Bhojpuri: साइकिल चलाईं, सेहत बनाईं, पर्यावरण आ पइसा बचाईं!

मोटापा के बेमारी से सउंसे जनजीवन तबाह होखत बा. कमो उमिर के बाइक-स्कूटी चलावेवाला लरिका-लरिकी मोटापा के शिकार होखे लगले सन. पेट्रोल आउर डीजल के दमघोंटू धुआं से कई किसिम के रोग-बियाधि होखे लागल आ प्रदूषित वातावरन में जीअल मोहाल हो गइल. अइसे में साइकिल ही एगो उपाय बा, सबसे मुक्ति पावे के.

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करीब पनरह-सोरह साल पहिले के बात ह. एकाएक बिहार के सड़क पर नया-नया साइकिल लउके लगली स. स्कूल पोशाक में सजल-धजल लरिकी जब पीठ प बस्ता बन्हले साइकिल चलावत लउकऽ स,त सभ केहू अचरज से ओनिए ताके लागे. का गांव, का कस्बा आ का शहर -सभत्तर पढ़े ओली लरिकिन के सरकार बतौर तोहफा साइकिल देले रहे-साइकिल से स्कूले जा आ पढ़ि-लिखिके नांव कमा! फेरु त पढ़ाई करेवाली बिटियन के तादाद लगातार बढ़े लागल रहे.

ओकरा पहिले त अइसन बुझात रहे कि साइकिल के सवारी के एकदम लोपे हो जाई. जब पिछली सदी के आखिरी दशक में भूमंडलीकरण-बाजारवाद के दौर आइल, त पहिले के फटफटिया, मोटरसाइकिल का बाद बाइक कहाए लागल रहे आ एकाएक तमाम साइकिलधारी बाइकधारी बनि गइलन. मए कंपनी लोन प बाइक देबे लगली स आ चार्वाक नीति 'जब ले जीअऽ,सुख से जीअऽ, करजा काढ़िके घीव पीअऽ' पर दनादन अमल होखे लागल रहे. नतीजा ई भइल कि एक से बढ़िके एक सभ गुन आगर बेशकीमती बाइक बाजार के शोभा बढ़ावे लगली स, जवन रंग-रूप, माॅडल आ कीमत में चरपहिओ के मात देबे लगली स. फेरु त शादी-बिआह में दहेज में बाइक मंगाए-दिआए लागल. ओकरा पहिले तिलक-दहेज़ में साइकिले देबे के चलन रहे.

बाकिर जब डीजल आ पेट्रोल के दाम आसमान छूवे लागल,त लोगन के माथा ठनकल. बाइक के सवारी के चलन जब बढ़ल रहे,त नवही लोग हरेक काम बाइके से करे लागल रहे. इहां ले कि दू डेग चलिके तरकारी भा दूध ले आवे के होखे, तबो बाइक नधा जात रहे. एको डेग पैदल चलल गवारा ना रहे. नतीजा ई भइल कि मोटापा के बेमारी से सउंसे जनजीवन तबाह होखे लागल. कमो उमिर के बाइक-स्कूटी चलावेवाला लरिका-लरिकी मोटापा के शिकार होखे लगले. पेट्रोल आउर डीजल के दमघोंटू धुआं से कई किसिम के रोग-बियाधि होखे लागल आ प्रदूषित वातावरन में जीअल मोहाल हो गइल. पैदल ना चलला के कारन चिनिया रोग (डाइबिटीज) जकड़े लागल. रक्तचाप आउर दिल के मरीजो के तादाद लगातार बढ़े लागल. गिरहत्तो लोग खेत-बधार बाइके से जाके घास के बोझा ओही प लादिके ले आवे लागल. हाट-बाजार सभ किछु बाइके से होखे लागल. फेरु त गंवई लोगो ओह रोगन के चपेट में आवे लागल. नतीजतन सउंसे दुनिया खातिर ई आरामतलबी आ एकरा कारन उपजल बेमारी चिन्ता के विषय बनि गइल.

