Bhojpuri Spl: जिनगी में माई से बढ़िके माई के इयाद, हर दुख-सुख में आवेला इयाद

संसार के हर संतान के आपन महतारी दुनिया के सभसे सुन्नर-सुभेख आउर महान नज़र आवेली. हमरो माई हमरा निगाह में ओइसने लागेली. बाकिर जब हम होश सम्हरलीं आ जेकरा के आपन 'माई' कहिके बोलावत रहलीं, ऊ हमार माई ना रहली. हालांकि ऊ ममता के मूरत रहली आ माइए लेखा हमरा पर सांच परेम आउर नेह-छोह लुटावत रहली.

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  • Last Updated: February 25, 2021, 2:38 PM IST
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दुनिया में अइसन का बा कि एक बेरि बिला भा हेरा गइला प ऊ फेरु हासिल ना हो सके. एकर बस एकही जवाब बा-माई. जइसे कवनो जीव खातिर राम से अधिका महातम राम के नांव के होला, ओइसहीं माई से बढ़िके माई के इयाद के महिमा बा.एगो कवि के कहनाम बा-

के अपना बछरू के खातिर
मछरी-अस छपिटाई,
रहि-रहि मन परि जाले माई!
हमरा-अस अभागा खातिर त माई के इयादिए में दुनिया-जहान के सरबस सुख बा. बाकिर गुर के सवाद-मिठास के बयान-बखान का कबो गूंग करि सकेला? ना नू !
फेरु महतारी के नेह-छोह आउर ममता के भला सबद भा बानी में कइसे बान्हल जा सकेला! गोसाईं जी कहलहीं बानीं-



जाकी रही भावना जैसी,
प्रभु मूरत देखी तिन तैसी.

भाई सुभाषचंद्र यादव जी के इहो बात सोरहो आना सांच बुझात बा-

जग में माई अइसन केहू सहाई ना होई,
केहू कतनो दुलारी,बाकिर माई ना होई.

तबे नू, भगवान भा कुदरत का बाद भगवान-कुदरत लेखा अगर केहू होला, त ऊ माइए नू होली!

संसार के हर संतान के आपन महतारी दुनिया के सभसे सुन्नर-सुभेख आउर महान नज़र आवेली. हमरो माई हमरा निगाह में ओइसने लागेली. बाकिर जब हम होश सम्हरलीं आ जेकरा के आपन 'माई' कहिके बोलावत रहलीं, ऊ हमार माई ना रहली. हालांकि ऊ ममता के मूरत रहली आ माइए लेखा हमरा पर सांच परेम आउर नेह-छोह लुटावत रहली. हमरा के पाले-पोसे आ हर किसिम के हुलास-उछाह, सुख-सुविधा देबे में उन्हुकर अगहर भूमिका रहल. ऊ हमार बड़की माई रहली आ उन्हुकर नांव रहे मुनीश्वरी देवी. उन्हुकर सासु आपन मए जर-जमीन हमरा बाबूजी का नांवें लिखि देले रहली, काहेंकि ऊ हमरा आजी (मइया) के सहोदर बहिन रहली.

बड़की माई मोसमात रहली आ उन्हुकर आपन कवनो औलाद ना रहे. उन्हुकरा जिनिगी के बड़ा अकथ कहानी रहे. बहुत धूमधाम से बड़का बाबूजी का संगें उन्हुकर हाथ पीयर भइल रहे, बाकिर गवना का पहिलहीं ऊ एगो बेमारी के शिकार होके दम तूरि देले रहलन. बड़की माई पहिले हाली जब अंसवारी में बइठिके ससुरा अइली, त एगो बेवा का रूप में. खाली बियाह के रसम हो गइला के कारन ऊ आपन पहाड़ नियर जिनिगी बड़का बाबूजी के इयाद में गुजारि दिहली. ओह सरगबासी बड़भागी पति के इयाद में, जेकरा से ना कबो भेंट-मुलाकात भइल रहे आ ना कबो सुरतिए आंख-भर देखे के मोका मिलल रहे. उन्हुकर सउंसे जिनिगी बाटे जोहत गुजरि गइल रहे. उन्हुका जिनिगी के अनकहल दास्तान हमरा मरम के अइसन उदबेगले रहे कि हम एगो 'बाट जोहत' शीर्षक से कहानी लिखे खातिर अलचार हो गइल रहलीं

ताजिनिगी अपना आंतर के मए दु:ख-कलेश बिसरा के ऊ शिवाला में शिवजी के पूजा-पाठ में लवसान रहत रहली. हमरा में त उन्हुकर जान-परान बसत रहे आ माई जशोदा लेखा नेह-ममता लुटावत ऊ अपना जिनिगी के सरबस, हमरे के सउंपि देले रहली. उन्हुकर नेह-छोह का हम कबो भुला-बिसरा सकेलीं? कबो ना! बाकिर जइसहीं हम अपना गोड़ पर ठाढ़ होके 'माई ' खातिर किछु करे के काबिल भइलीं, ऊ हमरा माथ प हाथ धइले शिवजी के नांव जपत हरदम-हरदम खातिर आंखि मूंदि लिहली. उन्हुका जिनिगी में कबो किछु पावे के चाह ना रहल. हरदम दिल खोलिके नेह-छोह बांटल आ लुटावल उन्हुकर जिनिगी रहे. सांचो के मुनीश्वरी रहली ऊ.

