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Bhojpuri: महात्मा गांधी आ सुभाष बाबू में अनन्य प्रेम रहे

Bhojpuri: महात्मा गांधी आ सुभाष बाबू में अनन्य प्रेम रहे

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गांधी जी के पहली बार राष्ट्रपिता कहे वाला नेताजी के आजाद हिंद फौज के विभिन्न ब्रिगेड के नाम-गाँधी ब्रिगेड, जवाहर ब्रिगेड, अब्दुल कलाम आजाद ब्रिगेड,अउर सुभाष ब्रिगेड रहल.

केंद्र सरकार दिल्ली में गणतंत्र दिवस समारोह के शुरुआत – जवन पहिले 24 जनवरी से होत रहें, अब 23 जनवरी यानि नेताजी सुभाष चंद्र बोस के जयंती से शुरू होई-एकर घोषणा भईल हा. ओह दिने इंडिया गेट पर नेताजी सुभाष बाबू के मूर्ति भी लगावल जाई-जहां कभी जार्ज पंचम के मूर्ति विराजमान रहें. सुभाष बाबू के देश भक्ति अउर बलिदान के याद में इंडिया गेट पर मूर्ति एक तरह से नेताजी के प्रति पूरा देश की ओर से श्रद्धांजलि के रूप में देखें के चाहीं- कवनों अउर रूप में ना. महात्मा गांधी जी ठीक कहलें बानी कि “उन जैसा कोई दूसरा देशभक्त नहीं. वे देशभक्तों के राजकुमार है.” 24 जनवरी 1946 को ‘हरिजन’ पत्रिका में महात्मा गांधी लिखत बानी कि- आजाद हिंद फौज का जादू हम पर छा गया है. नेताजी का नाम सारे देश में गूँज रहा है. वे अनन्य देशभक्त हैं. (वर्तमान का प्रयोग जान बूझकर कर रहा हूँ.) अइसन देशभक्त नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के मूर्ति इंडिया गेट पर लागें, तब शायदे केहू के एतराज होवें के चाहीं.

बचपन से सुभाष चन्द्र बोस रामकृष्ण परमहंस, विवेकानंद अउर महर्षि अरविंद के आध्यत्मिक विचार से प्रभावित रहनीं. सन् 1920 में जब आई सी एस की परीक्षा में सुभाष बाबू पास कइनीं, तब चौथा स्थान प्राप्त रहें. आई सी एस से जब सुभाष बाबू इस्तीफा देनी, तब ओकर वजह देशभक्ति से ओतप्रोत भावना आ विवेकानंद अउर महर्षि अरविंद आधात्मिक के प्रेरणा भी रहें. एह बात के जिक्र सुभाष बाबू अपना भाई शरत चंद्र बोस के लिखल एगो चिठ्ठी में भी कइलें बानी- क्या करें मेरे दिमाग पर स्वामी विवेकानंद और महर्षि अरविंद के विचार छायें है. एह विचार से ही सुभाष बाबू के मन-मष्तिष्क-हृदय में अनन्य देशभक्ति अउर देश के आजादी खातिर कवनों तरह के बलिदान से कभी हिचक ना पैदा भईल. देश के अंग्रेजी हुकूमत से जल्द से जल्द से आजाद करावें के बेचैनी ही सुभाष बाबू के कभी के चैन से ना बइठे दें. सिंगापुर में सन् 1941में आजाद हिंद फौज के स्थापना, जवन जापान के सहयोग भईल रहें, ओह फौज में चालीस हजार परशिक्षित पुरुष अउर महिला शामिल रहलीन. आजाद हिंद फौज के विभिन्न ब्रिगेड के नाम-गाँधी ब्रिगेड, जवाहर ब्रिगेड, अब्दुल कलाम आजाद ब्रिगेड,अउर सुभाष ब्रिगेड रहल. महिला ब्रिगेड के नाम झाँसी ब्रिगेड रहल.

