Bhojpuri: बांग्ला के मोहक उपन्यासकार रहन शरतचंद्र, बड़ी चाव से पढ़ेला लोग!

साधारण परिवार, शहर से बहुत दूर प्रकृति के गोद में, नदी, फेड़- रुख आ खेत- बगइचा के बीच के जीवन उनुका कथानक में जीवित हो जाला, जीवंत हो जाला. औरतन के बारे में शरत चंद्र बहुत ढेर लिखले बाड़े. इंटरमीडिएट पास कइला का बाद 18 साल के उमिर में उनुकर पहिली रचना रहे- “बासा”.

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बांग्ला के सुप्रसिद्ध उपन्यासकार शरतचंद्र एतना डूबि के लिखत रहले ह कि पाठक कब जादुई ढंग से उनुका पात्रन के संसार में दाखिल हो जाला, पते ना चलेला. आजुओ उनुकर लिखल उपन्यास गहिर चाव से पढ़ल जाला. उनुकरे किताब पर फिल्म “देवदास” कई गो भाषा में कई बार बन चुकल बा. हिंदी में अब तक “देवदास” फिल्म तीन बार बन चुकल बिया. उनुका के सर्वकालिक आ सबसे अधिका लोकप्रिय कहल जाला. शरतचंद्र ग्रामीण बंगाल के अपना लेखन में पूर्णता से समाहित कइले. साधारण परिवार, शहर से बहुत दूर प्रकृति के गोद में, नदी, फेड़- रुख आ खेत- बगइचा के बीच के जीवन उनुका कथानक में जीवित हो जाला, जीवंत हो जाला. औरतन के बारे में शरत चंद्र बहुत ढेर लिखले बाड़े. इंटरमीडिएट पास कइला का बाद 18 साल के उमिर में उनुकर पहिली रचना रहे- “बासा”. समकालीन पुरुष प्रधान समाज भा पितृसत्तामक समाज में स्त्री के स्थिति पर बहुत साफ आ ईमानदारी से लिखले बाड़े. धर्म के नांव पर सामाजिक भेदभाव, अन्याय आ अंधविश्वास के अपना लेखन के केंद्र में राखि चुकल बाड़े.

शरतचंद्र के जनम -15 सितंबर 1876 का दिने हुगली जिला के देवानंदपुर गांव में भइल रहे. पिता- मोतीलाल चट्टोपाध्याय, माता- भुवन मोहिनी देवी. पत्नी के नांव- अनिला देवी. अपना बाप- महतारी के नौ गो संतान में से ऊ दुसरका नंबर के संतान रहले. उनकर बचपन देवानंदपुर में बीतल बाकिर जीवन के करीब 20 साल भागलपुर में रहले.

बिहार के भागलपुर में शरतचंद्र के ननिहाल रहे. नाना केदारनाथ गांगुली के मानिक सरकार मुहल्ला में आपन मकान रहे. उनकरा परिवार के गिनती सभ्रांत बंगाली परिवार के रूप में होत रहे. पिता मोती लाल चट्टोपाध्याय बेफिकिर स्वभाव के रहले आ कौनो नोकरी में टिक ना पवले. नतीजा भइल कि घनघोर अभाव उनुका के चारो ओर से घेर लिहलसि. कौनो उपाय ना देखिके अपना लइकन- फइकन के साथे मोती लाल चट्टोपाध्याय देवानंदपुर छोडि दिहले आ भागलपुर अपना ससुरारी में रहे लगले.

