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Bhojpuri में पढ़ें, पुण्यतिथि के पूर्व संध्या पर रफी साहेब के कहानी

रफी साहेब के पुण्यतिथि (31 जुलाई) के पूर्व संध्या पर उनके इयाद कइला पर उनके कई गो गीत दिलोदिमाग़ में गूँज रहल बा. ई गूँज रफी साहेब के प्रति श्रद्धांजलि बा. उनका पावन स्मृति के नमन !

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‘तुम मुझे यूं भुला ना पाओगे, जब कभी भी सुनोगे गीत मेरे, संग-संग तुम भी गुनगुनाओगे…’
साँच बात बा रफ़ी साहेब. रउरा आजो मौजूद बानी अपना अनमोल, सदाबहार आ दुःख-सुख के समझे-बूझे वाला गीतन में… अउर काल्ह राउर पुण्यतिथि ह. त रउरा कुछ बेसिये ईयाद आ रहल बा.

सभे जानsता कि रफी साहेब के गीत-संसार एतना बृहद बा कि भारत में हिन्दी त हिन्दी दोसरो भाषा बोले वाला आदमी एक बार कहीं ना कहीं उनका के जरूर सुनले होई. एकरा के कहल जाला कलाकार के रूप में असली सफलता पावल. ई अतिशय ना होई कि रफी साहेब अपना गीतन के चलते अमर हो गइलें आ हमनी के बीच ना रहला के बावजूद उ हर समय अपना रूहानी आ लयदार आवाज के कारण मौजूद बाड़ें.

मोहम्मद रफी के जन्म 24 दिसंबर 1924 के अमृतसर के कोटला सुल्तान सिंह में भइल. उ छव गो भाई में दुसरा नंबर के रहलें. उनके पिता हाजी अली मोहम्मद नाई रहलें आ दाढ़ी केश बनावस. रफी के बचपन के नाम फीकू रहे. उनका में गायकी के बिया तब बोआइल जब उ छोट रहलें आ अपना गाँव में आवे वाला फकीर के गीतन के नकल करस. रफी के गीत-संगीत के चस्का इहवें लागल. बाद में उनके बाबूजी लाहौर रोजी-रोटी के तलाश में चल गइलें आ उहाँ के नूर मोहल्ला में पुरुष खातिर सैलून चलावे लगलें. रफी के युवा अवस्था इहवें बीतल. रफी पहिला बेर 13 साल के उमिर में लाहौर के एगो कार्यक्रम में गवलें. उहाँ महान अभिनेता-गायक कुंदनलाल सहगल भी रहलें. रफी जब 17 साल के रहलें त उनके पंजाबी फिल्म गुल बलोच में गावे के मौका मिलल. उनका से गाना श्याम सुंदर जी गववले रहलें. इहे संगीतकार श्याम सुंदर बाद में उनके बॉम्बे फिल्म इंडस्ट्री में स्थापित होखे में मदद भी कइलें. एही साल उनके ऑल इंडिया रेडियो के लाहौर स्टेशन पर गावे के न्योता मिलल. रफी साहेब संगीत के शिक्षा किराना घराना के विख्यात गायक उस्ताद अब्दुल वाहिद खान अउरी पंडित जीवन लाल मट्टू से लेहलें.

1944 में उ बंबई आपन फिल्मी करियर बनावे आ गइलें. इहाँ भिंडी बाजार में एगो छोट कमरा रेंट पर एगो साथी के साथे लेहलें आ काम खातिर संघर्ष चालू हो गइल. श्याम सुंदर ओ बेरा बंबई में रहलें आ रफी के ‘गाँव के गोरी’ फिल्म में गावे के मौका दिआ देहलें. गाना ‘अजी दिल हो काबू में तो दिलदार की ऐसी की तैसी’ में उ ओ बेरा के स्थापित गायक जीएम दुर्रानी के साथे डूएट गवलें. हालांकि उ संगीतकार नौशाद के साथे एगो गाना ‘हिंदुस्तान के हम हैं’ एकरा से पहिले गवलें रहलें बाकिर उ बाद में रिलीज भइल. एकरा बाद उनके गावे अउरी फिल्म में अभिनय करे के भी मौका मिलल. 1945 में फिल्म लैला मजनू, 1947 के फिल्म जुगनू में उ गावे के साथ स्क्रीन पर भी लउकलें. ‘ओ अपनी याद दिलाने को’ गाना में युवा लइकन के टोली में रफी के मुस्कुरात चेहरा देखल जा सकेला. रफी नौशाद खातिर केएल सहगल के साथे खूब गाना में कोरस गवलें. 1950 आवत-आवत रफी दिलीप कुमार के आवाज बन गइलें. इहे समय रहे जब गायक मुकेश भी आपन करियर बनावे में लागल रहलें आ दिलीप कुमार भी नया-नया फिल्म इंडस्ट्री में आपन प्रभाव जमावत रहलें.

