Bhojpuri में पढ़ें बनारस विद्रोह की दास्तां: जब नाटी इमली में भइल ’गौरैयाशाही’

बनारस में अंगरेजन के खिलाफ विद्रोह 1781 से ही शुरू होइ गयल रहल. बनारस क जनता अंगरेज गवर्नर वारेन हेस्टिंग के सेना के घेरि लेहले रहल अउर 200 से अधिक सैनिकन के मारि डलले रहल. हेस्टिंग महरारू क भेस धइ के कइसव जान बचाइ के भागि गयल रहल.

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देश में अंगरेजी शासन के खिलाफ पहिला विद्रोह 1857 क गदर बतावल जाला, लेकिन बनारस में अंगरेजन के खिलाफ विद्रोह 1781 से ही शुरू होइ गयल रहल. बनारस क जनता अंगरेज गवर्नर वारेन हेस्टिंग के सेना के घेरि लेहले रहल अउर 200 से अधिक सैनिकन के मारि डलले रहल. हेस्टिंग महरारू क भेस धइ के कइसव जान बचाइ के भागि गयल रहल. बनारस में विद्रोह क इ पहिली अउर आखिरी घटना नाहीं रहल. बनारस के लोगन पर जब भी अंगरेज अत्याचार करय चहलन, जनता लामबंद होइ गइल. हर बार शासन-प्रशासन के कदम पीछे लेवय के पड़ल.

हेस्टिंग वाली घटना के बाद सन 1810 में एक दूसर घटना घटल. कंपनी सरकार बनारस में गृहकर लगाइ देहलस. बनारस क लोग एकरे पहिले गृहकर क नाम तक नाहीं सुनले रहलन. इ कवन नई आफत आइ गइल. सब परेशान. बनारस में हर गली-चौराहा पर लोगन के बीच काना-फूसी शुरू होइ गइल. अंत में लोग गृहकर के खिलाफ आंदोलन करय क फैसला कइलन. बड़ी तइयारी भइल अउर बनारस क तीन लाख लोग आग न जरावय क कसम खइलन. आपन कुल काम-धंधा छोड़ि के घरे में ताला लगाइ के मैदान मे बइठि गइलन. तब भारत में ब्रिटिश हूकूमत नाहीं रहल, ईस्ट इंडिया कंपनी क शासन रहल. ब्रिटिश सरकार त 1857 के विद्रोह के बाद आइल. बहरहाल, कंपनी क अधिकारी बगावत पर उतारू बनारसी जनता के मनावय क बहुत कोशिश कइलन. लेकिन बनारसी टस से मस नाहीं भइलन. अंत में सरकार के झुकय के पड़ल अउर गृहकर वसूलय क फैसला वापस लेइ लेहल गय़ल.

बनारस में एह घटना के बाद 1852 में कंपनी सरकार के खिलाफ बनारसी एक बार फिर से लामबंद होइ गइलन. दरअसल, अफवाह फइलल कि जेल में बंद हिंदू कैदीन के भोजन में गोमांस मिलावल जात हौ, जवने के नाते बेदीन होवय क खतरा पैदा होइ गयल हौ. दूसर अफवाह इ फइलल कि बनारस में सड़क पर घूमय वाले साड़न के पकड़ि के काजी-हौद में बंद कयल जात हौ. हिंदू लोग साड़ के भगवान शिव क वाहन मानयलन अउर काशी में बाबा विश्वनाथ के वाहन के साथ अइसन हरकत हिंदू बरदास्त करय के तइयार नाहीं रहलन. इ दूनो खबर बनारस में आगी की नाईं फइलि गइल अउर बनारसी एकरे खिलाफ लामबंद होइ गइलन.

