Bhojpuri: चढ़ल जेठ में सुरुज देखावे लगलें आंख, रस्ता चलल दूभर

जेठ महिना की पहिला पख में मिरगिटाह तवे ले. का खेत- खरिहान, का बगयिचा, सब जगह खड़खड़ी नाचे लगेले. दिन-दुपहरिया में रस्ता चलल दूभर हो जाला. इ अईसन महीना ह, जवना में पानी में जिनगी अटक जाले.

  • Share this:

जेठ अपनी गरमी खातिन जानल जाला. चढ़ते सुरुज आंख देखावे लागलें. महिना की पहिला पख में मिरगिटाह तवे ले. का खेत- खरिहान, का बगयिचा, सब जगह खड़खड़ी नाचे लगेले. दिन-दुपहरिया में रस्ता चलल दूभर हो जाला. इ अईसन महीना ह, जवना में पानी में जिनगी अटक जाले. हिंदी साहित्य की रीतिकाल में एगो कवि हवें बिहारी. इ मानल जाला की लिखे वालन में उकरा के ऋतू क गियान खूब ह. उ जड़ी-बूटी पर कविता लिखले बाड़न. अपनी कविताई में जेठ क दुपहरिया क बारे में लिखले बाड़ें कि- “.........देख दुपहरी जेठ की छाहौं चाहती छांह.” (बिहारी सतसई) मतलब की एतना गरमी होखे ले की छाहों के छांह क जरुरत पड़े लगेले.

ओईसे त बहुत सुखहर महीना मानल जाला. लेकिन एकरो कुल कईगो खसियत हिय. जईसे कि जेठ क पहिला पख (मतलब की अन्हार) दस दिन गईले दशहरा परेला. एके लोगबाग़ गंगा दशहरा कहेलन. भागीरथ क कोशिश से एही दिने गंगा धरती पर अयिलीं. आउर कईगो संयोग एह दिन हवे. एहिसे एह दशहरा क आपन महत्व ह. अपनी परम्परा में कवनो पूजा-पाठ, व्रत-उपवास बिना कारन ना होला. अईसने कई गो संयोग एह सुखहर महीना में हवे. उपवास से लेके खेती किसानी तक में येह महिना क आपन महिमा बा. आयीं ओकरा के राउरो जानीं.

दशहरा की बाद लोग एकादशी क उपवास रखेलन. इ एकादशी सब एकादशी से बड़हर मानल जाले. एकरा के निर्जला एकादशी कहल जाला. एकरी बारे में लोग कहेला कि साल क चौबीस गो एकादशी जे ना भूख पावेला उ जेठ क एगो एकादशी भूख लेला त ओकरा के कुल एकादशी क फल मिल जाला. बस सरत इ रहेले कि एमे एक दिन आउर एक रात बिना जल के रहे के परेला. एह समय में लोग कथा बरता करेला. कहनी-किस्सा सुनेला. येह एकादशी क सम्बन्ध कहीं महाभारत से जुड़े ला त कहीं साठ हजार पुत्र वाले राजा सगरने की कथा से जुड़ेला. आउरो कुल कईगो किस्सा/कहानी ह जवन निर्जला एकादशी क महत्व बतावे खातिन सुनावल जाले.

उपवास की बाद गंगा में नहा के लोग अपना के धन्य मानेला आउर सरग क रस्ता बना लेला. दान-पुन्य कईले के लेके कईगो कहानी ह. एसे एकादशी क उपवास करे वाला मनई के दान-पुन्य कयल जरुरी होला, न त ओकरा के फल ना मिलेला.
एह एकादशी के माने वाला लोग कुछ आउरो नियम मानेला. जईसे कि जेठ सुदी एकादशी के निर्जला एकादशी परेले. जेठ क दूसर पख में अजोर एगारह दिन गईले. जे भुखेला उ जमीन पर सुतेला, चाहे त लकड़ी की चउकी पर सुतेला. बद्धि वाली खटिया पर सुतल लोग बरा देला. अईसन कुल जतन साफ सुथरा रहे खातिन कईल जाला. इ एकादशी मरद ढेर भुखेलन. येह एकादशी भूखे वाला ज्यादातर लोग निरजल रहेला. बड़हर फल पावे खातिन बड़हर तपसिया होले इ. जेठ में बिना पानी पियले चौबीस घंटा क तपसिया. कठिन ह, लेकिन लोग निभावेला. हमहन क त सुनी के दिमाग गोल होखे लागेला. जब उपवास टूटेला त लोग भात ना खालें. रोटी की संग्हे रहर क दाल आउर लउकी क तरकारी खायल जाला. उपवास तोड़े वाला खाना में सेंधा नमक के लोग शुद्ध मानेला. आप त समझी सकिला लोग शारीर के ठंढा करे खातिन अईसन खाना खालें.

