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Bhojpuri में पढ़ें महंगाई डाइन केतना खाई!

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का जमाना रहल, का होइ गयल, अउर कहां तक जाई, कुछ पता नाहीं। महंगाई डाइन अबही केतना खाई, कुछ पता नाहीं। जब कमाई ही नाहीं बा, मनइन के खाए के नाहीं जुटत बा त महंगाई डाइन के कहां से मिली। लेकिन डाइन त भूखल न रही, न कुछ मिली त मनइन के ही खाई।

  • News18Hindi
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जब इ फिलिम निकलल रहल, उ का नाव रहल -पीपली लाइव। फिलिम भले ही सब न देखले होय, लेकिन एकर गाना हर कोई सुनले गुनगुनइले होई -मोरे सइयां त बहुतय कमात हय, महंगाई डाइन खाए जात है। एह गाना में सइयां कमात रहलन, बल्कि बहुतय कमात रहलन, तब जाइ के डाइन खात रहल। सइयां के कमाई पर केतना गुमान बा एह गाना में। लेकिन अब इ गुमान गायब होइ गयल हौ।

कमाई क हालत आज इ बा कि अगर सरकार क मुफत राशन वाली योजना न होत त बहुत लोगन के घरे में चूल्हा न जरत। भूखल मरि जातन। करौना क अइसन आफत आइल कि नोकरी-चाकरी क झंझटय खतम कइ देहलस। ओइसे भी पहिले के जमाने में नोकरी-चाकरी के सबसे निकृष्ट मानल जात रहल। यानी जमाना प्रगति पर हौ। लेकिन बिना पइसा के कवन प्रगति पहाड़ चढ़ी। आज के जमाना में त बिल्कुलय नाहीं। लेकिन पइसा कहां से आई जब नोकरियय नाहीं बा। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनामी (सीएमआईई) बतावत बा कि अगस्त महीना में देश में बेरोजगारी क दर बढ़ि के 8.32 प्रतिशत होइ गइल। जुलाई में बेरोजगारी क दर 6.96 प्रतिशत रहल। पंदरह लाख भइया-बाबू लोगन क एकय महीना में घस से नोकरी चलि गइल। जेकर नोकरिया बचल बा, ओहू के पूरा पगरिया नाहीं मिलत हौ। मार्च 2020 में पहिलका लॉकडॉउन लगल, तबय मालिक लोग पगार काटि देहलन। उ पगार अबही तक नाहीं लउटल बा। अब केहूं-केहूं क लउटि आयल होय त नाहीं कहि सकित, लेकिन जादा लोगन क अबही कटियय के मिलत हौ। अब जब पुरनकय पर नाहीं लउटल त बढ़य क बात भूलाइ जा। लेकिन महंगाई त डाइन हौ, एह से उ बढ़ल जात बा। सइयां के बाद अब सजनी के भी खात बा।

महंगइया के नापय बदे दुइ ठे सूचकांक बनल हौ। खुदरा महंगाई नापय बदे उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) अउर थोक महंगाई नापय बदे थोक मूल्य सूचकांक (डब्लयूपीआई) बा। अब उपभोक्ता मूल्य सूचकांक कहत बा कि खुदरा महंगाई दर अगस्त में तनी सा लुरबुराइ गइल। फिर कुछ भाई लोग ढोल पीटय लगलन। जुलाई में जवन 5.59 प्रतिशत रहल, अगस्त में उ 5.30 प्रतिशत होइ गइल। लेकिन एतना के घटले से केहूं के रचिकौ बूझायल बा का? नाहीं, अइसन केहूं नाहीं बा जे कहि देय कि हां, हमय फरक पड़ल बा। त फरक काहें नाहीं पड़ल? इ बात केहूं के समझ में आइल?

