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Bhojpuri में पढ़ें बसंत पंचमी विशेष: आज के दिन से ही गांव में शुरू हो जाला फगुआ के दौर

धरती के हरियाली आ धानी, पीली रंग के खुशबू के बीच से होत, जब फगुनाहटा हवा अपना जोम में चलेला,तब खाली कोयल के कूके मनभावन ना लागे, किसान मन भी डोले लागेला आ अमूमन कंठ से फगुआ के बोल फूट पड़ेला. जाडा के ठिठुरन के बाद जीव, जंतु जानवर सबमें नया जीवन के संचार महसूस कइल जा सकेला.

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बसन्त पंचमी के दिन से गांव देहात में फगुआ के शरुआत मानल जाला. विद्या के देवी सरस्वती के जनमोत्सव मनावें के परंपरा भी बसन्त पंचमी से चलल आवता. बसन्त ऋतु के ऋतुराज भी कहल जाला.एह ऋतु के एक विशेषता इहो ह कि जहां एक ओर धरती पीले रंग के चादर ओढ़ी के आपन असली छटा वीखेरेली, आस पास के हर चीज में रस के संचार हो जाला.ठूठ, सुखल पेड़ पौधन के डाली में हरियाली आ जाला.

धरती के हरियाली आ धानी, पीली रंग के खुशबू के बीच से होत, जब फगुनाहटा हवा अपना जोम में चलेला,तब खाली कोयल के कूके मनभावन ना लागे, किसान मन भी डोले लागेला आ अमूमन कंठ से फगुआ के बोल फूट पड़ेला. जाडा के ठिठुरन के बाद जीव, जंतु जानवर सबमें नया जीवन के संचार महसूस कइल जा सकेला. अइसने ऋतु में कवि कालिदास के कल्पना उड़ान भरेला,आ गांव देहात में हर बुढ़वा देवर आ हर उमर के हर औरत भवजी नज़र आवेली.गांव में बसन्त पंचमी के दिन छवर पर धजा बदलें,रोट चढ़ावे आ ताल ठोके ,बाना बनेठी सैफ भांजे, लगोंट पहिंनी के अपना समउमिरिया के संग जोर आजमाइश करेके परम्परा हाल हाल तक कायम रहल हा. अब नइखे.

आजो याद आवत बा कि बसन्त पंचमी के एक हफ्ता पहिले से छवर पर धजा बदले खातिर आ फगुआ के शरुआती ताल ठोके खातिर गांव के सीताराम सिंह,जिनका के पूरा गांव पटेल साहेब नाम से ज्यादा जानत रहल ,घर घर से चंदा इकट्ठा करिहें.रात के केहुके दुआर पर चाहे मंदिर पर जुटी के पूरा गांव के लोग फगुआ गाई बजाई . जाति विरादरी के कवनों भेद भाव ना देखात रहें,बाकी बड़ छोट के संगे उठे बइठे लाज लिहाज,कदर लोग खूब करें.देखल जा त गांव में ई गोल,गवनई, बैठकी सामाजिक भेदभाव के मिटावें,आ रेखियाउठान वाली पीढ़ी के लोकलिहाज,बात व्यवहार,अदब सिखावें के ट्रेनिंग के जगह भी होत रहें,आ मनोरंजन के साधन भी.अब गांव में उ बात नइखें,जहां एक संगे बइठि के ठाकुर साहेब, सामा दुबे आ रामसकल गोंड गांजा के दम लगावें,फेर झाल ढोलक पर पंचम सूर में पूरा मौज से फगुआ के राग भी अलापें.सोशल मीडिया के जोर गांव गांव तक अइसन फलल बा कि कवनों तरह के सूचना आ जानकारी खातिर गूगल गुरु हर जगह मौजूद बाड़न.नवका पीढ़ी के गूगल गुरु पर अजबे भरोसा भी बा. कुछ हद नशा की तरह.

सोशल मीडिया के मतलब एकाकी जीवन हो गइल बा.ओकरा अलावा जीवन में जइसे कवनों अउर रस नइखे रहीं गईल.फगुआ के बोल त पंचम सूर में कंठ से तब निकली,जब जीवन में कवनों उत्साह उमंग रहीं.एगो कमरा के कोना में आ खाली लैप टाप के स्क्रीन पर पूरा जीवन कैद हो जाई, तब अइसन नीरस जिनगी के सुखल सोता से भक्ति के कवनों गीत चाहें होलियाना मिजाज में होली के कवनों बोल ना फूटी.तब ई ना उम्मीद कइल जा सकें कि मुनेश्वर बाबा, ठाकुर साहेब के होली के उठान आ श्रीकिशुन चाचा, लल्लन चाचा, सामा दुबे, रामसकल गोंड, अउर रामदत्त प्रजापति जइसन पछहरिया के आवाज के टान आ पिहिक कबो याद रहें चाहें सुनाई दें.दरअसल रहें उ सब भक्ति गीत, जइसे गोपियां आपन दुखड़ा कृष्ण के सुनावत कहत बा,..मोके जाये के रहिया बताव ऐ हरि,सगरी रहिया रंग से भरी.. जब लक्षमन जी के बान लागल तब रामचन्द्र जी गुहार लगावत बानी..है कोई संत सुजान संजीवन आनन लाई..हर इलाका में होली के राग अलाप , बोल ठाट रंग रूप अलग अलग हो जाला.

बनारस, मथुरा बृंदाबन अउर बरसाने के होली के मनावें के रंग मिजाज,ढंग अलगअलग बा. बृंदाबन में बाँके बिहारी के मंदिर में बसन्त पंचमी के दिन से पूरा एक महीना तक होली के त्योहार मनावल जाला. बरसाने के लठ मार होली जगत प्रसिद्ध बा.बनारस में ..डिमिक डिमिक डमरू कर बाजे, प्रेम मगन नाचे भोला. के थिरकन के दृश्य एह ऋतु मेंआँख के सामने तैरे लागेला..कहीं कन्हैया संगे चल गोरिया आज खेले होली..पर सितारा देवी का उ भाव नृत्य..कहीं कबीर के नाम पर अश्लील जोगीरा के मुक्त कंठ से गीत. काशी हिंदू विश्वविद्यालय के अंतेवासियों के बीच गाली गलौज की प्रतियोगिता, बसंत पंचमी के दिने बी एच् यू के स्थपना दिवस पर पूरी तैयारी आ सजधज के साथ निकलत झांकी याद आवेला, त होली के दिन अस्सी के कवि सम्मेलन भी खूब याद बा,जवना के तैयारी बसन्त पंचमी से ही शुरू हो जाए.

ई सब गीत गवनई,नृत्य संगीत,जोगीरा वैगरह एह खातिर होत रहें ताकि सालभर मन में जमल भड़ास बाहर निकाल जा,आ लोगबाग उन्मुक्त भाव से एक दूसरा से मिल बेवहर सकें.भूले के ना चाहीं एह गीत गवनई,भजन कृतन आ तुलसी बाबा के रामायन के जरिये ही गिरमिटिया लोग मॉरीशस, फिजी,सूरीनाम में भारत के सभ्यता संस्कृति आज तक बचा के रखले बा.कहे के मतलब ई बा कि आज के सूचना क्रांति के दौर में अपना एह धरोहर के मिटे संकट पैदा होखल जाता.एह अनमोल धरोहर के बचावें के बड़का जिम्मेवारी अब नवका पीढ़ी के कंधा पर आ गईल बा.एह जिम्मेदारी से ई पीढ़ी अब बचे के कोशिश करीं तब इतिहास कबो ए पीढ़ी माफ ना करीं. (लेखक मोहन सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं.)

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