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Bhojpuri Spl: निराला जी के जयंती पर उहां के कहानी ‘श्रीमती गजानन शास्त्रिणी ’ के याद

16 फरवरी के बसंत पंचमी मनावल जाई, एह दिन विद्या के देवी मां सरस्वती के पूजन होखेला. एह दिना ही सरस्वती पुत्र महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' आपन जन्मदिन भी मनावत रहलहन. हालांकि, तिथिवार उनकर जन्मदिन 21 फरवरी के पड़ेला.

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सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ जी के जबे चर्चा होला, उनुकर एकही छवि उभरेले, हिंदी के छायावाद के कवि के रूप। आजु बसंत पंचमी ह, जगह-जगह विद्या के देवी सरस्वती माइ के पूजा होता। ओह पूजा में एगो गीत जरूर सुनल जाला,

वर दे वीणावादिनी, वर दे!
प्रिय स्वतंत्र-रव अमृत-मंत्र नव
भारत में भर दे !
काट अंध-उर के बंधन-स्तर
बहा जननि, ज्योतिर्मय निर्झर;
कलुष-भेद-तम हर प्रकाश भर
जगमग जग कर दे !
नव गति, नव लय, ताल-छंद नव
नवल कंठ, नव जलद-मन्द्ररव;
नव नभ के नव विहग-वृंद को
नव पर, नव स्वर दे !
वर दे, वीणावादिनि वर दे।

सरस्वती माता के वंदना में ई गीत रचे वाला निराला जी आपन जनमदिन बसंत पंचमिए के मनावत रहले। सरस्वती के साधक निराला जी के छवि खाली छायावादी कविए के रूप में बा। जबे उनुकर चर्चा होखेला, सबसे पहिले उनुकर कुछु कविते यादि आवेला। राम के शक्ति पूजा, सरोज स्मृति, बादल राग, कुकुरमुत्ता आदि-आदि। राम की शक्ति पूजा आउर सरोज स्मृति त तकरीबन कालजयी रचना के श्रेणी में आ गइल बाड़ी स।

निराला जी कवि के अलावा बढ़िया कहानीकारो रहले। उनुकर कहनियन के तीनि गो संग्रहो छपल रहे। उनुकर पहिलका कहानी संग्रह ह ‘लिली’, जवना के प्रकाशन 1930 में भइल रहे। उनुकर दोसरका कहानी संग्रह रहे, ‘चतुरी चमार’। इहो उन्नइस स तीसे में छपल रहे। बाकिर उनुकर आखिरी कहानी संग्रह रहे ‘सुकुल की बीबी’, जवना के प्रकाशन 1941 में भइल रहे।

ई बिडंबना कहाई कि कुछु आउर, निराला जी के रचनाकार रूप में उनुकर खालि कविए रूप चर्चित, प्रशंसित आ मसहूर बा। जबकि उनुकर लिखल कहानी सभ भी आपाना कथ्य, विषय आ रचनाधर्मिता के नजर से तनिको कमतर नइखे। कुछ समीक्षक उनुकर कहानी कला के कथा सम्राट प्रेमचंद के हिसाब से कसे के कोसिस कइले बाड़े लोग। ई स्थापना देबे वाला लोग दरअसल निराला के भावभूमि के भुला देला। प्रेमचंद अलगा भावभूमि के रचनाकार हवन, जबकि निराला दोसरा भावभूमि के। एह वजह से दूनों के कथाकार रूप के तुलने बेमानी बा।

