Bhojpuri: सातू के सोन्ह सवाद आ सतुआन, पढ़ीं का बा एकर दास्तान

आजुए का दिने भगवान भास्कर मकर राशि में दाखिल होलन. एह से तिलक, बियाह,जनेव वगैरह के शुभ मुहूरत शुरू हो जाला आ अशुभ सूचक खरवांस खतम हो जाला. बाकिर एह शुभ बदलाव के जसन किसिम-किसिम के व्यंजन आ पकवान बनाके ना कइल जाला. आजु के दिन त सातू के महातम के दिन ह. एकरो एगो वैज्ञानिक कारन बा.

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  • Last Updated: April 14, 2021, 2:30 PM IST
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हरेक साल बेगर कवनो फेरबदल आ बदलाव के चौदह अप्रैल के दिन सतुआन परब का रूप में मनावल जाला. आजुए का दिने भगवान भास्कर मकर राशि में दाखिल होलन. एह से तिलक, बियाह,जनेव वगैरह के शुभ मुहूरत शुरू हो जाला आ अशुभ सूचक खरवांस खतम हो जाला. बाकिर एह शुभ बदलाव के जसन किसिम-किसिम के व्यंजन आ पकवान बनाके ना कइल जाला. आजु के दिन त सातू के महातम के दिन ह. एकरो एगो वैज्ञानिक कारन बा. मीन से मकर में आइल सुरुज के तासीर में तपिस आ जाला आ ऊ धरती पर अंगार बरिसावल शुरू कऽ देलन. ओह असह ताप के तोड़ हऽ सातू.

एकरा जरि में बा कुदरत से मिलल नवान्न के पूजन आ सेवन.

रबी के फसिल में दलहन के अहम भूमिका होला. ओहू में बहुउपयोगी होखेला बूंट (चना). बूंट के साग,कचरी, घुघुनी, होरहा का बाद जब पाकल फसिल कटइला, दंवइला पर अनाज घरे आवेला,त बूंट,जौ,लेतरी के घोनसारी में भूंजिके सतमेझरा सातू पिसाला. बगइचा से आम के टिकोढ़ा तूरिके आवेला. पिआजुओ कोड़ाके नया-नया घर में आ गइल रहेला.

फेरु आम के चटनी आ पिआजु का संगें सातू सानिके खाए के सवाद के का कहे के!
लिबरी घोरीं ,पिंड़ी गटकीं भा घोरुआ बनाके पिहीं, एकरा ठंढा तासीर के का कहे के! सातू खइला पर खूब पियासिओ लागी आ पानी पीयत रहबि,त लूह ना लागी. आम के पकाके पन्नो बनाके गरमी से निजात पा सकेनीं आ बगली में पिआजुओ राखिके गरमात मौसम से मुकबिला कऽ सकेनीं.

बाकिर सतुआन के सातू अइसहीं ना खाइल जाला. पहिले होत फजीरे गंगा में भा अउर गांव के नदी,पोखरा,कुंड में नहाके सुरुजदेव के जल चढ़ावल जाला, फेरु नवका गूर, घीव में जौ के सातू मीसिके भगवान भास्कर आ ग्रामदेवता के पूजा चढ़ावल जाला. गरीब-गुरबा आ जरूरतमंद के दान -दछिना दियाला.ओकरा बाद जाके सातू, आम के चटनी आ पिआजु के नेवान कइल जाला.

सातू के गंवई जनजीवन से चोली-दामन के नेह-नाता होला. सतुआन नायाब सातू के महिमा बखाने के दिन होला. किछु साल पहिले नवही लोगन में ई गीतिओ खूब मसहूर भइल रहे-



बलिया जइहऽ, हमें लेले जइहऽ

कोरा में बइठाइके

सतुअवा खिअइहऽ हो करेजऊ!

नवान्न बूंट आ ओकरा से बनल दाल आ सातू के सवाद का कबो भुलाइल जा सकेला? एकरा दाल से बनल दलपूरी के नांव लेते मुंह में पानी आ जाला. सातू के गुन के त बखान कइले ना जा सके-

सतुइया रे,

तोर गुन गूथबि माला!

भोजपुरियन के पहिचान लिट्टी-चोखा से होला, जवन फुटेहरी का रूप में देस-दुनिया में सराहल जाला. अगर तवा पर बनाईं, त सातू भरल मकुनी कहाई. किछु लोग भोजपुरिया समाज के सातूखोर कहिके रिगावेला, बाकिर इहे सातूखोर हर जगहा

आपन बल-बेंवत-हुनर के जलवा देखाके सभ केहू के नतमस्तक कऽ देलन. आजु काल्ह पेट के तमाम बेमारी, गैस्ट्रिक, चीनिया रोग में राम बान इलाज सातू के घोरल लस्सी से होला.

सोचीं, पुरनकी पीढ़ी कतना निफिकिर होके जातरा पर निकल जात रहे.बस,कान्ह प झूलत रहे गमछी में सातू. जहंवां भूखि लागत रहे,इनार-पोखरा भा चांपाकल का लगे बइठिके गमछिए में सातू सना जात रहे आ हीक भर पानी पीके कवन गांछ का नीचे गमछी बिछाके सुस्तात रहे. अगर गमछी में सातू सानत खा हवा बहे लागे आ किछु सातू उधिया जाउ,त लोग हंसी करत ओके पितरन के चढ़ा देउ. फेरु त ई कहाउत मसहूर हो गइल-'उधियाइल सातू

पितरन के!'

सतुआन खुशहाली के परब ह. एह में नमन आ आभार परगट कइल जाला-प्रकृति का प्रति, नदी-ताल-पोखरा का प्रति, भगवान भास्कर का प्रति, धरती माई का प्रति आ अनाज उपजावेवाला किसान-मजूर का प्रति.

शुभ के सिरीगनेस के प्रस्थान बिंदु ह सतुआन, जवन सरधा भाव के सूचक होला आ ई निकृष्टतो में आनंद आ पौष्टिकता के भान करावेला. परंपरा आ लोकसंस्कृति के जियतार थाती ह सतुआन, जवना के अपना आ जोगा के सामाजिक समरसता के सहज-सरल रूप आउर हरदम बनावटीपन से दूर जमीनी जुड़ाव के संकलप लिहल जा सकेला. (लेखक भगवती प्रसाद द्विवेदी वरिष्ठ साहित्यकार हैं)
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