हमार माई, जे हमरा के अपना कोखी से जनमवले रहली, खाली नांवें के रागिनी ना रहली,बलुक सभ तरह से रागात्मकता से ओत-प्रोत रहली आ मए परिवार के सेवा-टहल उन्हुका जिनिगी के मकसद रहे. उन्हुका नइहर के पढ़ल-लिखल सम्भ्रांत समाज रहे, जवना में पांच बहिन, एक भाई के परिवार में सभ केहुए शिक्षित रहे. हमार मामा बरमेश्वर उपाध्याय ओह इलाका में अकेला बैरिया इंटरमीडिएट काॅलेज,बैरिया में अंगरेजी के जानल-मानल प्रवक्ता रहलन आ चांदपुर-चजपुरा के इलाका में उन्हुकर बौद्धिक लोगन में नीमन धाक रहे.

बाकिर हमरा होश सम्हारे के पहिलहीं हमार माई एह निठुर दुनिया से नेह-नाता तूरिके कूच कऽ गइल रहली आ ओह घरी हमार उमिर महज दू बरिस के रहे. एह बीचे हमार बड़ भाई कांचे उमिर में सरगबासी हो चुकल रहले. बांचि गइल रहली हमार बड़ बहिन कृष्णा कुमारी. हमरा जनम के दू बरिस बाद एगो छोट मूवल बहिन के जनम देते खा, माई दुनिया छोड़ि देले रहली. सउंसे परिवार, टोला-परोस एह सदमा में डूबि गइल रहे.

गाहे-बगाहे माई के गुन-गिहिथान के चरचा घर-परिवार आउर टोल-महल्ला में अक्सर होत रहत रहे. केहू उन्हुका मिलनसार सुभाव आ सेवा-टहल के गुन गावे, त केहू सामूहिकता में जीएवाला उन्हुकर हंसमुख शख्सियत आउर अगल-बगल के लरिका-लरिकिन के पढ़ावे-लिखावे के हुनर के बड़ाई करे. आजी (मइया) के आंखि का सोझा से त उन्हुकर सूरत बिसरते ना रहे. ऊ अकसरहां सुबुकत कहसु-' सासु का सोझा पतोहि दुनिया छोड़ि दिहली, एह से बढ़िके अनहोनी अउर का कहाई! देवी रहली ऊ, पुन्यात्मा रहली, एही से सरगे चलि गइली आ हम बुढ़ारियो में नरक भोगत बानीं. देहि-धाजा त उन्हुकर अइसन रहे कि निमना-निमना लोग के सुनरई के मात दे देसु. हंससु, त गाल में गड़हा परि जात रहे. सबसे सुन्नर रहे उन्हुका मन के सुनरई.

दोसरा के दु:ख उन्हुका से इचिकियो बरदास ना होत रहे आ ऊ जीव-जान से सेवा करे लागत रहली. कसीदाकारी-पढ़ाई में ऊ माहिर रहली आ गीत-मांगर में उन्हुकर मन रमत रहे. ओइसन लोग का कबो मरि सकेला?' किसिम-किसिम के लोग, किसिम-किसिम के बतकही. बाबुओजी के जिनिगी में बुझिला माई अमिट छाप छोड़ले रहली. तबे नू, चढ़ते जवानी में विधुर भइला के बावजूद ऊ फेरु बियाह ना कइलन आ हीत-नात के बहुत दबाव के बादो हम दूनों भाई-बहिन खातिर मयभा महतारी ले आवे से साफे इनकार कऽ देले रहलन.

माई आ बड़की माई-दूनों हमरा खातिर माइए रहे लोग. दूनों एक से बढ़िके एक. पर दुखकातरता आ संवेदनशीलता साइत ओही लोग से हमरा विरासत में भेंटाइल रहे. आजुओ जब हम किसिम-किसिम के मुसीबत के सामना करेलीं आ जब कवनो सभ्य दईंतन के अनेति हमरा के ललकारेला, त एह भकसावन अन्हरिया में माई के इयाद के अंजोरिया हमरा में जीवटता आ आत्मबल भरत साफ-फरिछ राह देखावत रहेले. सचहूं, हमरा खातिर माई से बढ़िके बिया माई के इयाद. (लेखक भगवती प्रसाद द्विवेदी जी वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)
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