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Bhojpuri: मन ना रंगाय, रंगाय जोगी कपड़ा

Bhojpuri: मन ना रंगाय, रंगाय जोगी कपड़ा

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आजु से अनेकन साल पहिले ई महान संत जौन शिक्षा देले बाड़े, आज भी ओतने सांच बा आ हमेशा सांच रही. काहें से कि सच बात के कौनो काल खंड ना होला. सच बात कालजयी होखेले. कहल जाला कि संत कबीर के भी मन में, संत थायुमानवर के प्रति बहुते श्रद्धा रहे.

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मैसूर में एगो बहुत बड़ महात्मा रहलन संत थायुमानवर. ऊ भोजपुरी भाषी लोगन के बड़ा मानसु. बहुते आदर करसु. कारण? उनुकर मान्यता रहे कि काशी क्षेत्र बहुते पवित्र ह, जहवां अनेक संत- महात्मा, योगी, ऋषि- मुनि के चरण धूलि परत रहेला. चूंकि काशी क्षेत्र में आ आसपास भोजपुरी बोले वाला लोग रहेला त ऊहो लोग पवित्र बा. आ ओह घरी अध्यात्म में रुचि राखे वाला भोजपुरिया लोग भी मैसूर जाके उनुका से भेंट करे, उनुरकर आशीर्वाद लेउ. संत थायुमानवर मन के कंट्रोल पर एगो बड़ा सुंदर कविता लिखले बाड़े. एइजा हम ओही कविता के भोजपुरी अनुवाद दे रहल बानी-

तूं मदमस्त हाथी के वश में क सकेल,

तूं रीछ आ बाघ के मुंह बंद क सकेल,

शेर के सवारी क सकेल आ नाग का संगे खेल सकेल,

तूं कौनो भी धातु के सोना में बदल के जीविका कमा सकेल,

तूं अदृश्य होके पूरा सृष्टि के भ्रमण क सकेल,

देवता लोगन के आपन दास बना सकेल, हमेशा खातिर जवान रहि सकेल,

तूं पानी पर चल सकेल आ आग में रहि सकेल,

बाकिर मन के नियंत्रण एह कुल्ही से श्रेष्ठ आ ढेर कठिन बा.

आजु से अनेकन साल पहिले ई महान संत जौन शिक्षा देले बाड़े, आज भी ओतने सांच बा आ हमेशा सांच रही. काहें से कि सच बात के कौनो काल खंड ना होला. सच बात कालजयी होखेले. कहल जाला कि संत कबीर के भी मन में, संत थायुमानवर के प्रति बहुते श्रद्धा रहे. दक्षिण भारत में भी रहि के एगो संत भोजपुरी माटी के प्रति एतना बड़ा विचार राखता, ई त खास बात बा. संत थायुमानवर के ई धारणा रहे कि भोजपुरी क्षेत्र के जे भी आध्यात्मिक व्यक्ति होला ऊ कभी झूठ बोलिए ना सकेला आ ऋषि पतंजलि अष्टांग योग के जौना यम, नियम के पालन करे वाला होला. कई बार लागेला कि संत थायुमानवर का लगे भोजपुरी क्षेत्र के श्रेष्ठ लोग जात होइहें आ उनुका संगे सत्संग करत होइहें. भोजपुरिया लोगन में जौन प्रेम तत्व होला, ओकर केहू अंत ना पा सकेला. अनहद प्रेम के पर्याय ह भोजपुरिया लोग. तबे त एतना बड़ संत के मन में ओह लोगन के प्रति एतना उच्च कोटि के विचार रहे.

एने भगवद्गीता के छठवां अध्याय में भगवान कृष्ण जब अर्जुन से मन पर नियंत्रण करेके कहतारे त अर्जुन चकित हो जातारे. ओकरा बाद कहतारे-

चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्.
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्..6.34..
(हे कृष्ण ! मन बहुते चंचल, मथि देबे वाला, जिद्दी आ ताकतवर (बलवद्दृढम्) बा. ओकरा पर कंट्रोल कइल वायु (सांस) पर कंट्रोल कइला नियर बा.)

त अगिला श्लोक माने 35 वां श्लोक मे भगवान कहतारे-

असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलं.
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते..6.35..