अपनी परम्परा में बिसवास करे वाला मनई जेठ क दशहरा बीतले उख चुहल बंद क देलन. जेठ की एकादशी से लेके कातिक ले उख चुहल बंद रहेले. कातिक एकादशी पर पूजा पाठ क के तब ले लोग उख चुहेला. इ काहे होला, जब पड़ताल करब त पता चली. कहावत हिय कि- “माघ क पाला जेठ क धूप, बड़ी कसाला होले ऊख.” वोयिसे त जेठ में ऊख कोड़ाये लगेले आउर माघ में पेरा ले. येह बीच में उख गेल्ही मतीन होले, मतलब की कच्चा. काच कोहर चीज त ओयिसहूँ नुकसान छोड़ के कबो फयदा ना करे ले. एही से लोग बारावे ला. कातिक ले तनी पकहर जाले त ओकर सुवाद नीमन लागेला.

जेठ सुखल महीना होला. दूध, दही, मनठा से लोग काम चलावेला. हरियर तरकारी तबे मिलेले जब पानी क सुविधा होखे. लेकिन गरमी ढेर भाईले से खाना खईले क मजा कम आवेला. खईले क असली मजा त जाड़ में आवेला. एह समय तनिको ढेर खा लिहला त धुवायिन ढेकार आवे लागेले. मतलब की शारीर में पानी क कमी हो जाले. एहिसे लोग खाला कम आउर पानी/मनठा ढेर पियेलन. आम क पन्ना से लेके आउर कईगो जतन शारीर क पाचन ठीक रखे आउर ओकरा के ठंढा रखे खातिन कईल जाला.



जेठ में सतुवा खूब खायल जाला. ओकर दुगो कारन ह. पहिला त इ कि सतुवा ठोस होला. खईले की बाद आप की शारीर के जेतना कुल तत्व चाहेला, सब ओकरा में मिल जाला. दूसर इ की ओकरा सेवन से गरमी ना लागेले. पियास खूब लगेले एसे आदमी गरमी से बचल रहेला.

खेती किसानी की लिहाज से देखब त जेठ बड़ा जरुरी ह. जेठ जेतना बढ़िया तवे ला खेती ओतनी निरोग होले. कहल जाला की जेठ तवे ला त जीव जंतु क बिख मर जाले. माटी जरे, एकरा खातिन लोग खेत जोत के छोड़ देलन. जब एक फार माटी में नमी ना रहे ले आउर ओकरी बाद पानी पड़ेला त फसल में कवनो तरह क किरवना-फिरवना ना लगेलन. फसल निरोग होले. घास-फूस सुख जाले त जवन बीज आप बोयिला ओकरा के बढ़े क समय मिल जाला. जवना खेत में जेठ में पानी लागल रहेला ओकरा में फसल से अधिका घास क जोर देखेके मिलेला.

मीरगिटाह नछत्तर की बाद रोहिनी चढ़ेले. एही में किसान धान क बीज डालेला आउर फिर इहे बिया चढ़त असाढ़ में रोपल जाला. लोग कजरी गावेला. असाढ़ की फुहार की संग्हे सिवान में हरियरी शुरू होले. खेती-किसानी क खियाल करब त इ कहल ठीक रही कि सिवान में कुल तबे सही होला जब जेठ खूब तवे. (लेखक रामाशंकर कुशवाहा वरिष्ठ पत्रकार हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)

अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज