Bhojpuri: एक अंगरेज के संस्कृत-प्रेम क प्रतिफल हौ बनारस क संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय

जोनाथन डंकन 1788 में बनारस क रेजीडेंट यानी अधीक्षक बनि के अइलन. ओनकर जिम्मेदारी शिशु हत्या पर दस्तावेज तइयार करय में मदद करय क रहल. एही दौरान ओन्हय काशी के महातम क बोध भयल अउर उ इहां 1791 में एक ठे संस्कृत पाठशाला क स्थापना कइलन. बाद में 1795 में उ बंबई क गवर्नर बनि गइलन.

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भारत में अंगरेजी राज क 200 साल अत्याचार अउर लूट बदे बदनाम रहल हौ. लेकिन कई अंगरेज अधिकारी इहां भारतीय भाषा-संस्कृति के रक्षा-सुरक्षा बदे अइसन काम कइलन कि आज भी ओनकर नाव आदर-सम्मान से लेहल जाला. अइसय एक अंगरेज अधिकारी रहलन जोनाथन डंकन. देश में संस्कृत शिक्षण क पहिला संस्थान डंकन क ही देन रहल. डंकन क बोअल बिरवा आज पूरा पेड़ बनि गयल हौ. संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के छांव में न जाने केतना विद्यार्थी विद्वान बनि गइलन. जोनाथन डंकन 1788 में बनारस क रेजीडेंट यानी अधीक्षक बनि के अइलन. ओनकर जिम्मेदारी शिशु हत्या पर दस्तावेज तइयार करय में मदद करय क रहल. एही दौरान ओन्हय काशी के महातम क बोध भयल अउर उ इहां 1791 में एक ठे संस्कृत पाठशाला क स्थापना कइलन. बाद में 1795 में उ बंबई क गवर्नर बनि गइलन.

डंकन ओह समय क गवर्नर जनरल लार्ड कार्नवालिस के बनारस में संस्कृत पाठशाला खोलय के पीछे दुइ ठे कारण बतइले रहलन. पहिला, संस्कृत भाषा क पठन-पाठन जारी रही, अउर प्राचीन वैदिक शिक्षण व्यवस्था क संरक्षण होई. दूसरा, संस्कृत पाठशाला से निकलल पंडित धर्म-शास्त्र से संबंधित मसला निपटावय में न्यायाधीशन क मदद करिहय. कार्नवालिस के बात समझ में आइ गइल अउर उ पाठशाला बदे 20 हजार रुपिया सालाना क बजट मंजूर कइ देहलन. पाठशाला क पहिला प्रधानाध्यापक अउर शिक्षक पंडित काशीनाथ तर्कालंकार रहलन. साल 1798 में पाठशाला में कुछ आर्थिक विवाद पैदा भयल, जवने के नाते सात साल तक पाठशाला बंद रहल. साल 1805 में पाठशाला फिर से शुरू भयल. पाठशाला अब बनारसर संस्कृत कॉलेज बनि गयल अउर 1830 में इहां संस्कृत के साथ अंगरेजी क भी पढ़ाई शुरू होइ गइल. कॉलेज क पहिला प्राचार्य जॉन म्योर नियुक्त कइ गइलन. साल 1857 में इहां स्नातकोत्तर क भी पढ़ाई शुरू होइ गयल. अबही तक कॉलेज में परीक्षा मौखिक रूप् में होत रहल. लेकिन 1880 से इहां लिखित परीक्षा क व्यवस्था शुरू भइल. कॉलेज क प्रसिद्ध ’सरस्वती भवन ग्रंथालय’ क निर्माण 1894 में भयल.