(हे महबाहो (अर्जुन) एमें कौनो संदेह नइखे कि मन बड़ा चंचल होला आ कठिनता से वश में होखेला, बाकिर हे कुंतीपुत्र अभ्यास आ वैराग्य के द्वारा ओकरा के वश में कइल जा सकेला.)

ओने ऋषि पतंजलि कहतारे – योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः (चित्तवृत्तियन के निरोध (रोकि दीहल) ही योग ह). ऋषि पतंजलि कहतारे कि हमनी का चित्त (मन के एगो अवस्था) में तमाम तरह के वृत्ति रहेली सन. हमनी में से ढेर आदमी के चित्त में वासना, इच्छा आ विकार भरल बा. एह वृत्तियन के जब तकले ना रोकल जाई, भगवान से योग ना होई. अनुभव ईहे कहता कि ऋषि पतंजलि ठीके कहतारे. ई त सभे जानता कि मन बानर (बंदर) नियर चंचल होखेला. ओकरा के कंट्रोल करे चलब त ऊ अउरी चंचल हो जाई. आन्हीं- बतास नियर दउरे लागी. बाकिर चिंता के बात नइखे. ऋषि- महात्मा लोग ओकर उपाय बता के गइल बा लोग. कुछ टेकनिक भा प्रविधि दे के गइल बा लोग. ओही में से एगो प्रविधि क्रिया योग ह.

एने ईशावास्योपनिषद कहता-

ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् .
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम् ..

(जड़-चेतन प्राणियन वाली ई समस्त सृष्टि परमात्मा से व्याप्त बिया. मनुष्य एकर पदार्थन के आवश्यकतानुसार भोग करे, बाकिर ई भाव राखे कि ई कुल हमार ना ह. भोग करीं, बाकिर ई समझि के कि ई भोग नश्वर बा.)

ओने संत कबीरदास कहले बाड़े-

“मन ना रंगाय, रंगाय जोगी कपड़ा…..”

कबीरदास नियर पाखंड पर चोट करे वाला कम कवि बाड़े. मन रंगा सकेला, एही से कबीरदास के जोर रहे कि पहिले मन के पक्का रंग में रंगे के चाहीं. तब ओकरा पर दोसर रंग ना चढ़ी. कपड़ा पर दोसर रंग चढ़ि सकेला, बाकिर मन पर एक हाली पक्का रंग चढ़ि गइल त ऊ जन्म जन्मांतर ले चढ़ल रही.

एक हाली रमण महर्षि से एगो भक्त पुछले- मन एतना चंचल काहें बा? त रमण महर्षि कहले- साधारण मनुष्य के मन विषय वासना में लिप्त रहेला, एही से चंचल रहेला. बाकिर तूं मन ना हउव. मन उदय होला आ अस्त होला. ई अस्थायी आ अनित्य ह, जबकि तूं नित्य हउव. मन अनित्य बा, आ तूं नित्य आ शास्वत बाड़. एह ज्ञान से मन पर नियंत्रण हो जाई. भक्त पुछले कि एकरा खातिर हम का करीं? त रमण महर्षि कहले कि मन के विषय- वासना से हटाव आ हृदय में भगवान के उपस्थिति के अनुभव कर, ओपर ध्यान कर.

रमण महर्षि भी कहले बाड़े कि अभ्यास से ही मन पर नियंत्रण हो सकेला. केहू चाहे कि किताब पढ़ि के, प्रवचन सुनि के मन पर नियंत्रण हो जाई, त ऊ संभव नइखे. अभ्यास कइला पर ही मन पर नियंत्रण संभव बा. आ ई एक- दू दिन में ना होई. महीना पर महीना, साल पर साल लागि जाला. बाकिर जे अभ्यास करी, ऊ सफल भी हो जाई. लेखक, पाल ब्रंटन समेत कई गो विदेशी जिज्ञासु रमण महर्षि से प्रभावित रहे लोग. आज भी रमण महर्षि के विदेशी भक्तन के बाहुल्य बा.

आ अंत में उपनिषद के बात-

मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः.

बन्धाय विषयासंगो मुक्त्यै निर्विषयं मनः ॥

(बंधन आ मोक्ष के कारण माइंड ह. विषय- वासना में बान्हाइल बा त बंधन आ कौनो वासना नइखे त मुक्त बा).

(विनय बिहारी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

Tags: Bhojpuri Articles, Bhojpuri News

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