भोजपुरी में पढ़ें- पंचायत चुनाव में भट्ठी सेल्समैन के भूमिका बहुत बड़ बा

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लड़ाई भिड़ाई एह बात से शुरू भइल कि ओह दिन मलिकार के दुआर पर सोमरस के बोतल लेके मलिकार के सामनहीं काहे पहुंच गइले हा? पप्पू बतावत रहलन कि तू इशारा कइल. बबलू कहत बाड़न कि तू अपने पहुंचले हा.

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  • Last Updated: April 25, 2021, 5:30 PM IST
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आजकल गांव में त्रिस्तरीय पंचायत के चुनाव चलत बा.एक दिन होत भिनशहरे बबलू चौधरी आ पप्पू तेली बगेश्वर काका के दुआर पर भीड़ गईल हा.पप्पू के महतारी राधिका देबी क्षेत्र पंचायत के चुनाव लड़त बाड़ी.पप्पू के लागत बा खाली बोतल के बल पर चुनाव जीतल जा सकेला. पर्चा दाखिला के दिने केहु प्रस्तावक ना मिलत रहें,तब आपन पड़ोसी भोला गोड़ के पास गइले. भोला गोड़ बाजार में मोटीहाई के काम करेलें. पप्पू आ भोला के बीच तय ई भइल कि भोला काम छोड़ी के तबे पप्पू के महतारी के प्रस्तावक बनिहे जब भट्ठी पर चली के पहिले पप्पू उनका के भरपेट सोमरस के पान करैहें. पर्चा दाखिला के काम एह आपसी समझौता से कइसहूँ पूरा भइल. अब जब चुनाव प्रचार के बारी आइल हा, तब एक झमेला ई शुरू भइल कि पप्पू के महतारी अभी तक घर के चौखट से बाहर नइखी निकलल.केहू से ज्यादा हेलीमेली भी नइखे रहल. उनका के केहु जानतो नइखे. कवनो खास बात बेवहार, लेन देन भी नइखें.हालांकि एक जमाना में इनकार पुरखा लोग गांव के बड़का साहू रहें.गांव के ठाकुरबाड़ी आ गांव के मिडिल स्कूल,आ गांव के कइगो इनार ई साहू परिवार के देन रहें. पप्पू आ उनकर महतारी गांव में नवरसिहा ह लोग.बाकी एक जमाना एह परिवार के काफी रसूख रहें,धन दौलत आ मान मर्यादा भी खूब रहें.पप्पू हाल में जुआ में काफी पैसा जीतले रहलन हा.जब पैसा सधी जाला तब पप्पू गांव के एगो पेट्रोल पंप पर नौकरी करें लागे लें.हाथ में जब कुछ पैसा आ जाइ,तब फेर दारू जुआ के अपना पुरनका लत में लाग जालन. एक तरह से पूरा निठल्ला के जिंदगी बिना पारिवारिक आ सामाजिक सरोकार के परवाह किये.अब पप्पू के लागत बा कि सोमरस के बोतल के बल पर चुनाव जीतल जा सकेला.चुनाव के बहुत पहिले ही पप्पू दीयर के एगो डेरा पर जुआ में जीतल पैसा से सोमरस खरीद के बबलू आ उनकर साथी लोगन के पार्टी दे चुकल रहलन. सोमरस जोम कुछ अकबक बोलन त हाई ब्लड प्रेशर के रोगी हेमन चौधरी दु लपड़ लगा भी देले रहलन.बबलू एह समय अपना जाति के अघोषित चौधरी बाड़न. सोमरस के शरूर में पप्पू से वादा कइले रहलन कि चुनाव में तहार मदद होइ.बाकी चुनाव एन वक़्त पप्पू आ बबलू चौधरी के बीच पहिलका करार एह से टूटल हा कि पप्पू एक दिन आठ नौ बजे रात के बबलू चौधरी के मलिकार के दरवाजा पर कमर में सोमरस के बोतल खोंसले पहुंच गइलन हा. खुद त सोमरस लगवले ही रहलन. चाहत ई रहलन कि बबलू के मलिकार के पैर पर सोमरस के बोतल राखी के आशीर्वाद ले लीं. बबलू ,पप्पू के ई हरक़त देखी के लजा गइलन. काहे कि बबलू ई ना चाहत रहलन कि उनका बीच भइल गोपनीय करार के एह बेकद्री के साथ पर्दाफाश हो जाए.जब पप्पू सोमरस के शरूर में कुछ ज्यादा हरक़त करें लगलन आ बबलू जे अबतक बिना नशा में रहलन, ना बर्दास्त भइल त पप्पू के उनकरा घर तक चहेट अइलन.