भोजपुरी विशेष: पत्तल में धम से धमकि जाले बलिया के बड़की पुड़ी

हाथी के कान से बड़ बलिया के पुड़ी.

हाथी के कान से बड़ बलिया के पुड़ी.

बलिया के पुड़ी के आकार बहुत बड़ होला. पुरान लोग कहेला कि इ आकार छोट हो गइल बा. फिर भी पुड़ी के सवाद में अंतर नइखे आइल. हाथी के कान से मुकाबला करे वाला वही पुड़ी के याद करत हवें लेखक.

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  • Last Updated: September 10, 2020, 3:00 AM IST
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ता न बलिया के अलावा दोसरा भोजपुरी इलाका में ई कहाउत चलेला कि ना. बाकिर बलिया में ई बहुते मसहूर बा.  ‘दही चिउरा बारह कोस, लिचुई अठारह कोस.’ लिचुई माने पुड़ी. बलिया जिला में भोज के प्रसंग में पुड़ी के चर्चा भइल त एकर एक ही माने होला, बड़की पुड़ी. हाथी के कानों ले बड़हन पुड़ी. एह पुड़िए के परताप बा कि बलिया में लोग दही-चिउरा के भोज पर अधिका से अधिक बारह कोस तक जाए के हिम्मति जुटावेला. लेकिन बड़की पुड़ी के बाते दोसर बा. ओकर सवाद और सवाद से जुड़ल आकर्षणे बा कि लोगन के अठारह कोस तक ले खींचि लेला.

साल 2010 में छोटे लोहिया के नाम से मसहूर आ बलिया के बेटा जनेसर मिसिर के देहांत हो गईल.उनुकर चाहे वाला लोग दिल्ली के लुटियन जोन में रजिंदर परसाद रोड पर, जहां मिसिर जी के सरकारी घर रहे, उहवां भोज कइल लो.हमनी भोजपुरी इलाका में बूढ़-पुरनिया के देहांत के बाद बड़हन भोज होला.जेकर जाताना बेंवत.ओतना बड़ भोज. मृत्युभोज के विरोध करे वाला लोग हमनीं के धरती पर जाई लोग त विरोधे होई. हां, जेकरा बेंवत नइखे त समाज ओकरा पर बड़हन भोज-भात करे के दबावो ना देला.

त जनेसर बाबा के इयादि में दिल्ली में भोज भईल. भोज के आयोजक शिवसरन तिवारी जी छोटकी पुड़ी के संगे बड़कियो पुड़ी के इंतजाम कइले.एकरा खातिर बाकायदा बलिया से हलुआई लोग आइल रहे.ओह भोज में एक पंक्तिन के लेखक के संगी पत्रकारिता के दूगो प्रोफेसरो पहुंचले लोग.एह पंक्ति के लेखक प्रोफेसर लोगन से बड़की पुड़ी खाए के निहोरा कइले. लेकिन ओकर साइज देखि के ऊ लोग घबरा गइल लोग.चूंकि ऊ लोग पछिमी यूपी के रहे वाला ह लोग.आ ओहन लोग के कबो पुरूब में जाए के मोका ना मिलल रहे त ऊ लोगन के पते ना रहे कि एह पुड़ी के माने का ह.का ह सवाद.बहरहाल जोर दिहला पर ऊ लोग जब बलिया के पुड़ी के जीभि पर घुमावे लागल लोग. त भुला गइल लोग कि ऊ लोग काताना खा लिहले.



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हमनी गांवे एगो पुरनिया बाड़े.नाव त उनुकर भरत चउबे ह. बाकिर गांव में ऊ गाट बाबू के नांव से मसहूर बाड़े.ऊ कहेले कि पुड़ी मुंह खोलि देले.कमोबेस बलिया के पुड़ी के सवखीन लोगन के मान्यता ईहे बा.बलिया के पुड़ी के बड़का साइज देखि के नाया लोग घबरा जाला. बाकिर जब खाए लागेला त भुला जाला कि ऊ लोग काताना खा लिहले.

