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Bhojpuri Spl: काशी करवट क असली अउर नकली कहानी, पढ़ीं का ह असलियत

रत्नेश्वर महादेव मंदिर से जुड़ल काशी करवट क कहानी कवनों भी लिहाज से सही नाहीं हौ. रत्नेश्वर महादेव क मंदिर एक तरफ झुकल यानी करवट जरूर हौ, लेकिन एकरे पीछे क कहानी कुछ अउर हौ.

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 16, 2021, 2:42 PM IST
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काशी करवट क मतलब कई लोग समझयलन कि काशी कवनों तरफ करवट होइ गयल होई, जवने के नाते काशी करवट कहल जाला. एही भ्रम क फायदा उठाइके केतना पंडा-पुरोहित बहरे से आवय वाले श्रद्धालुन के सिंधिया घाट पर मौजूद रत्नेश्वर महादेव मंदिर के काशी करवट बताइ देलन अउर मनगढ़ंत कहानी सुनाइ के दक्षिणा अइठि लेलन. श्रद्धालुन के बेवकूफ बनाइके पइसा अइठय के लेइके बनारस क पंडन-पुरोहित बदनाम हयन. लेकिन खास बात इ हौ कि बनारस में जेतना भी पंडा-पुरोहित हयन, जादातर बनारस क मूल निवासी नाहीं हयन. लेकिन इ बहरी पंडन के करतूत से बदनाम बनारस अउर बनारस क लोग होलन. रत्नेश्वर महादेव मंदिर से जुड़ल काशी करवट क कहानी कवनों भी लिहाज से सही नाहीं हौ. रत्नेश्वर महादेव क मंदिर एक तरफ झुकल यानी करवट जरूर हौ, लेकिन एकरे पीछे क कहानी कुछ अउर हौ.

काशी करवट क असली कहानी भी पूरी तरह से नकली हौ, अउर भ्रम, झूठ, आडंबर पर अधारित हौ. एह कहानी में भी तमाम सीधा-साधा श्रद्धालु ही शिकार भयल हयन. सबसे पहिली बात कि काशी करवट शब्द ही गलत हौ. सही शब्द काशी करवत हौ, अउर करवत या करौत क मतलब होला आरा, उहय आरा जवने से लकड़ी चीरल जाला. एही आरा के काशी क पंडा-पुरोहित लोग कवनो जमाने में मोक्ष से जोड़ि देहलन, अउर पता नाहीं केतना श्रद्धालुन क गरदन रेति के आपन पेट पललन. एक जमाना रहल जब मोक्ष के चक्कर में काशी में करवत लेवय बदे बूढ़-पुरनियन क लाइन लगल रहय. काशी करवत के नाम पर ठगी क इ परंपरा बहुत डरावना रहल.

बाबा विश्वनाथ क नगरी काशी के बारे में मान्यता हौ कि इहां मरले से सीधे स्वर्ग में सीट आरक्षित होइ जाला. एह के नाते तमाम धनी-मानी लोग घरे के बूढ़-पुरनियन के जीवन के अंतिम समय में स्वर्ग पहुंचावय बदे काशी में लियाइ के छोड़ि देय, अउर देख-रेख, दान-पुन्य, पूजा-पाठ क व्यवस्था कइ देय. अइसन जजमान काशी के पंडा-पुरोहितन के रोजी-रोटी क जरिया बनि गयल रहलन. बाद में दूसरे जगह क पंडा-पुरोहित काशी आइके इ जजमानन के बहकावय लगलन. काशी क पंडा लोग अब एक नया तरकीब निकललन. जजमानन से कहय लगलन कि बूढ़-पुरनियन के ओेनके घरे में ही रखि दिहल जाय, ताकि ओनकर देख-रेख, धरम-करम ठीक से समय पर होइ सकय. जजमानन के इ बात बढ़िया लगल अउर इ परंपरा शुरू होइ गयल. एक-एक पंडन के इहां चा-चार पांच-पांच बूढ़-पुरनिया रहय लगलन. जवन खरचा बहरे होत रहल, जजमान उ खर्चा पुरोहितन के ही देइ देय. लेकिन कुछ समय बाद इ व्यवस्था पंडन के गले क फांस बनि गयल. बीमार बूढ़-पुरनिया बिस्तर पर ही टट्टी-पेशाब कइ देय, घरे में कहीं भी गंदगी कइ देय.



