Bhojpuri: संजुक्त परिवार आ एकल परिवार, दस के लाठी, एक के बोझा

सात पुहुत के नांव लेके जब ऊ पुरुखन के इयादि में गीत-मांगर गावे लागसु, त सुनेवाला दांत से अंगुरी दबा लेत रहे. जब ऊ कहानी सुनावसु, त हुंकारी भरिके ई जाहिर कइल जाउ कि हम मन लगाके कहानी सुनि रहल बानीं. जइसहीं जम्हाई आवे आ नींन लागल शुरू होखे, आजी माथ ठोकत,सुहुरावत सुता देसु. अगिला दिने रात खा फेरु उहंवें से कहानी चालू हो जात रहे.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 26, 2021, 5:28 PM IST
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जब आपन लरिकाईं मन परेला,त आजुओ आंतर सरधा से भरि उठेला. कहवां आजु के एकल परिवार आ कहवां ओह घरी के संजुक्त परिवार! रात में रोज ढिबरी भा ललटेन के रोशनी में पढ़ाई-लिखाई कइला का बाद खा-पीके आजी के कोरा में चलि जात रहलीं. फेरु त स्कूल के दिन भर के दास्तान सुनवला का बाद आजी से कथा सुनावे के फरमाइश होखे आ आजी एक से बढ़िके एक नया-नया मजेदार कहानी सुनावल शुरू कऽ देत रहली. सोचिके अचरज होखे कि कइसे उन्हुका अतना कथा-कहानी इयाद बाड़ी स. हालांकि ऊ कबो स्कूल के मुंहों ना देखले रहली, तबो का कथा, का गीत-भजन आ का रामायन के दोहा-चौपाई-सभ उन्हुका मुंहखड़िए इयादि रहे.

सात पुहुत के नांव लेके जब ऊ पुरुखन के इयादि में गीत-मांगर गावे लागसु, त सुनेवाला दांत से अंगुरी दबा लेत रहे. जब ऊ कहानी सुनावसु, त हुंकारी भरिके ई जाहिर कइल जाउ कि हम मन लगाके कहानी सुनि रहल बानीं. जइसहीं जम्हाई आवे आ नींन लागल शुरू होखे, आजी माथ ठोकत,सुहुरावत सुता देसु. अगिला दिने रात खा फेरु उहंवें से कहानी चालू हो जात रहे. ई खाली हमरे ना,बलुक घर-घर के खिस्सा रहे. केहू के बाबा, त केहू के नानी,केहू के नाना,त केहू के चाची-लोरी से लेके भजन आउर कथा-खिस्सा के भंडार होत रहे लोग. ओने माई-बाप घर-दुआर के जरूरी काम निपटावे में अझुराइल रहसु.

संजुक्त परिवार में खाली माई-बाबूजी, भाई-बहिन आ बाबा-आजिए भर ना, घर के तमाम सवांग एके संगे रहत रहलन. केहू में कवनो दुराव भा गलतफहमी होखे, त परिवार के बड़-बुजुर्ग सभके बात के अखियान करत फैसला सुनावसु आ ऊ निरनय सभ केहू मानत रहे. ओह घरी सवारथ के ना,तेयाग के भाव के महातम रहे. जेठ भाई अपना लोग-लरिकन से बेसी छोट भाइयन के लरिका-लरिकी के परबरिस प धेयान देसु.कई घर में त परिवार के कल्यान खातिर एगो-दूगो भाई बियाहो ना करत रहलन, जवना से कि समिलात परिवार में कवनो तरे विघटन ना होखे पावे.

