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Bhojpuri-शिरोमणि अक्षयवर दीक्षित एके साधे सब सधे

Bhojpuri-शिरोमणि अक्षयवर दीक्षित एके साधे सब सधे

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ओइसे त किछु रचनाकार कई गो भाषा में आ साहित्य के कई गो विधा में सिरिजना करेलन,बाकिर महतारी भाषा में उन्हुकर समरपन खास तौर से रेघरिआवल जाला. अक्षयवर दीक्षित जी अइसने एगो जियतार रचनिहार रहनीं.

संस्कृत में शास्त्री आउर विशारद के उपाधि हासिल करेवाला दीक्षित जी संस्कृत-हिन्दी के अध्यापकी कइनीं, संस्कृत में बालसाहित्य ‘सीमा संस्कृत सौरभम्’ के गमक फइलवनीं, हिन्दी में स्फुट कवितन आ निबंध-संग्रह ‘श्रद्धांजलि’ के मार्फत सरधा के फूल चढ़वनीं, बाकिर भोजपुरी के भाषा आ साहित्य बदे उहांके आपन सउंसे जिनिगी निछावर कऽ दिहनीं.एह में उहां के कई गो रूप झलकत बा-एगो संगठनकर्ता,संपादक,निबंधकार,जीवनी लेखक,कथाकार, कवि के रूप.बाकिर मूलतः दीक्षित जी निबंधकार रहनीं आ ओह हलका में उहां के खास महातम रहे.

सांगठनिक स्तरो प दीक्षित जी के अवदान कबो भुलाइल ना जा सके. हिन्दी-भोजपुरी के साहित्यिक संस्थन में उहांके जिला स्तर से लेके सूबा अउर राष्ट्रीय स्तर के जिम्मेवारियन के बखूबी निभवले रहनीं.सारन,सीवान,गोपालगंज के हिन्दी आ भोजपुरी साहित्य के जिला सम्मेलन में प्रधानमंत्री से अध्यक्ष तक के भार सम्हारत संगठन के मान बढ़वनीं.विश्व भोजपुरी सम्मेलन आ अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के उपाध्यक्ष आउर अखिल भारतीय भोजपुरी भाषा सम्मेलन के अध्यक्ष पद के सुशोभित कइनीं.दू अक्टूबर, 1993का दिने पच्छिम बंगाल में आयोजित पांचवां अधिवेशन के अध्यक्षता करत उहांके कहले रहनीं -‘हमरा बुझाता जे

भोजपुरी के सर्वांगीण विकास खातिर भोजपुरी में भाषाई एकरूपता के प्रयास कइल जाउ आ ऊल-जलूल ना लिखिके स्तरीय साहित्य देबे के कोशिश होखो.संगठन का बारे में हमरा ई कहे के बा जे कवनो संगठन का संचालन से जुड़ल लोग आपन व्यक्तिगत स्वार्थ छोड़के भोजपुरी भाषा-साहित्य का हित में बात सोचो,करो.’

साहित्यिक पत्रकारिता के हलको में दीक्षित जी अपना संपादनकला के छाप छोड़ले रहनीं.सन् 1954में सीवान से जब हिन्दी के पहिल पत्रिका ‘आगमन’ के समहुत भइल,त दीक्षिते जी ओकरा संपादकी के जिम्मा उठवले रहनीं.’युग संदेश’ के संपादनो उहें के सम्हारेके पड़ल.अध्यापकी करत ‘डीएवी उच्च विद्यालय पत्रिका’ के संपादन उहांके 1962से 1984ले-लगातार बाइस साल ले कइनीं.’समकालीन भोजपुरी साहित्य’ आ ‘भोजपुरी विश्व’ के संपादक मंडलो में उहांके शामिल रहनीं.

दीक्षित जी के भोजपुरी के पहिल एकल संग्रह ‘अंगऊ’ शीर्षक से 1977में प्रकाशित भइल रहे, जवना में गद्य-पद्य विधन के एके किताब में समेटल गइल रहे.कहानियन के संग्रह ‘सतहवा’ 1980में छपल.गान्हीं के मानवतावाद के दीक्षित जी के जिनिगी आ लेखन पर गहिर असर रहे.एही से अपना कई गो रचनन में उहांके एह जरूरी विषय पर रोशनी डालल आपन दायित्व बुझले रहनीं.

