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Bhojpuri: गउआं से गायब होता गांधी क गणतंत्र

Bhojpuri: गउआं से गायब होता गांधी क गणतंत्र

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26 जनवरी अउर 15 अगस्त दुइ ठे अइसन तारीख हइन, जवन लड़िका से लेइके बुढ़वा तक, पढ़ा-लिखा से लेइके अनपढ़ा तक, सबके याद रहयला. देश के अस्तित्व से जुड़ल इ दूनों तारीख लोगन के दिल-दिमाग में घुसि गइल हौ.

15 अगस्त, 1947 के देश अजाद भयल, त 26 जनवरी, 1950 के आपन संविधान लागू भयल, देश गणतंत्र बनि गयल. जब अजादी मिलल तब, जब गणतंत्र बनल तब, पूरा देश उत्सव में डूबि गयल रहल. तबय से दूनों तारीख राष्ट्रीय तेवहार बनि गइलन. गांव से लेइके शहर तक हर जाति-धरम क तेवहार. सामूहिक खुशी, सबके सपना अउर उम्मीद क तेवहार. लेकिन जइसे-जइसे सपना, उम्मीद टूटत गइल, तेवहार से लोगन क मन भी टूटत गइल. खास कइके गांवन में.

अजादी क आंदोलन राष्ट्रीय आंदोलन तब बनि पइलस, जब महात्मा गांधी गांव, गांव के लोगन के आंदोलन से जोड़लन. मोहनदास करमचंद गांधी के दक्षिण अफ्रीका से भारत लउटय से पहिले कई नेता अजादी के आंदोलन में जोर लगावत रहलन, लेकिन आंदोलन जोर नाहीं पकड़ि पावत रहल. जादातर नेता शहर क रहवइया बड़-बड़ वकील रहलन, अउर अपने वकालत के खांचा से बहरे सोचि न पावयं. गांधी भी बड़ वकील रहलन, लेकिन आंदोलन सफल करावय वाला दांव उ दक्षिण अफ्रीका में सीखि चुकल रहलन. कांग्रेस के बइठक में अपने पहिलय भाषण में उ कुल वकीलन के सोच पर पानी फेरि देहलन. गांधी कहलन कि अजादी क आंदोलन बड़े शहरन के कुछ वकीलन के बस क बात नाहीं हौ, देश के सात लाख गांवन के जोड़य के पड़ी. गांधी इहय कइलन. आंदोलन सफल भइल, देश अजाद हो गयल. गांव देश के अजादी क अधार बनलन. गांधी के हर कार्यक्रम, हर चिंतन, हर योजना के केंद्र में गांव रहल. गांधी ग्राम गणतंत्र चाहत रहलन, जबकि अजादी के बाद देश गणतंत्र बनल.

गणतंत्र में भी सैद्धांतिक रूप से त इ मानल गइल के तंत्र, गण से बनी, गण ही तंत्र चलाई. गण यानी जनता. लेकिन व्यवहारिक रूप से तंत्र जनता से दूर होत गइल, जनता पर हावी होत गयल. गणतंत्र अपने सिद्धांत अउर उद्देश्य में फेल होइ गयल. तंत्र में गांव के सबसे उप्पर रहय के चाहत रहल, लेकिन गांव सबसे नीचे पहुंचि गइलन. गांव गरीबी, पिछड़ापन, अभाव, अशिक्षा, बीमारी क प्रतीक बनत गइलन. जब बिना गांव के शामिल कइले अजादी क आंदोलन सफल नाहीं होइ पइलस, त गणतंत्र भला कइसे सफल होइ सकयला? देश क आज जवन हालत बा, ओकर असली कारण इहय हौ. लेकिन केहू क ध्यान एह ओरी नाहीं बा. सब भांग के नशा में डूबल बा.

26 जनवरी, 1950 के जब पहिला राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद देश के गणतंत्र घोषित कइलन, त पूरा देश उत्सव में डूबि गयल रहल. हर शहर, हर कस्बा, हर गांव में लोग तिरंगा फहराइ के खुशी मनइले रहलन. गांव-गांव सभा, जुलूस, प्रभातफेरी निकालल गइल. देशभक्ति क गीत-गवनई भइल. खेल-कूद भइलन. लोग चंदा जुटाइ के सलोनी, सरबत, मिठाई बंटलन. बनारस के गांवन में हलुआई लोग अपने तरफ से मिठाई बनाइ के बंटले रहलन. पुरनिया लोग बतावय कि 26 जनवरी के अइसन माहौल रहल जइसे हर आदमी के घरे परोजन पड़ल हौ, सब तन-मन-धन से जुटल रहलन. दर्जी तिरंगा झंडा बनाइ के घरे-घरे बंटलन. एकरे बाद हर साल 26 जनवरी मनावय क परंपरा शुरू होइ गयल. लोग तेवहार से अपुना के जोड़य बदे खादी क कपड़ा पहिनय, गांधी टोपी लगावय, घरे तिरंगा फहरावय, पंगत-भोज आयोजित होय. लेकिन जइसे-जइसे समय बीतत गयल, तंत्र क असली मंत्र असर करत गयल, लोगन क जोश ठंढा पड़त गयल.