आजाद हिंद फौज के गठन के जरूरत काहें पड़ल. नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जी सन्1943 में टोकियो रेडियो से एह बात के ऐलान कइनीं कि- अंग्रेजों से आशा करना बिलकुल व्यर्थ है कि वे स्वयं अपना साम्राज्य छोड़ देंगे. हमें देश के भीतर और बाहर देश की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करना होगा. सुभाष बाबू के ई स्पष्ट मान्यता रहें कि- जीवन में संघर्ष ना रहें, किसी के भय का सामान न करना पड़े, तो जीवन का आधा स्वाद ही खत्म हो जायें.

जीवन में संघर्ष अउर बलिदान सुभाष बाबू के जीवन के अनिवार्य हिस्सा रहल बा. सुभाष बाबू के हर नारा के पीछे उनकर संकल्प अउर मकसद साफ जाहिर होखें. 21 मार्च 1944 के ‘दिल्ली चलो’ का नारा आजाद हिंद फौज के सैनिकन खातिर एक ललकार रहें. एह बात के कि अब ब्रिटिश सरकार के आमने-सामने मुकाबला करें के समय आ गईल बा. काहे कि 21 अगस्त 1921 के महात्मा गांधी से मुलाकात के बाद तीस के दशक तक सुभाष बाबू गांधी जी के असहयोग आंदोलन अउर सत्याग्रह में सक्रिय रहला के बाद चालीस के दशक के अंत में एह निष्कर्ष पर पहुँच चुकल रहनीं कि नैतिक दबाव अउर सत्याग्रह के बदौलत(जवन गांधी जी के रास्ता रहें) देश के आजादी ना हासिल हो सकें.

अब देश के आजादी खातिर सशत्र सैनिक संघर्ष के जरूरत बा. एह मकसद के पूरा करें खातिर आजाद हिंद फौज गठन भईल. 21 मार्च के नेताजी सुभाषचंद्र बोस के “ दिल्ली चलो” आजाद हिंद फौज के सैनिकन के ललकार के मतलब भी बिल्कुल साफ रहें. आ अतने साफ रहें-तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा, का मकसद भी. यह कि हमारी मातृ भूमि स्वतंत्रता की खोज में है, यह स्वतंत्रता देवी की मांग है.

सुभाष बाबू आ महात्मा गाँधी के बीच देश की आजादी के लक्ष्य के हासिल करें के ‘तरीके’ के लेकर चाहें जतना मतभेद रहल. बाकि सुभाष चन्द्र बोस के गाँधी के प्रति सम्मान भावना म् कभी कवनों कमी ना देखल जा सकें. ओह समय भी ना, जब सुभाष बाबू 1938 के हरिपुरा कांग्रेस में गाँधी जी के घोषित उम्मीदवार पीटाभीसीतारमैया के चुनाव के हरवलन. एह हार के गाँधी जी आपन व्यक्तिगत हार बतवनीं. बाकि कांग्रेस संगठन पर बिना कवनों पद-यहां तक सन् 1934 के बाद कांग्रेस के सदस्यता के बिना भी गाँधी जी के कांग्रेस पर अतना पकड़ आ प्रभाव रहल कि गाँधी जी के मर्जी के बिना कांग्रेस में एगो पता भी ना डोल पावें. सुभाष बाबू के मजबूरी ई रहें कि अध्यक्ष भइला के बाद भी अपना मन मुताबिक कांग्रेस के कार्यकारिणी ना घोषित कर पवनीं. कांग्रेस के अंदर एगो अइसन जमात रहल- जवन त्रिपुरी कांग्रेस में बहुमत से ई प्रस्ताव पारित करावें के फिराक में रहें कि-काग्रेस कार्यकारिणी गठित करें के अधिकार गाँधी जी के सौंप दिहल जाय.