दीक्षित जी तीन किसिम के निबंध सिरिजले बानीं-विचारात्मक,भावात्मक आ आत्मपरक भा व्यक्तिपरक.उहांके निबंध-संग्रह ‘भोजपुरी निबंध’ में किछु वैचारिक आ किछु भावपरक भा भावना से ओतप्रोत निबंध संग्रहीत बाड़न स.’भोजपुरी के सपूत’ व्यक्तिपरक निबंध के संग्रह बा.उहां के एगो अउर अइसन जियतार काम बा,जवन विशेष रूप से रेघरिआवे जोग बा.एगो गुमशुदा इतिहास के ना खाली उहांके उजागर कइनीं, बलुक अभियान चलाके एगो भुलाइल-बिसरल वीर बांकुड़ा का प्रति स्मृति-तर्पण करत सउंसे भोजपुरिया समाज के गौरवबोध से भरि दिहनीं.

आमतौर पर ई समुझल जात रहे कि आजादी के लड़ाई के सूत्रपात सन् 1857के सिपाही विद्रोह से भइल रहे.बाकिर सच्चाई ई बा गोपालगंज के भोरे थाना में आवेवाला हुस्सेपुर गांव के वीर नायक फतेहबहादुर शाही सन् 1765में कंपनी सरकार के राजस्व-कर ना देबे के ऐलान कऽके विद्रोह के बिगुल बजा देले रहलन आ लगातार तेइस साल ले लोहा लेत अंगरेजी शासन के छक्का छोड़ा देले रहलन.दीक्षित जी एह तथ के गहिर पड़ताल आ शोध कऽके एगो ग्रंथ के संपादन कइनीं-‘भारतीय स्वातंत्र्य-संग्राम का प्रथम वीर नायक’.संपादकीय में उहांके लिखले रहनीं-‘महाराज फतेहबहादुर शाही असाधारण योद्धा और स्वाभिमानी पुरुष थे जिन्होंने प्रारंभिक अंगरेजी शासन को चुनौती देकर उसकी सत्ता को संकटग्रस्त बना दिया था.वे 1750ई में हुस्सेपुर की गद्दी पर बैठे.जब 1765में मुगल सम्राट शाह आलम ने छब्बीस लाख वार्षिक पेंशन के बदले बिहार, बंगाल, उड़ीसा की दीवानी अंग्रेजों को लिख दी,तब अधीनस्थ राजाओं और जमींदारों को ईस्ट इंडिया कंपनी को कर चुकाना आवश्यक हो गया.

किन्तु फतेहबहादुर शाही ने न केवल कंपनी सरकार को कर देना अस्वीकार कर दिया, अपितु उसके विरुद्ध दीर्घकालिक संघर्ष का क्रांतिकारी कदम भी उठाया.हुस्सेपुर से लेकर बनारस तक के युद्ध में 1788ई तक वे अंग्रेजों को नाकों चने चबवाते रहे.इस युद्ध में हुस्सेपुर राज्य की प्रजा ने भी अपने महाराज का भरपूर साथ दिया.महाराज के रहते अन्य जनपदों की तरह सारण में निर्विघ्नतापूर्वक अंग्रेजी शासन स्थापित नहीं हो सका और न उनकी तरफ से कर-वसूली हो पायी.निरंतर संघर्ष करते हुए महाराज ने 1790ई में गोरखपुर मंडल में तमकुही राज्य की स्थापना की.यह इलाका अवध के नवाब के अधीन पड़ता था.फतेहबहादुर शाही के चार पुत्र थे-कुंवर अरिमर्दन शाही,कुंवर दलिमर्दन शाही,कुंवर शमशेर शाही और कुंवर रणबहादुर शाही.नवस्थापित राज्य को अपने कनिष्ठ पुत्र कुंवर रणबहादुर शाही को ‘महाराज बहादुर’ के खिताब से नवाजकर 1790ई में राज्यारोहण कराया.उसके बाद 1790से1808के बीच महाराज फतेहबहादुर शाही सहसा अदृश्य हो गए.उनको खोजने के सारे प्रयास व्यर्थ सिद्ध हुए,किन्तु उनका आतंक कई दशकों तक अंग्रेजों की नींद हराम करता रहा.’

प्रयोगधर्मिता दीक्षित जी में कूटि-कूटिके भरल रहे.जइसे उहांके लेखन में त्रिभाषा (संस्कृत,हिन्दी,भोजपुरी) के त्रिवेणी प्रवाहित होत रहे, ओइसहीं समान आचार-विचार,पेशा,दिनचर्या, सिरिजन वाला तीन गो लंगोटिया इयार ओह इलाका में रहलन-अक्षयवर दीक्षित,जगतनारायण सिंह आ ब्रजभूषण तिवारी.तीनों में दांत काटल रोटी के नेह-नाता.तीन देह,एक जान.जेही देखे,ऊहे कहे-अजब!ई कहाइ त कौतुक से,बाकिर तीनों के नांव के पहिलका आखर से ई शब्द बनल रहे.फेरु त डॉ तैयब हुसैन ‘पीड़ित’ के संपादन में एगो संकलन प्रकाशित भइल रहे ‘अजब’,जवना में तीनों रचनिहारन के हिन्दी-भोजपुरी के बहुआयामी रचना चयनित-संकलित होके प्रकाशित भइली स आ फेरु एक बेरि तीनों संघतियन के तस्वीर आवरण प छपल देखिके मुंह से अनसोहाते निकलल-अजब!