दरअसल, जवने समानी के सस्ता भइले से इ सूचकंकवा तनी सा लुढ़कल बा, उ बजारी से खरीदही के नाहीं बा। हमरे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के कृपा से मुफत में हर महीना गेहूं-चाउर मिलत बा, देश के 80 करोड़ लोगन के। त जवन समान मुफत में मिलत बा, ओकर बजारी में केव पुछवइया नाहीं बा। एही से अनाज एह समय सस्ता भइल बा। उहय हालत सब्जी क भी बा। मौसम में एतनी सब्जी होइ गइल कि केव खरीदवइया नाहीं बा। जब कमाई ही नाहीं बा त के तीन ठे रोज सब्जी खाई? लोग एक से काम चलावत बायन। किसानन क गठरी कटि गइल। एतना लागत लगाइ के साग-सब्जी पैदा कइलन, लेकिन गाहक नदारत बायन। कुल सब्जी खेतय में बरबाद होत बा, या त सड़की पर फेंकात बा। लेकिन इ हालत हदरम न रही। दसय-पांच दिना में जब खेतवा क सब्जिया खतम होइ जाई अउर कोल्ड स्टोरवा से निकलि के आवय लगी त इहय सब्जिया फिर असमाने पहुंचि जाई।

अनाज अउर सब्जी के अलावा जवन समान बजारी से खरीदल जात हौ, ओकर हाल का बा? हर समानी क दाम असमान छूअत बा। तेल-घी, मास-मछरी, दाल, दवाई कुल महंगा होइ गयल बायन। हर महीना दाम बढ़त बा। सरसों क तेल, पेट्रोल-डीजल में त आग लगल बा। पुराने जमाने में एक ठे गाना निकलल रहल -पकौड़ी बिना चटनी कइसे बनी। आज के जमाने में गाना बनी कि -पकौड़ी बिना तेल कइसे छनी। पकौड़ी खइले केतना जने के जमाना बीति गयल बा। मरद लोगन क मन भी होला त होम मिनिस्टरी घुरुकि के चुप कराइ देला -दुइ सौ रुपिया लीटर सरसों क तेल, अउर चलल हयन पकौड़ी खाए, जीभ चार हाथे क भइल बा। आज के जमाने में के हौ पकड़ौ खात?

इहय हाल मोटरसाइकिली क भइल बा। पहिले दरय 100 मीटर भी जाए के रहय त भुर्र से चालू कइके पहुंचि जात रहलन। गांव-गिराव में केतना भाई लोग कुल्ला-फरागत भी मोटरसाइकिलय से करय जाय। हलांकि अब गांवन में जादातर शौचालय बनि गयल हयन, लेकिन अबही भी बहुत गांवन में लोग बहरी अलंग ही पसंद करयलन। केतना जने के घरे शौचालय बा तबौ उ मैदानय जइहय। ओन्हय बंद कोठरी में उतरबय नाहीं करत। अइसन तमाम लोग मोटरसाइकिली क सहारा लेवय लगल रहलन। लेकिन अब सबकर शौखीनी अंदर चलि गयल बा। एक ठे हरियरकी पत्ती देबा त एक लीटर टंकी में भराई। हलांकि अब नीला रंग क भी नोट निकलि गयल बा। अब 10 काम जुटाइ के लोग बजारे जालन, ताकि एकय संगे सब काम निपटि जाय। बार-बार पेट्रोल न फूंकय के पड़य। लेकिन एतना कुल किफायत कइले के बाद भी जुरत नाहीं हौ। जब कमाई ही नाहीं बा त कइसे जुरी? सरकार बा कि उत्पाद शुल्क घटउतय नाहीं बा।

अब जवने हिसाब से महंगाई हौ, ओही हिसाब से कमाई भी रहय त न अखरी। लेकिन जब महंगाई पहाड़ जइसन बा, अउर कमाई लोढ़ा नियर, त कइसे गाड़ी चली? देश के 97 प्रतिशत लोगन क कमाई घटि गइल बा, 23 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे पहुंचि गयल बायन। साल भरे के भीतर 150 रुपिया से कम कमाए वालन क संख्या देश में छह करोड़ से बढ़ि के 13 करोड़ होइ गइल बा। मध्य वर्ग से 3.2 करोड़ लोग निकलि के गरीब होइ गइलन। इ कुल सोर उपरय वाला रस्ता देखात हौ। करौना कत्तौ क नाहीं छोड़ले बा। महंगाई डाइन त बटलय बा खाए बदे। कुल मिलाइ के हालत सही नाहीं हौ। लेकिन करय बदे बस में भी कुछ नाहीं बा। बस तेल देखा अउर तेले क धार देखा।

(सरोज कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं, लेखे में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

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