जनेसर बाबा के दिल्ली वाला भोज में उत्तर प्रदेश के पूर्व मंत्री स्वर्गीय शारदानंद अंचलो आइल रहले.जब उनुका खाए के भइल त उनुकर चेला-चपाटी लोग पूछि लिहलसि. ‘मंत्री जी छोटकी पुड़िया ले आईं कि बड़की.’ त ऊ तुनुकि गइल रहले. ‘जाहां बड़की पुड़ी रहेले, उहां हम छोटकी के देखबो ना करेनी. ’

बिहारी कवि के दोहन के बारे में कहाउत बा. ‘देखन में छोटो लगे, घाव करे गंभीर’.बलिया के बड़की पुड़ी के बारे में कहल जा सकेला,  ‘देखन में बड़ो लगे.सवाद मारे गंभीर.’ दरअसल बलिया के पुड़ी के बनावे के स्टाइले गजब बा.

बड़का कठवति में एक बार में करीब बीस किलो आटा सानाला. आजुकाल्हु त मिलि के आटा आवे लागल बा.पहिले के जमाना में परोज खातिर गहूं कम से कम चौबीस घंटा भेंवात रहल हा. ओकरा बाद ओकरा के सुखावल जाई.फेरू उ पिसाई. ओही आटा से पुड़ी बनति रहलि हा.आटा सानत खानि एगो नियम चलत रहल हा.बीस किलो आटा में एक किलो मैदा मिलावल जाई. फेरू दू-चार आदिमी आपाना मजबूत हाथ से ऊ आटा के सनिहें.

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आटा के सानाला के बाद कम से कम आजुकाल तक एक-एक पउआ के लोई काटाला. बाकिर पहिले कम से कम आधा किलो के लोई काटात रहल हा.लोई काटत खानी चिकना माने तिसी भा मोमफली भा सूरजमुखी के तेल से हाथ आ लोई चिकनावल जाई.फेरू हलुआई महराज आपाना बाड़ाका चउकी पर ओह लोई में चिकना तेल लगा के एक हाली दहिने आ एक हाली बाएं खींचि देत रहले है. लोई के बाड़ाका रूप में बेलि के छन से गरम घीव भा तेल के कराही में डालि दिहें. फेरू छाने खातिर तैयार दोसरका हलुआई ओके बड़का छनवटा से पका के छानि लिहें.आजुओ ईहे बेवस्था जारी बा.

अब सवाल बा कि बड़की पुड़ी काहें स्वादिस्ट होले.त एकर जवाब बा. ओकरा आटा के तेयारी. ओकर बड़का रूप. आ ओकरा में इस्तेमाल चिकना आ ओकर गुंथाई माने सानाईं.  बलिया के पुड़ी के बारे में मसहूर बा कि कइयो दिन तक ऊ खराब ना हो सकेले.कतनो करारा छानल जाई.गरमागरम त ऊ करारा लागी. लेकिन सेरइला पर ऊ मोलायेम हो जाले.आ ओकर सवाद अऊरी बढ़ि जाला. आताना लचीला कि सायेद एही वजह से एकर एगो नाव लिचुईयो पड़ि गइल बा.

छपरा के लोग तक कहेला कि बलिया के पुड़ी पत्तल में धम दे आवाज करेले. बाकिर ओकरा सवाद के ऊहो लोग कायल ह.

बलिया वाली बड़की पुड़ी कुछ हद तक गाजीपुर आ मऊ जिला में भी चलेले. लेकिन गंगा-सरजू पार करते पता ना काहें ओकर रूप छोट हो जाला आ सवादो कम हो जाला.बहरहाल ई सवादे ह कि लोग पहिले के जमाना में अठारह कोस ले बड़की पुड़ी के बुनिया संगे खाए खातिर चलि जात रहल हा.  कहाउत तब के ह, जब आजुकाल्हु नीयर साधन ना रहे. अब त साधन के जमाना बा, एह बदे अब अऊरीयो दूरि ले लोग चलि जाला.

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बाकिर बाजारवाद के संगे आई कथित आधुनिकता बोध अब बलिया के बड़की पुड़ियो पर गरहन लगावत जा रहल बा.पंजाबी तंदूरी रोटी आ दलमखनी त बलियो के भोज में पहुंच गइल बा. लोग कथित आधुनिकता के नाम पर एह के अपनावत जा रहल बा. जब पूरा दुनिया में आपाना संस्कृति आ परंपरा के ओरि लउटे के अभियान चलि रहल बा.बलिया में लोग एह से दूरी बना रहल बा.  बाकिर अभियो बहुते लोग बा.जेकरा आपन भदेस भोजपुरी माटी आ परंपरा से नेह बा.आ ऊ लोग अबो आपाना भोजभात में बलिया के पहचान बड़की पुड़ी पर ही जोर दे रहल बा.
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