सुभाष चन्द्र बोस कांग्रेस के अन्दर आपन अधिकार सीमा से परिचित होकें, काग्रेस से अलग राह अख्तियार करें के मजबूर हो गइलन. फारवर्ड ब्लॉक के गठन कर अपना मकसद के अंजाम तक पहुँचावें खातिर अलग राह पर चल देनी. 21 जनवरी 1941 को कलकत्ता के अपना एलिग्न रोड स्थित मकान से भेष बदलकर-ख़ुफ़िया पुलिस के चकमा देकर पहिले काबुल, फिर मास्को अउर वहां से कवनों सहयोग के उम्मीद ना पाकर बर्लिन पहुंचे. जर्मनी के सहयोग से नेताजी के रेडियो स्टेशन चालू करें के काम में सफलता हासिल भईल. अब नेता जी के बात, रेडियो संदेश के जरिये – तमिल, तेलगु, गुजराती, हिंदी अउर अंग्रेजी में दुनिया के कोना-कोना में पहुँचे लागल. विश्वयुद्ध के दौरान नेता जी हर ओह देशन के संपर्क में रहनीं, जवन देश एह युद्ध में मित्र देश के नाम से एकजुट भईल रहलन. ओह समय जापान, जर्मनी अउर इटली मे फासीवाद के उभार लोकतंत्र के खतरा के रूप में देखल जात रहें. भारतीय नेता ओह समय मित्र देशन के सहयोग करत रहलन.

जब कि नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के ई मान्यता रहल कि विश्व युद्ध में मित्र देशन के विजय के बाद भी दुनिया पर वर्चस्व अमरीका के कायम रहीं, ना कि ब्रिटेन के. नेताजी के ई दूर दृष्टि सही साबित भईल. पर्ल हार्बर पर जापानी कब्जा के विरोध में जब अमरीका ने नागासाकी अउर हिरोशिमा पर दुनिया में पहली बार जब परमाणु बम गिरवलस, तब जापान के समर्पण करें के अलावा कवनों चारा न रहीं गईल. जर्मनी भी घुटना टेक चुकल रहें. इधर भारत के आजादी खातिर जापानी फौज के साथ आजाद हिन्द फौज के सैनिक इंफाल के सीमा पर यद्धरत रहलन.

6 जुलाई 1944 के रंगून रेडियो से देशवासियों को सम्बोधित करत नेताजी सुभाषचंद्र बोस कहत बानी कि- भारत की स्वाधीनता की आखिरी लड़ाई शुरू हो चुकी है.आजाद हिंद फौज के सैनिक सफलता पूर्वक लड़ रहे हैं. हे! राष्ट्रपिता इस पावन युद्ध में हम आपका आशीर्वाद और शुभकामनाएं चाहते हैं. पहली बार महात्मा गाँधी के राष्ट्रपिता सम्बोधन नेताजी सुभाष चंद्र बोस जी ही दिहलन. ओह संदेश में ही नेता जी साफ कर चुकल रहनीं कि- यह सशस्त्र संघर्ष तब तक चलेगा, जब तक ब्रिटीश हुकूमत को उखाड़ नहीं फेंकते. जब तक वायसराय हाउस पर तिरंगा नहीं फहरता. पर हालत अइसन पैदा भईल कि जापान की ओर से सहायता बंद हो गइल. रंगून पर ब्रिटेन के कब्जा हो गईल.

आजाद हिंद फौज के समर्पण के अलावा अब कवनों उपाय ना रहीं गईल. 18 अगस्त 1945 के बाद नेताजी सुभाषचंद्र बोस के भी पता न चलल. नेताजी के रहस्यमय गुमनामी असलियत के जाँच खातिर कई गो आयोग गठित भइल. बाकि असलियत के पता आजु तक ना चली पावल. ओह नेता जी के जेकरा देश के आजादी से ज्यादा कुछ भी प्रिय ना रहल. बाकि नेता जी के- दिल्ली चलो, तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा अउर जय हिंद के नारा आजु भी भारत के लोगन के हृदय में जीवित बा.

(मोहन सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

Tags: Bhojpuri News, Netaji subhas chandra bose

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