Bhojpuri Spl: कहीं परधानी के लागत बा बोली, त कहीं बंटाता दारू-मुर्गा अउर एडवांस पैसा, जानीं गांव के हाल

कहीं गांव के निर्विरोध प्रधान बनें खातिर 25 लाख से 30 लाख तक रुपिया आ पांच से दस कठआ जमीन गांवसभा के हवाले करेके बोली लागत बा, त कहीं बबुआन लोगन के गांव में मुर्गा दारू के एडवांस पैसा दियाईल बा, बाकी सीट रिजर्ब भइला के वजह से अइसन लागत बा लोग नाउम्मीदी आ निराशा के गर्त में बुडल जात बा लोग.

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 22, 2021, 1:31 PM IST
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अब गांव में का बा? कुछ खास लोगन खातिर गांव अब रहें लायक नइखे. कुछ खास लोगन खातिर गांव में एह समय परधानी के चुनाव बा. रुपिया बा पैसा बा, दाम बा दारू बा.मीट बा मुर्गा बा, मौज बा मस्ती बा, कुछ दिन के बहार बा.लूट लइका लूट हो बापे पुते लूट हों. कहीं गांव के निर्विरोध प्रधान बनें खातिर 25 लाख से 30 लाख तक रुपिया आ पांच से दस कठआ जमीन गांवसभा के हवाले करेके बोली लागत बा, त कहीं बबुआन लोगन के गांव में मुर्गा दारू के एडवांस पैसा दियाईल बा, बाकी सीट रिजर्ब भइला के वजह से अइसन लागत बा लोग नाउम्मीदी आ निराशा के गर्त में बुडल जात बा लोग.

जवन चीज नइखे देखात तवन ई कि गांव सभा के गठन जवना मकसद से भइल रहें,चाहे भारत के प्राचीन परंपरा से चलल आवत रहें ऊ सिरा से गायब बा.प्रेमचंद के पंच परमेश्वर त ओहि दिने से गायब बाड़न,जब देश के संविधान में पंचायती राज व्यवस्था के नीति निर्देशक सूची के हवाले कइल गईल. राजव्यवस्था के समाज के ऊपर थोप दिहल गईल. बाद में राजीव गांधी के जमाना में जवना संविधान संशोधन के जरिये ई उम्मीद कइल जात रहें कि एह उपाय से भरष्टाचार रुक जाइ, आ विचवलियन के हटाके केंद्र के पूरा पैसा गांव तक पहुँचावे में कामयाबी मिल जाइ ,उ मकसद एह समय विकेन्द्रित भरष्टाचार के पूरी तरह से शिकार हो गइल बा.ओह लूट में हिस्सेदारी खातिर ही गांव गांव में गांव के नीलामी के बोली लागत बा,कहीं बड़ बबुआन लोगन में गांव में प्रधान के गोद लेबे के परंपरा के शुरुआत भइल बा.

खासकर अइसन गांववन में जवन दलित पिछड़ा आ आदिवासी खातिर रिजर्व भइल बा.गांव में आजकल अनुपस्थिति सामंतवाद के नींव मजबूत होखल जात बा,जहाँ जीतल प्रधान के खाली दस्तखत के अधिकार प्राप्त बा,बाकी पैसा कहां खर्च होई, कइसे खर्च होई ई सब तथाकथित बड़कवा के हाथे कैद हो जात बा.अब एह तरह के गांव पंचायत के सपना ना महात्मा गांधी के गांव स्वराज के रहें,ना लोहिया के चौखम्भा राज के रहें,अउर ना जयप्रकाश नारायण के लोकशाही के.अंग्रेज जब भारत में राज करने लगे तब दुगो चीज से सबसे ज्यादा चकित भइले उ ई कि बिना कवनो खर्च के गांव स्तर तक एक प्रशासनिक इकाई काम करत रहें,आ गांव स्तर तक एक अनौपचारिक शिक्षा के व्यवस्था भी कायम रहें.लगभग 18वीं शताब्दी तक यूरोप खातिर ई दूनो बात असम्भव रहें.

गांवसभा के अइसन मान्यता रहें कि महाराज हर्ष के अपना राज्यभिषेक के पहिले एक लाख गांव प्रमुखन से अनुमति लेबे पड़ल.आज आलम ई बा गांव सचिव के आगे पीछे गांव प्रधान घुमत बाड़न.मतलब समाज के चुनल प्रतिनिधि से ज्यादा असरदार राज्य के कर्मचारी हो गईल बा.आ राज्य सरकार के भी सबसे ज्यादा भरोसा ओकरे पर बा.महात्मा गांधी जी चाहत रहनी कि जतना अधिक से अधिक अधिकार गांवसभा के पाले रहीं ओतने लोगन के भला होई. अब जब निचला स्तर पर ई स्थिति बा तब समझल जा सकेला कि अइसन अधिकार के ज्यादा उपयोग के करीं, आ केकरा ओसे ज्यादा लाभ होई? गांव में मनरेगा में चाहे अयुरी कवनों मद में पिछलका पांच साल में जतना पैसा ऑइल बा, अगर ओकरा तुलना में ओतना काम भइल रहीत तब अगले पांच साल तक शायद पैसा के ओतना जरूरत ना पड़त.
आज आलम ई बा कि अगर मनरेगा के काम के पैमाइश ठीक से हो जाय, तब शायदे कवनों प्रधान जेल जाये से बचिहे.एह लूट में हिस्सेदारी खातिर हर गांव में होड़ मचल बा.गांव के लोगन के सीधापन,अपनापन में गाँव के तथाकथित बड़कवा लोग जहर घोल रहल बा. गांव के आपसी भाईचारा खत्म हो चुकल बा.गांव के बुजुर्गन से अब अइसन कवनों सबक नइखे मिलत जवना के लेके गांव के रेखिया उठान वाली पीढ़ी आगे बढ़े.अइसना में जब देश आजादी के 75 वां वर्षगांठ मनावें के तैयारी करत बा, बेहतर ई रहीं कि या त लोकतंत्र के बुनियाद गांव के स्तर पर कवनों खामी ऑइल बा त ओकरा के निचले स्तर पर दुरुस्त कइल जा.जरूरत के मुताबिक आवश्यक संशोधन कइल जा.गांव के आबंटित फंड के ज्यादा पारदशी, सामाजिक रूप से जबाबदेह बनावल जा.गांव के मद में आबंटित फंड के सोशल ऑडिटिंग के व्यवस्था सुनिश्चित कइल जा.आ कुछ ना हो सकें तब लोकतंत्र का अंतिम क्षण है,कहकर आप हंसे.आ गांव स्तर पर चुनल प्रतिनिधि लोगन के सामने पूरा गांव के लोगन के जुटान करके पुछल जा कि ए प्रधान जी तुहीं बताव कि तहरा कार्यकाल में जइसन भी व्यवस्था भइल ओह पर हमनी के गाँववासी हंसी जा कि रोई जा? (लेखक मोहन सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
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