मनई के सेहत आ प्रकृति के सेहत जब अतना बिगड़त गइल कि संसार के मेडिकल आ मनोवैज्ञानिक चिकित्सक मनुजता के बचावे खातिर आगा अइलन आ ओह लोग का संगें पोलिश अमेरिकी समाजशास्त्री आउर ट्रैक साइकिलिस्ट लेसेक सिबिलिस्की के बेरि-बेरि पहल कइला का बाद अप्रैल, 2018 में संयुक्त राष्ट्र संघ ई घोषणा कइलस कि हरेक साल तीन जून के 'विश्व साइकिल दिवस' के रूप में मनावल जाई. तब जाके सउंसे दुनिया के साइकिल के महातम मालूम भइल रहे आ कुदरत आउर जनमानस के सेहतमंद जिनिगी खातिर संजीवनी साइकिले के मानल गइल रहे. वजह ई बा कि साइकिल चलावेवाला के हाथ,गोड़, पेट से लेके सउंसे शरीर के कसरत एके संगे हो जाला आ कई गो रोग से निजात मिलेला. हर्रे लागे ना फिटिकिरी आ रंगो चोखा हो जाला. साइकिल चलाके ऑफिस जाईं, बाजार -हाट करीं भा मटरगश्ती करीं. ना पेट्रोल-डीजल के दाम के फिकिर,ना पर्यावरण-प्रदूषण के खतरा. रोग-बियाधि से सहजे मुकुती आ डॉक्टर-अस्पताल के चिन्ता से
निफिकिर. आम के आम आ अंठिलिओ के दाम!

साइकिल के दू सइ साल के जातरा बड़ा रोमांचकारी रहल बा. सभसे पहिले सन् 1817 में एकर निरमान जर्मनी के वैज्ञानिक कार्ल वाॅन ड्रैस कइले रहलन. फेरु एमें आस्ते-आस्ते कई गो बदलाव आवत गइल रहे आ 1890 आवत-आवत
अमेरिका-यूरोप के लोग साइकिल के दीवाना हो गइल रहे. बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में अपना देश में साइकिल के चलन शुरू भइल रहे आ ओह घरी इक्का-दुक्का लोग बड़ा सवख के साइकिल के सवारी करत रहे. तब साइकिल चालक के लोग कौतुक से देखे आ सोचे कि हमरो लगे एगो साइकिल रहित! फेरु एकर क्रेज बढ़ल आ तिलक-दहेज़ में ई सवख से अनिवार्य रूप से दिआए लागल.

लरिकाईं में हमरो साइकिल चलावे के बहुते ललसा रहे. हमार संघतिया दिनेसर चाचा जब नया साइकिल किनले, त हमरो के आगा बइठाके गांव से एक कोस दूर मिडिल स्कूल, रेवती ले जाए लगले. ऊ खूब बढ़िया साइकिल चलावसु आ हम आगा के डंटा प बइठल रहीं. कबो-कबो साइकिल चलावत ऊ पाछा कैरियर प बइठे के कहसु आ चलत साइकिल पर बइठत खा हम गिरिओ जाईं, बाकिर फेरु धूरि झारत बइठि जाईं. एक हाली जब हम आगा के डंटा प बइठल रहलीं, ऊ तेज साइकिल चलावत बतकही में अइसन अझुरइले कि साइकिल तरकारी के ओड़ा कपार पर लेले चलल जात एगो तुरहिन से लड़ि गइल. मेहरारू बेचारी ओड़ा लेले धड़ाम से गिरवी,हमहूं साइकिल लेले-देले अइसन गिरलीं कि बायां हाथ झूले लागल आ महीनवन हाथ में कमची बन्हाइल रहे.