आदरणीय दीक्षित जी से हम पहिला बेर मिलल रहलीं, लगभग चालीस-बेयालीस बरिस पहिले, अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के कार्यसमिति के बइठक में.हम प्रणाम करत आपन नांव बतवलीं आ उहांके धधाके मिलल रहनीं.बुझइबे ना कइल कि पहिला बेर दरसन होत बा.एकदम सहज,सरल आ निश्छल सुभाव.अकसरहां उहां के आपन नेह-छोह बरिसावत रहीं.सम्मेलन के जबले उहां के प्रवर समिति के सदस्य आ उपाध्यक्ष रहनीं, तब ले बइठक आ अधिवेशन में भेंट होत रहे, बाकिर जब किछु मतभेद उभरल,त एगो समानांतर संस्था अखिल भारतीय भोजपुरी भाषा सम्मेलन के गठन भइल आ दीक्षित जी ना खाली ओसे जुड़नीं,बलुक ओकरा पांचवां अधिवेशन के अध्यक्षो के सम्मान पवनीं.चूंकि दूनों संस्थन के मकसद एके रहे, भोजपुरी भाषा-साहित्य के बढ़न्ती,ए से हमार जुड़ाव दूनों से रहे.उहां से भेंटाएवाला नेह-छोह में कवनो कमी ना आइल, बलुक दिनोंदिन अउर प्रगाढ़े होत गइल.सन् 1978में भोजपुरी के साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था ‘भोजपुरी विकास मंडल’ के गठन सीवान में भइल रहे, जवना के संस्थापक सचिव रहनीं दीक्षित जी.बाद में उहांके अध्यक्ष बनावल गइल रहे आ डॉ तैयब हुसैन ‘पीड़ित’ के सचिव.ओही काल में हमार भोजपुरी लघुकथा-संग्रह ‘थाती’ प्रकाशित भइल रहे, जवना के पांडुलिपिए प अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन से ‘पाण्डेय जगन्नाथ प्रसाद सिंह कथा पुरस्कार’ हासिल भइल रहे.एक दिन ‘पीड़ित’ जी ई सूचना देले रहनीं कि भोजपुरी विकास मंडल ‘थाती’ के पुरस्कृत करेके निरनय लेले बा आ ओह मोका प आयोजित कविसम्मेलनो में हमरा शिरकत करेके बा.

मंडल के अध्यक्ष दीक्षितो जी के एगो चिट्ठी मिल गइल रहे.सीवान जाके हम दीक्षित जी के शिष्यन के एगो लमहर परिपाटी देखलीं.प्रत्येक पीढ़ी के नया-पुरान रचनाकारन के आंतर में उहां का प्रति मान-सम्मान के भाव साफ झलकत रहे.उहां के निजी पुस्तकालयो बहुते समृद्ध रहे.भोजपुरी विकास मंडल के सारस्वत आयोजन कामयाब आ ऐतिहासिक रहल.कई भाषा के रचनिहार ओमें शामिल भइल रहलन आ ओकर समूचा श्रेय दीक्षिते जी के रहे.’वन मैन आर्मी’ लेखा उहांके सभका आवभगत में लागल रहनीं आ तमाम मेहमानन के अपना किताबन के सेट भेंट करत रहनीं.अपना सादगी में उहां के विराट व्यक्तित्व के झलक मिलत रहे. जतने मितभाषी,ओतने स्पष्टवादी आ ओतने स्वाभिमानी.फरे-फूले गदराइल फेंड़ के डाढ़ नियर झुकल विनयी भाव.

दीक्षित जी ताजिनिगी भोजपुरी भाषा-साहित्य के चहुंओर बढ़न्ती खातिर लवसान रहत रहनीं. लीखि से अलगा हटिके सोचल-रचल उहां के सुभाव रहे.भलहीं उहांके संस्कृत आ हिन्दिओ में लिखनीं-छपनीं,बाकिर उहांके भोजपुरिए में खुद के साधि लेले रहनीं आ सूतत-उठत बस भोजपुरिए खातिर जीयत रहनीं.एके साधे सब सधे–मातृभूइं, मातृभाषा आ मनुजता के संपोषक-संवर्धक अक्षयवट नियर ओह ऋषि रचनाकार टके पावन स्मृति में हमार प्रणामांजलि!

(भगवती प्रसाद द्विवेदी वरिष्ठ पत्रकार हैं. आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

Tags: Bhojpuri Articles, Bhojpuri News

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