प्रोफेसर राल्फ ग्रिफिथ 1861 में कॉलेज क प्राचार्य नियुक्त कइ गइलन. ग्रिफिथ के कार्यकाल के दौरान कॉलेज नई ऊंचाई छुअलस. ग्रिफिथ संस्कृत क बहुत बड़ा विद्वान रहलन. उ वैदिक संस्कृत विभाग क प्रोफेसर रहलन. ग्रिफिथ तीन साल तक कठिन मेहनत कइ के ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद अउर अथर्ववेद के साथ ही वाल्मीकि रामायण, कालिदास रचित कुमारसंभव क अंगरेजी में अनुवाद कइलन. एकरे बाद जाॅर्ज थिबाट जब संस्कृत कॉलेज क प्राचार्य बनलन तब भारतीय दर्शनशास्त्र के अध्ययन पर तेजी से काम शुरू भयल. वेदांत दर्शन के विश्वमंच पर पहुंचावय क श्रेय थिबाट के ही जाला. गंगानाथ झा 1918 में संस्कृत कॉलेज क पहिला भारतीय प्राचार्य बनलन. गंगानाथ झा संस्कृत क उच्चकोटि क विद्वान रहलन. झा के ही कार्यकाल में सरस्वती भवन ग्रंथमाला क प्रकाशन अउर सरस्वती भवन अध्ययन क शुरुआत भइल. एकरे बाद तंत्रशास्त्र क विद्वान महामहोपाध्याय पंडित गोपीनाथ कविराज 1923 में संस्कृत कॉलेज क प्राचार्य बनलन. कविराज विशिष्ट संस्कृत सामग्री क अनुवाद अउर दुर्लभ पांडुलिपि के सूचीबद्ध-श्रेणीबद्ध करय में बड़ा योगदान देहलन.

बनारस संस्कृत कॉलेज के विश्वविद्यालय क दर्जा देवावय क कोशिश 1937 में भी कयल गयल रहल, लेकिन राजनीतिक उथल-पुथल के दौर में सफलता नाहीं मिलि पइलस. बनारस शहर के बीच में मौजूद संस्कृत कॉलेज फिर भी अपने पठन-पाठन, शोध के जरिए बुलंदी छुअत रहल. कॉलेज क नाव देश ही नाहीं पूरी दुनिया में गूंजत रहल. देश के अजादी मिलले के बाद जब डॉ. संपूर्णानंद उत्तर प्रदेश क मुख्यमंत्री बनलन तब 1956 में वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय अधिनियम विधानसभा में पास भयल, अउर 22 मार्च, 1958 के बनारस संस्कृत कॉलेज औपचारिक रूप से वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय होइ गयल. डॉ. ए.एन. झा विश्वविद्यालय क पहिला कुलपति नियुक्त कइ गइलन. चूंकि कॉलेज के विश्वविद्यालय बनावय में संपूर्णानंद क बड़ा योगदान रहल, एह के नाते उत्तर प्रदेश राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम 1973 के तहत 16 दिसंबर, 1974 के एकर नाव बदलि के संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय कइ देहल गयल.

हलांकि इ संस्कृत कॉलेज जब विश्वविद्यालय नाहीं बनल रहल, तब भी विश्वविद्यालय के ही तर्ज पर काम करत रहल. साल 1947 से 1958 तक इहां नियमित तौर पर दीक्षांत समारोह आयोजित भयल रहल. देश क अउर नेपाल क तमाम संस्कृत कॉलेज बनारस संस्कृत कॉलेज से संबद्ध रहलन. पंडित कुबेरनाथ शुक्ला सरकारी संस्कृत कॉलेज क अंतिम प्राचार्य रहलन. विश्वविद्यालय क मान्यता मिलले के बाद उ विश्वविद्यालय क पहिला कुलसचिव नियुक्त कइ गइलन.

राज्य स्तरीय संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से मौजूदा समय में देशभर क कुल 602 संस्कृत कॉलेज संबद्ध हयन. विश्वविद्यालय में फिलहाल पांच फैकल्टी (वेद-वेदांग, साहित्य संस्कृति, दर्शन, श्रमण विद्या, आधुनिक ज्ञान विज्ञान) अउर 23 विभाग चलत हयन. विश्वविद्यालय अपने पठन-पाठन अउर शोध के जरिए आज भी भारतीय संस्कृत वांगमय क अलख दुनिया में जगावत हौ. प्रोफेसर हरेराम त्रिपाठी के तीन साल बदे विश्वविद्यालय क नया कुलपति नियुक्त कयल गयल हौ. (सरोज कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)

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