शरतचंद्र इंटर पास कइला का बाद ग्रेजुएशन में नांव लिखवले बाकिर आगा ना पढ़ि पवले ग्रेजुएशन के पढ़ाई बीचे में छूटि गइल. बचपन से रवींद्रनाथ टैगोर आ बंकिमचंद्र के खूब चाव से पढ़त आइल रहले. उनुकर परान साहित्य में बसत रहे. भागलपुर में शरतचंद्र, साहित्य-सभा के स्थापना कइले. सभा के मुखपत्र हस्तलिखित मासिकपत्र ‘छाया' रहे. त लेखकीय लक्षन ओही घरी से जोर मारे लागल रहे. दस्तावेज खंघारला पर एकरो उल्लेख मिलता कि सन 1900 में ऊ कौनो बात पर अपना पिताजी से खिसिया गइले आ घर छोड़ि के चलि गइले. थोरहीं दिन बाद उनुकर पिताजी के देहांत हो गइल. पिता के श्राद्ध कर्म कइला का बाद सन 1902 ई. में शरतचंद्र अपना मामा लालमोहन गंगोपाध्याय के पासे कलकत्ता चलि अइले. लाल मोहन गंगोपाध्याय कलकत्ता हाईकोर्ट के वकील रहले. उनके घरे रहिके ऊ कुछ हिंदी के किताबन के अंग्रेजी अनुवाद करे लगले जौना के एवज में उनुका के तीस रूपया महीना मिले लागल. ओही घरी ऊ “मंदिर” शीर्षक से कहानी लिखले आ एह कहानी के 'कुंतोलिन' नांव वाली प्रतियोगिता में भेजि दिहले. प्रतियोगिता में शरतचंद्र विजयी भइले आ उनुका के कुंतोलिन पुरस्कार मिलल. जीवन के विविध रंग से परिचय खातिर शरतचंद्र में एगो छटपटाहट रहे. शायद एही से शरतचंद्र भारत के सर्वाधिक अनूदित लेखकन में गिनाले.
अब शरतचंद्र के बारे में कुछ रोचक बात सुनीं. रोजगार के तलाश में शरतचन्द्र, बर्मा (एह घरी बर्मा के नांव म्यांमार बा) चलि गइले आ ओइजा लोक निर्माण विभाग में क्लर्क के रूप में उनुका के काम मिलि गइल. कुछ समय बर्मा रहिके कलकत्ता लौटला का बाद लेखन के लेके ऊ बहुते गंभीर हो गइले. रात- दिन लिखसु. ओही में डूबल रहसु.

प्रसिद्ध उपन्यास “श्रीकांत” ओही घरी लिखले. बर्मा में उनकर संपर्क बंगचंद्र नांव वाला एगो आदमी से भइल. बंगचंद्र बड़ा विद्वान रहले बाकिर खूब शराब पियसु. लोग कहेला कि शरतचंद्र आपन उपन्यास “चरित्रहीन” बंगचंद्र के देखिए के लिखले. एह उपन्यास में मेस जीवन के वर्णन बा आ मेस के नौकरानी से प्रेम प्रसंग के बहुते रोचकता से प्रस्तुत कइल गइल बा.

एगो अउरी रोचक घटना सुनीं. शरत जब एक बार बर्मा से कलकत्ता अइले त आपन कुछ रचना कलकत्ता में अपना एगो दोस्त के पासे छोड़ि दिहले. शरतचंद्र के बिना बतवले उनुकर दोस्त ओमें से एगो रचना "बड़ी दीदी" एगो पत्रिका में छपे के दे दिहले. “बड़ी दीदी’ के 1907 में धारावाहिक प्रकाशन शुरु हो गइल. छपते लोगन में शरतचंद्र बहुत लोकप्रिय हो गइले. लोग उनुकर रचना पढ़े खातिर उत्सुकता से प्रतीक्षा करे. बहुत लोगन के इहो शक भइल कि शायद रवींद्रनाथ आपन नांव बदलिके लिखतारे. आपन रचना छपे के खबर शरतचंद्र के साढ़े पांच साल बाद मिलल. चूंकि ई रचना उनकरे नांव से छपत रहे त उनुकर प्रसिद्धि फइलत चलि गइल. जौना मित्र का लगे शरतचंद्र आपन रचना छोड़ि गइल रहले ऊहो बहुत ईमानदार आ सच्चा मित्र रहले. बाकिर शरतचंद्र के उपन्यास "चरित्रहीन" के छपे में बड़ा दिक्कत भइल. “भारतवर्ष” के संपादक कविवर द्विजेंद्रलाल राय कहले कि ई उपन्यास सदाचार के ख़िलाफ़ बा. एकरा के हम ना छापि पाइब.