दु दिन बाद पप्पू होत भिनशहरे वोट मांगत बगेश्वर काका के दुआर पर दिखाई देलन हा. लड़ाई भिड़ाई एह बात से शुरू भइल कि ओह दिन मलिकार के दुआर पर सोमरस के बोतल लेके मलिकार के सामनहीं काहे पहुंच गइले हा? पप्पू बतावत रहलन कि तू इशारा कइल. बबलू कहत बाड़न कि तू अपने पहुंचले हा.मलिकार से हमरा डर लाज नइखे का कि हम अइसन करब.बबलू कहले कि तहार मोटर साइकिल ना कुचनी आ चार लपड़ लगवनी ना. ओह दिन इहे बाकी रहें. तहारा मां की साकी नाका,तहार रिजल्ट त हम आजे निकाल देब. आपन निरीहता आ ओसे ज्यादा गुस्सा से बबलू चौधरी के चेहरा सुर्ख़ लाल हो गईल. सबके सामने बतावें लगलन कि एकर महतारी कहत बाड़ी कि अपने दिन भर दारू पीके घुमत बा आ हमरा से कहत बा कि तू चुनाव प्रचार कर.हम केकरा के जानत बानी कि हम अकेले प्रचार करीं.अयुरी ना त कलकत्ता से अपना भौजाई के बोलवा लेले बा.ओकरो के केहू नइखे जानत.अब बताव कि अइसना में कवन चुनाव लड़ल जाइ?पप्पू के पाले एकर कवनों जवाब नइखे. असल बात ई बा कि पप्पू जानत बाड़न कि क्षेत्र पंचायत के चुनाव जीतल आ जुआ के बड़हन बाजी जीतल लगभग बराबर बा. कम से कम दू बार ठीक ठाक पैसा मिलीं जाइ.ब्लॉक प्रमुख के चुनाव आ स्थानीय निकाय के विधान परिषद के चुनाव में.एकरा बाद एह चुनाव के कवनों मतलब नइखे.एह त्रिस्तरीय चुनाव में सरकारी पैसा के हिस्सेदारी खातिर सब लोग खूब बढ़चढ़ के हिस्सेदारी करत बा. लोकसभा आ विधानसभा चुनाव एकरा सामने फेल बा.बहुत संभव बा लोकसभा विधानसभा के चुनाव भी एही पैटर्न पर होखें लागे. तब पता ना देश के लोकतंत्र के कतना कबाड़ा होइ. पंचायत शब्द के साथ भलें देश के प्राचीनता अउर मिठास जुड़ल बा. गांधी जी के भलें पंचायती राज के बारे में ई परिकल्पना रहें कि सच्चा लोकतंत्र केंद्र में बैठे हुए बीस व्यक्तियों द्वारा नहीं चलाया जा सकता उसे प्रत्येक गांव के लोगों को नीचे से चलाना होगा.आज कल गांव के हालत ई बा कि हर गांव में दारू मुर्गा आ पैसा के बिना कवनों वोट पक्का नइखे मानल जात.सन् 1830 ब्रिटिश गवर्नर सर चार्ल्स मेटकाफ गांव समाजों के बारे में लिखते हैं कि ये गांव समाज छोटे छोटे प्रजातंत्र हैं. गांव समाज का यह संघ छोटा सा स्वतंत्र राज्यतंत्र होता हैं. गांव के लोग उसके अंतर्गत बड़ी मात्रा में स्वतंत्रता और स्वाधीनता का उपभोग करते हैं. गाँधी जी की राय में एक आदर्श समाज राज्य रहित लोकतंत्र होता हैं.आदर्श अवस्था में कोई राजनीतिक सत्ता नहीं होती,क्यों कि राज्य का अस्तित्व नहीं होता. ई त पंचायती राज्य के आदर्श स्थिति के कल्पना रहें. आजकल गांव में खासकर पंचायत चुनाव के समय जवन स्थित देखात बा उ अगर लियोनेल कर्टिस के शब्दों में कहें तो घूरे का ढ़ेर ही नज़र आ रहे हैं. भले गावों के बारे में कर्टिस ई बात आलोचना करत कहलें होखस. पता ना सरकार के अइसन पंचायती व्यवस्था अब कतना उम्मीद बा.जवना संस्था के कल्पना लोकतंत्र के नींव के नीचे से मजबूत करें खातिर भइल रहें, ओकरा बारे में रघुबीर सहाय के एगो लाइन याद आवत बा ..लोकतंत्र का अंतिम क्षण है कहकर आप हँसे..अब नया किस्सा यह कि बबलू गांव पंचायत चुनाव के चार दिन पहिले ही गांव वाली भठी बन्द हो जाई.चुनाव लड़े वाला सब उम्मीदवार लोगन के भठी के सैल्समैन अगवाहे सुचना दे दे ले बा.एह सूचना से चुनाव लड़े वाला से लेके समर्थक लोगन के ई चिंता परेशान कइले बा कि बाकी दिन के इंतजाम कइसे होइ.पक्का वोट पावें के जवन गारंटी रहें ओकरा एवज अब पैसा के डिमांड बढ़ जाइ.आ ओकरे आसरा प अब चुनाव के दारोमदार बा. बाकी भाग्य के फैसला जब होई तब होई.


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