Bhojpuri Spl: कहे के त सभे केहू आपन... लेकिन सुसाइड के सूचना भी टीवी से मिलेला!

एतना बड़ा कम्युनिकेशन गैप त हिंदुस्तान-पाकिस्तान भा हिंदुस्तान-चीन के बीच भी नइखे. आदमी अपना आपे में सिमट-सिकुड़ गइल बा. डिजिटल युग में त अउरो. तब गाँव से उम्मीद रहे. ओहू में अपना घर-परिवार आ गोतिया-देयाद से, कुछ बेसिए.

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  • Last Updated: March 10, 2021, 3:43 PM IST
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फिल्म गंगा किनारे मोरा गाँव में एगो गाना बा, ‘’ कहे के त सभे केहू आपन, आपन कहाए वाला के बा’’ ... ई गाना हमरा बहुत पसंद बा. ज्ञानपीठ से सम्मानित कवि केदार नाथ सिंह जी से जब हम भोजपुरी सिनेमा के लेके बतियाईं, उहाँ के भी एह गाना के जिक्र करीं. दरअसल लक्ष्मण शाहाबादी जी के लिखल एह गानवा के बोले अइसन बा कि सबका जिनगी में एकरा से पाला पड़े के बा - कहे के त सभे केहू आपन, आपन कहाए वाला के बा.

हमार एगो शेर बा – अइसे त फेसबुक पर बाड़न हजार साथी / संकट में जब खोजाइल, केहू नज़र ना आइल

शहर त बदनाम बड़ले बा. पड़ोसी के सुसाइड के सूचना टीवी पर खबर देखला पर पता चलेला. एतना बड़ा कम्युनिकेशन गैप त हिंदुस्तान-पाकिस्तान भा हिंदुस्तान-चीन के बीच भी नइखे. आदमी अपना आपे में सिमट-सिकुड़ गइल बा. डिजिटल युग में त अउरो. तब गाँव से उम्मीद रहे. ओहू में अपना घर-परिवार आ गोतिया-देयाद से, कुछ बेसिए. लेकिन उहवों झूर के झगरा में सब संवेदना, सब रिश्ता हेराइल जाता, नेह बलुरेती में समाइल जाता.

हमरा किताब ‘’ चलनी में पानी ’’ में एगो गीत बा-
बाँझ हो गइल बा, संवेदना के गाँव

नेह हो गइल बा, बबूरवा के छाँव

प्यार-प्रीत के जमीन रेह हो गइल बा



आत्मा मरल मशीन देह हो गइल बा

लेत केहू नइखे इंसानियत के नाँव !

करे जे अगोरिया से चोर हो गइल बा

देश प लुटेरवन के जोर हो गइल बा

कोरा में के लइका के जाई केने पाँव?

जाति-पाति, धरम के उठेला लहरिया

रोटी बिना लइका के अँइठे अंतड़िया

कउवन के सभवा में होला काँव-काँव !

टुकी-टुकी गउवाँ आ टुकी-टुकी घरवा

घरवो में घरवा आ ओहू में दररवा

'भावुक' जिनिगिया ई लागी कवने ठाँव? '

त सचमुच ई सवाल बन गइल बा कि ई जिनिगिया कवने ठाँव लागी? कोरोना काल में सवाल अउरी कठिन हो गइल बा.

चनेसर चाचा कोरोना महामारी के गरियावत बाड़े. कोरोना के चलते पहिले घर-परिवार में रगड़ा भइल. फेर झगड़ा. कोरोना के जब असर गहराइल त बेटा-भतीजा बहरा से घरे-दुआरे अइले. पहिले घर में कलह शुरू भइल, बाद में ई कलह झगड़ा के रूप लेत खेत-बधार तक पहुंच गइल. नोकरी छूटल त सभे के गाँव-घर के ईयाद पड़ल. आभाव आ तनाव में खेत के बखरा के लेके गड़ल मुर्दा उखड़े लागल. तू केतना कमइलs, का कइलs...हमनी के कुछुओ पता बा से शुरू होके गउंवा के आमवा आ लीचिया केतना में बिका जाला तक बात पहुंचल. शहर आ गाँव के आमदनी के हर-हिसाब के बाद केकर खेत के धइले बा, एकरा प बकझक भइल, फेर झगड़ा शुरू हो गइल. चनेसर आ मधेसर दूनों भाई में कबो अइसन स्थिति ना आइल की जमीन प कड़ी गिरो. बाकिर इहो दिन आइये गइल. कवन डरेर प के गाछ केकरा हिस्सा में आइल आ कवन झूर के बाद केकरा हिस्सा के खेत बा. ई फरियाये लागल. एकरा साथ हीं नेह नाता खातिर दिल में जवन नेह के लासा रहे, ओकरा जगह खीस-पीत के एसिड भरे लागल.