रफी साहेब 1950 से लेके 1970 ले खूब गाना गवलें आ लगभग सभ बड़ संगीतकार लोग के साथे गवलें. नौशाद साहेब से शुरुआत कइला के बाद उ सचिनदेव बर्मन (एस डी बर्मन) के साथे काम कइलें. तब उ गुरुदत्त आ देव आनंद के अधिकांश हिट फिल्म खातिर गवलें. उनके हिट गीतन से सजल क्लासिक फिल्म कागज के फूल, प्यासा, नौ दो ग्यारह, गाइड, आराधना, अभिमान आदि बाड़ी सन. रफी साहेब के शंकर-जयकिशन के साथे जुगलबंदी खूब जमल आ उनके तीन गो फिल्म फेयर इनके ही गाना खातिर मिलल. रफी साहेब मदन मोहन के साथे मिलके कुछ सदाबहार नगमा देहले, जइसे – तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है, ये दुनिया ये महफ़िल, कर चुके हम फिदा, मेरी आवाज सुनो आदि. रफी साहेब संगीतकार रवि के साथे भी काम कइलें आ कुछ हिट गाना जइसे चौदहवीं का चाँद हो, बाबुल की दुआएं लेती जा गवलें. बाबुल की दुआएं खातिर रफी साहेब के राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी मिलल.

रफी साहेब प्रख्यात गायक अभिनेता किशोर दा खातिर भी प्लैबैक सिंगिंग कइलें. रफी साहेब ओ.पी. नैय्यर खातिर भी कई गो हिट गीत गवलें. कल्याण जी-आनंद जी, लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल के अलावा चन्द्रगुप्त, एस.एन. त्रिपाठी, उषा खन्ना आदि महान संगीतकार खातिर भी उ गाना गवलें. 1970 में रफी के गला में संक्रमण हो गइल जेकरा चलते उ गाना गावल कम कर देहलें. हालांकि एह दौरान भी कई गो सुपरहिट एवरग्रीन गाना, जइसे गुलाबी आँखें, यूं ही तुमसे मुझसे बात करती हो, इतना तो याद है मुझे, कितना प्यार वादा है, चलो दिलदार चलो, चुरा लिया है तुमने जो दिल को, तेरी बिंदिया रे आदि गवलें.

फेर उ 1977 में वापस अइलें बाकिर तबले किशोर कुमार के संगीत के दुनिया पर एकाधिकार हो गइल रहे. रफी साहेब ओह बीच कईगो हिट गाना गवलें. अपना जीवन के अंतिम साल में उ देश विदेश के ढेर दौरा कइल शुरू कर देहले रहलें. कई जगह जाके उ प्रोग्राम देस. 31 जुलाई 1980 के राति खां दस बज के 25 मिनट पर उनके भीषण हार्ट अटैक आइल अउरी उ एह दुनिया के छोड़ के विदा हो गइलें. रफी साहेब ओह दिन कईगो गाना रिकॉर्ड भी कइले रहलें. उनके आखिरी गाना फिल्म ‘आस-पास’ से रहे ‘तू कहीं आस-पास है दोस्त/ शाम फिर क्यूँ उदास है दोस्त’.

भोजपुरी संगीत में भी रफी साहेब के महान योगदान बा

भोजपुरी सिनेमा में रफी साहेब के बड़ योगदान बा. उ चित्रगुप्त अउरी एस एन त्रिपाठी के साथे हिन्दी गीत भी गवलें रहलें आ भोजपुरी में भी जब उ लोग गीत बनावल त उ गवलें. भोजपुरी सिनेमा के पहिला फिल्म ‘गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो’ में मोहम्मद रफी के गावल गीत रहे. ‘सोनवा के पिंजरा में बंद भइल हाय राम’ … ई गीत सभके पसंदीदा ह. शैलेंद्र के लिखल इ गीत रहे आ चित्रगुप्त’ एमें संगीत दिहले रहलें.

एह फिल्म के बाद रफ़ी साहेब ‘बलम परदेसिया’, ‘दंगल’, ‘रूस गइले सइयां हमार’ आ ‘धरती मइया’ आदि कई गो फिलिम के गीत के आपन अनोखा स्वर देके सदाबहार बना देहलें. फिल्म ‘बलम परदेसिया’ के गीत ‘गोरकी पतरकी रे…’ आशा भोंसले के साथे मो.रफी के आवाज़ में धूमगज्जर मचा देले रहे. अंजान के लिखल एह गीत के संगीत भी चित्रगुप्ते जी देले रहनी. भउजी फिल्म के गाना ‘हम गरीबन से भइल प्यार ‘ भी रफ़ी के आवाज़ में कमाल के गीत बा. हिंदी फिल्म ‘गोदान’ में रफ़ी साहेब के आवाज़ में भोजपुरी गीत ‘ पीपरा के पतवा सरीके डोले मनवा…’ के ना सुनले होई भा गंगा जमुना के गीत ‘ नैन लड़ जइहें त मनवा मा कसक होइबे करी’.

रफी साहेब के पुण्यतिथि के पूर्व संध्या पर उनके इयाद कइला पर उनके कई गो गीत दिलोदिमाग़ में गूँज रहल बा. ई गूँज रफी साहेब के प्रति श्रद्धांजलि बा. उनका पावन स्मृति के नमन !
( लेखक मनोज भावुक भोजपुरी साहित्य और सिनेमा के जानकार हैं. यह उनके निजी विचार हैं. )

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