बाकिर तबो साइकिल चलावे सीखे के उछाह कम ना भइल. पहिले कइंची साइकिल चलावे सिखलीं.फेरु सीट पर बइठिके चलावे सीखत घरी भहराके गिरलीं आ हाथ-गोड़ घवाहिल कऽ लिहलीं. बाकिर तबो साइकिल चलावे आ डबल सवारी खींचे के हुलास-उछाह कम ना भइल. ओह घरी साइकिल के क्रेजे अइसन रहे! सांच पूछीं त ओह घरी के सउंसे समाज साइकिलमय हो गइल रहे. मिडिल स्कूल में एगो संस्कृत पंडी जी रहनीं. उहांके बहुत दूर से आईं आ साइकिल चलावत-चलावत पसेने-पसेना हो जाईं. साइकिल के उहांके 'द्विचक्र वाहन ' कहत रहनीं.बाकिर स्कूटर-मोटरसाइकिलो त दुपहिए वाहन होलन स. ओह घरी स्कूटर के पढ़ल-लिखल बौद्धिक समाज के सवारी मानल जात रहे आ मोटरसाइकिल के सड़कछाप लोगन के. आगा चलिके सोच में बदलाव आवत चलि गइल.

ओह घरी 'मइया मोरी,मैं नहीं माखन खायो','मइया, मोहे दाऊ बहुत चिढ़ायो' आ 'मइया, मोरी कबहीं बढ़ेगी चोटी' जइसन सूरदास के पद नियर लरिका अपना बड़ भाई से निहोरा करऽ स-

भइया मोहि साइकिल चढ़न सिखायो!
हम बालक बहियन को छोटो,
हैंडिल छुअत न पायो!
कैंची चलावत रास न आयो
सीट प देहु चढ़ायो!

दुनियावी महामारी के मौजूदा दौर में साइकिल आजु फेरु चरचा में आ गइल बिया. सामाजिक दूरी, आवागमन के सवारियन के कमी, शरीर में प्रतिरोधक ताकत आ फिटनेस के उतजोग साइकिल से सहजे हो जात बा. एही से आपन बेशकीमती सवारी अब लोगन के रास नइखे आवत आ साइकिल चलवला के खूब सुफल मिलि रहल बा. तबे नू पिछिला साल अपना देश में डेढ़ करोड़ के करीब साइकिल बनली स,जवना में अस्सी फीसदी त पंजाबे से अइली स. अबोध लरिकन के खेलौना साइकिल से लेके एक से बढ़िके एक स्पोर्ट्स साइकिल आजु चरचा में बाड़ी स. किछु सूबा में त विधायको लोग के साइकिल के सौगात मिलल रहे, जवना ईको फ्रेण्डली सवारी से सदन में जाके ऊ जनता खातिर मिसाल पेश करसु.
नीदरलैंड, कोपेनहेगन, जापान, चीन, फिनलैंड नियर देश साइकिल के सवारी के इस्तेमाल कऽके दुनिया के आंखि के पट्टर खोलले बाड़न स. बिहार के त एगो लरिकी लाॅकडाउन में अपना बेमार बाप के साइकिल प बइठाके हजारों किलोमीटर दूर शहर से गांव में ले आइलि आ अपना बहादुरी, पितृभक्ति के दिसाईं एगो इतिहास बना दिहलस-जहां चाह उहां राह.

साइकिल चलावेवाला भड़ो प साइकिल लेके चलावेलन. किछु शहर में त साइकिल चलावे खातिर अलगा से साइकिल ट्रैको बनावल गइल बा. रउओं आईं, ईको फ्रेण्डली साइकिल के सवारी के दिल से अपनाईं, सेहत बनाईं, कुदरत के आ खुद के पर्यावरण प्रदूषण से बचाईं. सेहतमंद समाज के निरमान आ शिक्षा के प्रसार में आजु साइकिल के सवारी के भूमिका अनमोल बा. ई अनमोल धरोहर मौजूदा दौर में पहिले से कहीं ज्यादा प्रासंगिक बा, काहे कि आजु एकर उपादेयता पहिले से कहीं ज्यादा, बहुत बेसी बा. एह से आपन आ समाज के जिनिगी संवारीं, करीं साइकिल के सवारी! (भगवती प्रसाद द्विवेदी वरिष्ठ साहित्यकार हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)

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