दरअसल, कोरोना के प्रभाव से कराहत शहरी नोकरी पेशा वाला लोग के अब अपना अस्तित्व के रक्षक गाँवे लउकता. पुरनिया लोग कहतो रहे- कतनो उड़बs आकाश, फेर करबs धरती के आस. जब बहरा रोजगार गइल त खेत-बधार लउके लागल. केहू खेत बेचे के जोगाड़ में बा त केहू खेती में नवोन्मेष करे के फिराक में बा. पढ़ल-लिखल तबका गांव वैकल्पिक रोजगार के साधन तइयार करे में लगाल बा. हालांकि ई एगो बढ़िया परिपाटी शुरू भइल बा. शायद एकरा से गांव के भुलाइल गौरव वापस आ जाव.

बाकिर सबसे बड़ समस्या ई बा कि कइगो राज्यन में हदबंदी भा चकबंदी कई दशक से भइले नइखे. जवना के नतीजा ई भइल बा कि परिवार बढ़त गइल आ एकरा अनुपात में जमीन के दायरा सिकुड़त गइल. चकबंदी ना भइला के वजह से धूर आ कट्ठा में जमीन छितरा गइली स. हालात ई हो गइल बा कि अतना छोट-छोट जमीन के टुकड़ा भइल बा कि ओह में ट्रैक्टर से जोताई संभव नइखे आ हर-बैल के प्रचलन त खतमें हो चलल बा. एकरा बादो धूरे-धूर जमीन खातिर लोग एक दोसरा के जान के दुश्मन बनल बाड़े. जवन पर-पटीदार के संगे आपसी भाईचारा होखे के चाही तवन मार-झगड़ा आ केस-मुकदमा के चक्कर में अइसन स्थिति हो गइल बा कि भाई-चाचा से प्रणामा-पाति तक भइल मोहाल हो गइल बा.

लॉकडाउन में दिहाड़ी मजदूरी करे वाला लोग शहर से पलायन क के त गांवे आ गइले. बाकिर एहिजा ना ओह लायक खेत बा कि आजीविका के प्रबंध हो सके, ना एहिजा मजदूरी के ओतना काम बा कि शहर लौटे के सोच के ताखा प रखल जा सके. बाकिर झूर के झगड़ा के बहाने दिल में भरल भड़ास निकल रहल बा आ ई भड़ास जहरे बोवता, त स्वाभाविक बा कि एकरा से जवन फसल होई तवनो जहरीले होई. आ ई जहर खाली अँगना आ दुअरा तक ना प्रभाव डाली बलुक पीढ़ियन के प्रभावित करीं. हमार एगो शेर बा – रोप गइलें बीज बाबा बैर के / सात पुश्तन तक लड़े के हो गइल

का कहीं... बीतल कुछ महीना पहिले एगो प्रतिष्ठित मीडिया घराना के ओर से एगो सर्वे कइल गइल कि कोरोना काल में बहरवासु लोग के लौटला के बाद ग्रामीण भारत में दीवानी मामला में 13 प्रतिशत त फौजदारी मामला में 7 प्रतिशत के बढ़ोत्तरी भइल बा. ई सर्वे बतावता कि अभाव में स्वभाव कइसे बिगड़ेला.