जदी कवनो भाई गांव में रहिके गिरहती आ खेती-बारी सम्हारत रहले,त बहरवांसू भाई लोग जरूरत के मोताबिक महिनवारी रोपया -पइसा भेजे, जवना से कि समिलात परिवार हंसी-खुशी आगा बढ़त रहो. जब कवनो भतीजी के बियाह रोपात रहे,त सभ केहू एकजुट होके बढ़ि-चढ़िके बोझा उठा लेत रहे आ लरिकी के बाप के त किछु पतो ना चले दियात रहे.दस के लाठी, एक के बोझा एकरे के नू कहात रहे. तबे त समिलात परिवार के महिमा के लोग बखान करत ना थाकत रहे. अगर फुआ भा दीदी के ससुरा में केहू दुख देउ,त ऊ नइहर में बोला लिहल जात रहली आ परिवार के बड़-जेठ सवांग लेखा उन्हुकर मान-सम्मान करत सउंसे परिवार नेह-छोह पावत रहे. परिवार में कवनो आफत-बिपत अइलो पर सभ केहू मिलि-जुलिके उहो बोझा अलगा देत रहे. फेरु त दुख के दुर्दिन दूर होत देरी ना लागत रहे. ओकरा जरि में रहे कर्तव्य निबाहे के भावना. परिवार में आपन हक हासिल करेके दियानत सपनो में ना आवत रहे.बूढ़-पुरनिया के सेवा-टहल सचहूं के पूजा-पाठ मानल जात रहे. जे जइसन करी,ऊ ओइसन पाई-ई बात लोग गंठिअवले रहत रहे गोसाईं जी के पांती इयादि करत कि-
करम प्रधान विश्व करि राखा.

जो जस करहिं सो तस फल चाखा!

सन् 1990 में वैश्वीकरण भा भूमंडलीकरण-बाजारवाद के दौर शुरू भइल. फेरु त रिश्तो-नाता के घाटा-नाफा के तरजूई पर तउलल जाए लागल. समिलात परिवार बोझा बुझाए लागल आ पछिम के देशन के नकल करत आसान राह भेंटाइल एकल परिवार के-ना ऊधो के लेना, ना माधो के देना! बस,मियां-बीवी आ एकाध गो लरिका. बाप-महतारी जासु चूल्हाभांड़ में.जवन गाय दूहे के ना,ऊ भाटे के जाउ! एकदम सवारथी आ नकलची रवैया. नगर-महानगर का ओरि पलायन अन्हाधुन बढ़े लागल.फेरु त लरिकन के बाबा-आजी, नाना-नानी गांव में सरसु-मरसु भा बिरधासरम के नरक झेलसु. मतलब से खाली मतलब बा, जब मतलब ना,त का मतलब! वाह रे मतलबी एकल परिवार!



नारी के सशक्तीकरण के भाव बढ़ल,त पढ़ल-लिखल औरत कामकाजी हो गइली. बाकिर मरद के सोच में कवनो बदलाव आइल ना. दफ्तर से आके घरहूं के किचन के काम सम्हारे के दोहरा मार. अगर बाल-बुतरू भइल, त केहू देखे-सम्हारे वाला ना. किराया के नोकर-नोकरानी में ऊ नेह-छोह कहां, जवन आजी-बाबा, नाना-नानी दिल खोलिके लुटावत रहलन. दूध पियवला से लेके तेल-अबटन आ खेलावे,लोरी सुनावे के बहाना से लरिकन के संस्कारित करे आउर आदर-मान,नेह-छोह के भाव भरे के उतजोग.

आजु समिलात परिवार बिखरि रहल बा, तहस नहस हो गइल बा आ ओकर जगह ले लेले बा एकल परिवार. ओकरे नतीजा बा कि आजु के लरिका-लरिकी बूढ़-पुरनियन के नेह-छोह पावे खातिर तरसत बाड़न स, अकेलापन के दंश झेलत अवसाद के शिकार होके खुदकुशी ले करे प अलचार हो जात बाड़न स. मन में बड़-बुजुर्ग का प्रति ना आदर भाव झलकत बा, ना लोरिए भा कथा-कहानी सुने के मिलत बा. फेरु रोवत रहीं लरिकन के सर्वांगीण विकास के रोना. अकसरुआ जिनिगी जीयत हाड़ ठेकावत रहीं, बाकिर आखिरकार पाइबि का?लोला?

त का उमेदि कइल जाउ कि हमनीं के समाज एक बेरि फेरु एकल परिवार से समिलात परिवार का ओरि लवटी? काश,अइसन हो पाइत! सांचो,मेरो मन अनत कहां सुख पावे? (लेखक भगवती प्रसाद द्विवेदी वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)
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