निराला जी के तीसरका कहानी संग्रह में एगो कहानी बा, ‘श्रीमती गजानन शास्त्रिणी’। हमरा नजर में ई कहानी आपाना कथ्य आ विषय के हिसाब से जबरदस्त बा। ओइसे त ई कहानी बा, बाकिर एह में जबर व्यंग बा। एह कहानी के प्रमुख पात्र गजानन शास्त्रिणी छायावाद के खिलाफ लेख लिखि के लोकप्रियता हासिल करतारी। एतना लोकप्रिय हो तारी कि उनुकर पति गजानन शास्त्री उनसे कोसों पीछे छूटि जा तारे। गजानन शास्त्रिणी के असली नाम त सुपर्णा बा। गांव के पंडित रामखेलावन के बेटी सुपर्णा के गांव के ही लइका मोहन से आंखि चार हो जाता। महज पंद्रहे साल के उमिर में सुपर्णा गर्भवती हो जातारी त उनुकर बाप के चिंता घेरि ले तिया। फेरू उ युद्धस्तर पर लइका खोजतारे। उनुकर ई खोज बनारस में जाके बैद्य गजानन शास्त्री पर पूरा होता, जे ओह घरी पैंतालिस पार कर चुकल बाड़े। तीसरका पत्नी स्वर्ग सिधारि गइल बाड़ी। घर में कवनो संतान नइखे त बैद्य जी के धर्म रक्षा कइसे होई। धर्म रक्षा खातिर उनुका आपना से करीब तीस साल छोट कनिया से बियाह कइला में कवनो बेंजाइ नइखे लागत। बियाह होखला के बाद सुपर्णा श्रीमती गजानन शास्त्रिणी हो जातारी। एकरा बाद उ पढ़े-लिखे लागतारी। छायावाद के जमि के आलोचना करतारी। ओह से सोहरत मिलता आ ओह सोहरत के कांग्रेस 1937 के चुनाव में फायदा उठावतिया। श्रीमती शास्त्रिणी के जौनपुर से टिकट मिलता आ ऊ काउंसलर चुना जातारी। फेरू जब ऊ लखनऊ जातारी त उनुका उ सब राजनीतिक रोग लागि जाता, जवन आजु के राजनीति आ राजनेता में हर जगह लउकेला। गजानन शास्त्रीणी नाम भले बैद्य जी से उनुका के मिलता, बाकिर बैद्यो जी पीछे छूटि जा तारे। आगे बढ़ि जातारी शास्त्रीणी जी।

एह कहानी के तोख यानी माध्यम से निराला जी अवसरवाद पर गंभीर चोट कइले बाड़े, समाज में धर्मरक्षा के नाम पर जारी बिडबंना के उजागर कइले बाड़े आ राजनीति के करियख के भी उजागर कइले बाड़े। कहानी ई अइसन बिया कि हर लाइन में जइसे व्यंग झरत होखे। पढ़त खानी ई कहानी हंसे के मजबूर करेले, आ लगले गहरा चोटो पहुंचावेले। हमरा विचार से निराला के एह कहानी के जइसन चर्चा मिले के चाहीं, ओइसन नइखे मिलल। हिंदी कहानी के रसिया लोगन के निराला के एह रचना पर धेयान देबे के चाहीं।

एही तरी निराला के एगो उपन्यासो बा, बिल्लेसुर बकरिहा। पहिला नजरि में लागि कि ई कवनो बकरी चरावे वाला मियांजी के कहानी ह। बाकिर इहां बिल्लेसुर बाड़े विल्वेश्वर यानी विल्व के ईश्वर यानी शंकर जी। कान्यकुब्ज ब्राह्मण विल्वेश्वर बनि गइल बाड़े देहाती बोलचाल के भाषा में गांव वालन के नजरि में बिल्लेसुर। कहल जा सकेला बिलारि के देवता। बकरिहा भी ओहि तरे बा यानी बकरी वाला। गरीबी में जियत बिल्लेसुर आपन गरीबी दूर करे खातिर शहर जा तारे, बाकिर उहां सफलता नइखे मिलत त गांवे लवटि आव तारे। ओकरा बाद आपन हालत सुधारे खातिर बकरी पालि ले तारे। पिछला सदी के चालीस के दशक में बाम्हन-ठाकुर के बकरी पालल धर्म आ समाज विरूद्ध मानल जात रहे। गरीबी में जियत रह, बाकिर बकरी मति पोस। बिल्लेसुर के माध्यम से निराला जी समाज के एह सोच के चुनौती दे तारे।

निराला जी के कहानी आ उपन्यास में कई बार रऊंआ अइसन लागी, जइसे रिपोर्ताज आ संस्मरण भी घोरा गइल बा। कहानी, संस्मरण आ रिपोर्ताज, तीनों विधा एक-दूसरा के सीमा के निराला के कहानी में अक्सर तुरत नजर आवेली। बाकिर कथ्य आ ओकर संदेसा तीर नियर चुभि जाला। हमरा समझ से निराला के एह व्यंग प्रधान रचनन पर हिंदी समाज के ध्यान देबे के चाहीं आ उनुका गद्य रूप के भी विवेचन करे के चाहीं। महाप्राण के जयंती पर उनुका खातिर इहे विनम्र श्रद्धांजलि होई। (लेखक उमेश चतुर्वेदी वरिष्ठ पत्रकार हैं.)

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