बनारस में दुकान अउर बजार धड़ाधड़ बंद होइ गइलन. कंपनी सरकार के 1810 क घटना याद रहल, जब बनारस के लोगन के विरोध के कारण गृहकर क निर्णय वापस लेवय के पड़ल रहल. अब एकबार फिर से बनारस के लोगन क लामबंदी देखि के प्रशासन के सांप सूघि गयल. आखिर इ मामला शांत कइसे होय. एदइयां मामला धरम से जुड़ल रहल, एह के नाते प्रशासन भयभीत रहल कि कवनो अनहोनी न होइ जाय. प्रशासन पहिलय से सतर्क होइ गयल. बनारस क लोग नाटी इमली के मैदान में जमा होइ गइलन. कलेक्टर जनाब गाबिंस अउर कोतवाल गोकुलचंद वक्त क नजाकत समझि के नाटी इमली पहुंचलन अउर जनता के समझावय क बहुत कोशिश कइलन.
लेकिन बनारस क लोग एतने गुस्सा में रहलन कि दूनों अंगरेज अधिकारीन क बात सुनि के भड़कि उठलन, जइसे लाल कपड़ा देखि के साड़ भड़कयला. नतीजा इ भयल कि भीड़ अंगरेज अधिकारीन पर अउर ओनके मातहतन पर गौरैया यानी चीलम फेकय शुरू कइ देहलस. पुरनिया लोग बतावयलन कि जनता एहतियात के तौर पर एक-एक गौरैया जेबा में लेइ के नाटी इमली पहुंचल रहल, ताकि अंगरेजन के शंका भी न होय अउर जरूरत पड़ले पर ओहके हथियार के रूप में इस्तेमाल कयल जाइ सकय. भीड़ जब गौरैया फेंकय शुरू कइलस तब उहां अफरा-तफरी मचि गइल अउर अंगरेज अधिकारी अपने मातहतन के साथ उहां से जान बचाइ के भगलन.

नाटी इमली के घटना क खबर मिलतय पूरे शहर में बवाल शुरू होइ गयल. लोग जगह-जगह जमा होइ के विरोध प्रदर्शन करय लगलन. इ सिलसिला पूरे चार दिन तक चलल अउर पूरा बनारस बंद रहल. अंत में जब अंगरेज अधिकारी लिखित में दूनो अफवाहन के खिलाफ बयान जारी कइलन, तब जाइ के विरोध प्रदर्शन समाप्त भयल. बनारस के इतिहास में एही विद्रोह के ’गौरैयाशाही’ के नाम से जानल जाला.

बनारस 1857 में भी शांत नाहीं बइठल रहल. देसी सिपाही एक जून के खाली बैरकन में आग लगाइ देहलन. जब चार जून के देसी सिपाहीन से हथियार लेवय बदे ओन्हय परेड में बोलावल गयल तब अंगरेजन के अपने ओरी बंदूक लेइ के आवत देखि के सिपाही भड़कि उठलन. अपने अफसरन पर ही गोलीबारी शुरू कइ देहलन. देखत देखत पलटन नंबर 13 में भी विद्रोह होइ गयल. छावनी में गोली क अवाज सुनि के शहर में भी बवाल शुरू होइ गयल. कुछ अंगरेज अधिकारी आपन जान बचावय बदे कचहरी में छत पर चढ़ि गइलन. सिख सिपाही छत पर जाइके अधिकारीन पर हमला करय क तइयारी करय लगलन. लेकिन सरदार सुरजीत सिंह नाम क एक राजनीतिक शरणार्थी सिख सिपाहीन के हमला करय से रोकलस. तब जाइ के अंगरेज अधिकारीन क जान बचल.



गदर के दौरान बनारस में विद्रोह क प्रमाण आदिकेशव घाट पर मौजूद एक शिलापट्ट से भी मिलयला. शिलापट्ट पर लिखल हौ कि आदिकेशव मंदिर में फिर से पूजा शुरू होइ गयल (1863). एकरे पहिले सुरक्षा के लेइ के पूजा बंद रहल. दरअसल गदर के दौरान शहर में नौ जून के फौजी कानून लागू कइ देहल गयल रहल. (लेखक सरोज कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)

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