किवदंती के अनुसार, पंडा लोग अब दूसर तरकीब निकललन काशी करवत क. जमीन के नीचे एक ठे गुफा बनउलन अउर ओहमें एक ठे आरा फिट कइ देहलन. आरा कुछ दूरी से रस्सा के सहारे आदमी चलावय. अब पंडा लोग प्रचार कइलन कि भगवान के तरफ से आदेश आयल हौ, आरा भेजल गयल हौ. जे काशी में तुरंत मोक्ष चाहत होय, उ करवत लेइ सकयला. बूढ़-पुरनिया खुशी-खुशी तइयार होइ जाय कि जब मरय के बटलय बा त बिस्तर पर भोगय से अच्छा करवत लेइके झंझट दूर करा. तमाम लोग करवत बदे काशी आवय लगलन, नंबर लगय लगल. कई बार रस्सा फंसि जाय त आरा न चलि पावय. जेकर नंबर रहय ओके बदकिश्मत बताइ के वापस भेजि देहल जाय अउर एक हफ्ता बाद फिर से बोलावल जाय. बेचारे श्रद्धालु उदास मन से किस्मत के कोसत वापस लौटि जाय. काशी करवत क दक्षिणा भी तय रहल. एह तरह से तमाम बूढ़-पुरनिया मोक्ष के चक्कर में आरा से कटि गइलन. काशी में करवत लेवय क इ काली कहानी हौ.
बनारस क पुरनिया लोग बतावयलन कि पहिले एक करवत रहल. बाद में कमाई के चक्कर में पंडा लोग कई ठे करवत स्थापित कइ लेहलन. कमाई के ही चक्कर में आगे चलि के पंडन के बीच आपस में लड़ाई होवय लगल. जेके एह कमाई में हिस्सा नाहीं मिलत रहल, उ एकरे खिलाफ होइ गयल. उ सब करवत क भंडाफोड़ करय लगलन. एह कुप्रथा क जानकारी जब अंग्रेज प्रशासन के भयल तब करवत पर पूरी तरह से रोक लगाइ देहल गयल. हलांकि इ परंपरा काशी में कब शुरू भयल रहल अउर कब बंद भयल, एकर कवनों सही तिथि-समय उपलब्ध नाहीं हौ. लेकिन काशी में करवत क काली कहानी क निशानी आज भी मौजूद हौ.

कहल जाला कि करवत पर जब प्रतिबंध लगि गयल तब पंडा लोग एकर दूसर रस्ता खोजि लेहलन. पंडा लोग मंदिर में शिवलिंग के ऊपर एक ठे आरा रखले रहय. श्रद्धालु काशी में पूजा-पाठ, स्नान-ध्यान अउर दान-पुन्य कइले के बाद अंत में अइसने मंदिर में जाय. उहां उ आरा के नीचे आपन कपार झुकाइ देय. जेकरे कपारे पर आरा छुआइ जाय, मानल जाय कि ओकर काशी यात्रा सफल होइ गइल. जेकरे कपारे पर आरा न छुआय, मानल जाय कि ओकर पाप अबही बाकी हौ, अउर ओहके अउर पुन्य करय क जरूरत हौ. एही ठिअन पंडा-पुरोहित तिकड़म भिड़ाइ के श्रद्धालुन क पाप काटय क उपाय बतावय अउर पइसा अइठि लेय. सिंधिया घाट के नजदीक दत्तात्रेय मंदिर के पास एक मंदिर हौ, जवने के आज भी काशी करवत मंदिर कहल जाला. लेकिन अब इहां शिवलिंग के ऊपर आरा नाहीं हौ.

काशी करवत क एक दूसर अड्डा ज्ञानवापी के पास एक मकान के अंदर हौ. इहां जमीन के नीचे एक ठे गुफा हौ, अउर ओही में एक शिवलिंग मंदिर हौ. शिवलिंग मंदिर में जाए बदे एक तरफ से नीचे सीढ़ी गइल हौ. कहल जाला कि पहिले इहां लोग करवत लेय. करवत बंद भइले के बाद भी पंडा लोग श्रद्धालुन के एह मंदिर के पौराणिक महत्व क बताइ के नीचे लेइ जाय अउर मनगढ़ंत किस्सा सुनाइ के ठगि लेय. धीरे-धीरे जब इ कहानी बहरे फइलल तब प्रशासन मंदिर में ताला लगाइ देहलस. चाबी पुलिस अपने पास रखय लगल. अब एह मंदिर क ताला खाली साफ-सफाई बदे हर सोमवार के खोलल जाला. कुल मिलाइके काशी में करवत क परंपरा पवित्र शहर के उज्वल इतिहास क एक अपवित्र, काला अध्याय हौ. संत कबीर दास भी काशी करवत के खिलाफ अवाज उठउले रहलन-

करवतु भला न करवट तेरी,
लागु गले सुनु बिनती मेरी.
हउ वारी मुखु फेरि पिआरे,
करवटु दे मो कउ काहे कउ मारे.
जउ तनु चीरहि अंगु न मोरउ,
पिंडु परै तउ प्रीति न तोरउ.
(लेखक सरोज कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
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