिया के वियोगवा में शरद पवनवा

मारेला करेजवा कटार हे!'

अगहन में फसिल पाकि गइली स. खेत-खरिहान जगमगा उठल. सबकरा देह प रंग-बिरंग के कपड़ा-गहना सजल बा बाकिर हमरा करम में आजुओ उहे फाटल-पुरान बहतर आ पिया के बिछोह. धन्न रे मोर भागि!
'सब सखी पेन्हि-ओढ़ि पाट-पीतंबर

पिया पर करेली गुमान हे,

अगिया लागल बाटे हमरो करमवां,

पेन्हतानी गुदरी पुरान हे!'

पूस आ माघ के हाड़ कंपावत ठंढ. आसमान से झरत ओस. बेरि-बेरि सिहरत तन आ मन.
'सबके बलमुवा रामा घरहीं बिराजे,

जरि गइले हमरो लिलार हे,

थर-थर कांपे रामा शीत से करेजवा,

कुहुकेला मनवा हमार हे!'

फागुन में रंग-गुलाल-अबीर आ फगुवा-जोगीरा के आलम. मस्ती में झूमत नर-नारी. उहंवें विरहिन के दुख आ अधीरता चरम पर.
'फगुवा खेलत बाड़े हमरे देवरवा,

सिहरत सगरे शरीर हे,

कहत अलख मदमस्त महीनवां,

कइसे धरीं हम धीर हे!'

आखिरकार ओकरो दिन पलटत बा, जब ओकर परदेसी पति कमा-धमा के आ पत्नी खातिर किसिम-किसिम के साड़ी-गहना लेके गांवें लवटत बा. ओकर मन-मोर नाचि उठत बा आ ऊ अपना मरद के गांवें में रहिके खेती करेके सलाह देत बिया. ओकरा के खुश देखिके जब ओकर सखी मजाक करत एक दिन खातिर ओकरा मरद के मांगत बिया, त ऊ साफे इनकार करत निठुरी मुंहें कहत बिया :
'घीव देबि मंगनी हो तेल देबि मंगनी,

सैंया के मंगनी ना देबि,

हमरो बलमुवा त डंडी के जोखल,

घटिहें त केकरा से लेबि!'
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