शरतचंद्र के जीवनी पर लिखल विष्णु प्रभाकर के किताब “आवारा मसीहा” एगो प्रामाणिक आ लोकप्रिय रचना ह. विष्णु प्रभाकर त अब एह संसार में नइखन. बाकिर एक बेर दिल्ली में विष्णु प्रभाकर एह पंक्तियन के लेखक से कहले रहले कि “आवारा मसीहा” लिखे खातिर प्रामाणिक दस्तावेज खोजे खातिर उनुका दर- दर भटके के परल. बाकिर अंतत: ई किताब लिखि के उनुका परम संतोष होता.

शरतचंद्र बहुते उपन्यास लिखले बाड़े. कई जगह उनुका 25 गो उपन्यासन के उल्लेख बा. बाकिर ईहो कहे वाला लोग बाड़न कि शरतचंद्र एकरो से ढेर उपन्यास लिखले बाड़े. उनुका उपन्यासन में- बड़ी दीदी, बिराज बहू, पल्ली समाज, चंद्रनाथ, पंडित महाशय, देवदास, चरित्रहीन, श्रीकांत (चार खंड में- श्रीकांत-1,श्रीकांत-2, श्रीकांत-3, श्रीकांत-4), निष्कृति, गृहदाह, देना पावना, नव विधान, पथेर दाबी, शेष प्रश्न, विप्र दास, शुभदा आ शेष परिचय के आज भी लोकप्रियता कम नइखे भइल. 'पथेर दाबी' बंगाल के क्रांतिकारी आंदोलन पर केंद्रित उपन्यास ह. शरतचंद्र के उपन्यासन के कई गो भारतीय भाषा में अनुवाद भइल बा. शरतचंद्र के कुछ उपन्यास पर आधारित हिंदी में कई बार फ़िल्म बन चुकल बा. सन 1974 में इनका उपन्यास 'चरित्रहीन' पर आधारित फ़िल्म बनल रहे. पहिली फिल्म- देवदास सन 1936 में, दूसरी देवदास 1955 में आ तीसरकी फिल्म देवदास 2002 में बनल. एकरा अलावा 1953 में परिणीता, 1974 में चरित्रहीन आ 2005 में फेर परिणीता फिल्म बनल. शरतचंद्र के कुछ रचना पर आजुओ बांग्ला आ हिंदी में फिल्म बने के योजना के बात चर्चा में आवेला बाकिर ऊ योजना कब मूर्त रूप ली, केहू नइखे जानत. शरत चंद्र असंख्य लेख भी लिखले बाड़े.

"पथेर दावी" उपन्यास ओह घरी "बंग वाणी" में धारावाहिक रूप से छपल, फेर पुस्तकाकार रूप में छपल. ओह घरी किताब के तीन हजार प्रति तीने महीना के भीतर बिका गइल. एकरा बाद ब्रिटिश सरकार एह उपन्यास के जब्त क लिहलसि. शरतचंद्र के तीन गो पुरस्कार मिलल रहे- जगत्तारिणी गोल्ड मेडल (कलकत्ता विश्वविद्यालय, 1923), मानद डी.लिट्. (ढाका विश्वविद्यालय,1936), आ कुंतोलिन पुरस्कार. बाकिर शरतचंद्र कौनो पुरस्कार से बड़ रहले ह आ हमेशा बड़े रहिहें. शरतचंद्र के मृत्यु 16 जनवरी 1938 के भइल. (लेखक विनय बिहारी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
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