बचपन क उ दिन अबही भी याद हौ, जब गांव में घरे क बड़-बुजुर्ग 26 जनवरी, 15 अगस्त के मिठाई खरीद के लियावय, सबके बांटय. लड़िकन के नया कपड़ा सियावय. लड़िका लोग 15 अगस्त, 26 जनवरी क तारीख एक-एक दिन अंगुरी पर गिनयं -अब इ तारीख एतना दिन रहि गयल हौ. धीरे-धीरे गिनती कमजोर होत गइल, परंपरा पीछे छूटत गइल. गांवन में 26 जनवरी, 15 अगस्त क कार्यक्रम बंद होत गइलन. उत्सव क माहौल उदासी अउर एकाकीपन में बदलत गइल. फिर भी गांव क स्कूल, खास कइके प्राइमरी स्कूल 26 जनवरी अउर 15 अगस्त क परंपरा जिंदा रखले रहलन. पढ़वइया लड़िका सबेरय सात बजे नया-नया कपड़ा पहिनि के स्कूली पहुंचि जायं. हेडमास्टर साहब झंडा फहरावय. फिर विद्यार्थिन क अलग-अलग टोली झंडागीत गावत क गांव में प्रभातफेरी बदे निकलि जाय.
’विजयी विश्व तिरंगा प्यारा
झंडा ऊंचा रहे हमारा….’

सात पद वाला इ झंडा गीत श्यामलाल गुप्त ’पार्षद’ सन् 1924 में लिखले रहलन. बाद में कांग्रेस गीत के पहिला, छठा अउर सातवां पद में थोड़ा संशोधन कइके ध्वजगीत के रूप में मान्यता देइ देहलस.

विद्यार्थिन क टोली जब बड़ा क तिरंगा झंडा लेइके एक कतार में जोश के साथे झंडागीत गावत क गांव में घूंमय त पूरा माहौल देशभक्ति से अंगड़ाई लेवय लगय. देहीं से जोश छलकय लगय. गांव में घरे-घरे प्रभातफेरी घूमय, लोग अपने श्रद्धा अउर शक्ति के अनुसार विद्यार्थिन के मिठाई खाए बदे पुरस्कार देयं. प्रभातफेरी क नेतृत्व करय वाला मास्टर पुरस्कार राशि क घोषणा करय, देवय वाले क धन्यवाद करय, टोली आगे बढ़ि जाय. पूरे गांव में घूमले के बाद टोली स्कूल पहुंचय. जवन पइसा मिलल रहय ओहसे मिठाई-नाश्ता क बंदोबस्त होय, विद्यार्थिन में बंटाय, गांव के लोगन के बांटल जाय.

समय के साथे तंत्र क मंत्र अउर टाइट भइल त लोग प्रभातफेरी के तरफ से भी मुंह मोड़य लगलन. न मास्टरन क रुचि रहि गइल, न गांव के लोगन क. धीरे-धीरे प्रभातफेरी क इ परंपरा भी खतम होइ गइल. आज के तारीख में शायदय कवनो गांव होइहय, जहां स्कूली के तरफ से प्रभातफेरी निकालल जात होई, या गांव में गणतंत्र क सामूहिक कार्यक्रम होत होई. स्कूलन में झंडा फहराइ देहल जाला, कहीं-कही छोट-मोट कार्यक्रम भी होइ जालन. बस औपचारिकता निबाहल जाला. टीवी, मोबाइल, इंटरनेट के जुग में कुछ लोग एक-दूसरे के मीम, अउर मैसेज भेजि के 15 अगस्त, 26 जनवरी मनावयलन. बाकी लोगन बदे दूनों राष्ट्रीय तारीख अब बाकी तारीखन जइसन क्षेत्रीय बनि के रहि गयल हयन, जब हर रोज सबेरे उठले के बाद रोटी, कपड़ा, मकान, दवाई अउर रोजगार क सवाल कपार चकरावय लगयला.

(सरोज कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

Tags: Bhojpuri Articles, Mahatma gandhi, Republic day

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