बहुते लोग खाड़ी देशन में जाके नोकरी करत रहले हा, अब उनकर चाहत बा कि गांवहीं कवनो दर-दोकान क के आजीविका के साधन तइयार करस. बाकिर जवना जमीन पर दोकान बनावे के सोचले ओहीमें बवाल खड़ा हो गइल. ना दोकान बनल, ना फेर विदेश नोकरी प गइले. अब असमंजस के स्थिति बा कि ऊ करस त का करस.

दू भाई के झगड़ा में मजो लेवे वाला लोग बा...कुछ लोग त पटीदार प धौंस जमावे खातिर नेता-परेता, वार्ड काउंसिलर, सरपंच, मुखिया, बीडीसी भा अउर दोसर प्रभावशाली आ दबंग लोग के आमंत्रित क के दुआर प मुर्गा-भात के पार्टी देता. एकरा जरिये ई देखावे के कोशिश करsता कि हमरा से अझुरइल त तोहरा प हम भारी पड़ब. बाकिर बात एतने ले नइखे रह जात, दूसरको पक्ष एकर जवाब ओहीं अंदाज में देता. कुल मिला के आज के दृश्य ई बा कि गांव में भा बधार में कहीं ना कहीं अमीन कड़ी गिरावत लउकिये जइहें. भले गेहूं लसराव, चाहे सरसो. लोग के एकर फिकिर नइखे. बस फिकिर बा त एही के कि चार इंच जमीन केने हमार केकरा में घुसल बा.

ई झूर के झगड़ा गांव के माहौल त खराब कइलहीं बा. आपसी रिश्ता-नाता के तार-तार क रहल बा. आंखि के लाज-शरम खतम हो गइल बा. एकरा वजह से गाँव जवन अपना सौहार्द्र आ भाईचारा खातिर जानल जात रहे, ऊ अब कटाह आ डेरावन अड्डा बनल जाता ... कवि कैलाश गौतम जी त पहिलहीं लिख देले रहलें, - ‘’ गाँव गया था, गाँव से भागा’’

बाकिर एह कोरोना काल में जेकरा बाहर में कवनो व्यवस्था नइखे उ भाग के कहाँ जाई. ओकरा शहर आ गाँव में कवनो फरक नइखे बुझात. हमार एगो शेर बा – ‘’ लोर पोंछत बा केहू कहाँ / गाँव अपनो शहर हो गइल ‘’

चाहे रउरा दिल्ली-बम्बे में रहीं भा लंदन-न्यूयार्क में, गाँव, घर-परिवार त दिलोदिमाग में ताउम्र नाचते रहेला जइसे हमरा दिमाग में नाचेला गाँव में होखे वाला घर-परिवार के बीच बँटवारा के दृश्य. माई-बाप के बिखरल खोंता के दृश्य. 24 साल पहिले आइसने एगो दृश्य देखनी आ ई गीत फूटल -

( मनोज भावुक के गीत बिखरल खोंता )

टुकी टुकी बाबूजी के बाग हो गइल

पतझड़ आइल अइसन दुलम साग हो गइल

चूल्हा-चूल्हा कइगो चूल्हा

धनकत सपनन के सब दूल्हा

भइल सपनवा लंगड़ा-लूल्हा

मनवा जब सभकर गरमाइल

उठल लहोक सभे अगिआइल

बाबूजी के घरवा आगे आग हो गइल

टुकी टुकी बाबूजी के बाग हो गइल

बिखरल खोंता माई के नू

भाई भोंके भाई के नू

जिउवा भइल कसाई के नू

मनवा जब सभकर बउराइल

बिषधर मने सभे बिखिआइल

बाबूजी के घरवा नागे नाग हो गइल

टुकी टुकी बाबूजी के बाग हो गइल

बाबूजी के हालत बाटे

दिनवो काटे, रतियो काटे

सभे अपना मन के बाटे

मनवा जब सभकर अरुआइल

काँव-काँव के बोल सुनाइल

बाबूजी के घरवा कागे काग हो गइल

टुकी टुकी बाबूजी के बाग हो गइल

( लेखक मनोज भावुक सुप्रसिद्ध कवि व भोजपुरी भाषा के ग्लोबल प्रोमोटर हैं. )
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